देश समाज संस्कृति

लोकतंत्र को खोखला होता देखना उनके लिए मुश्किल था

अटलजी नहीं रहे। उनके साथ ही लोकतंत्र का एक सुन्दर अध्याय भी समाप्त हो गया – एक ऐसा अध्याय जिसमें भाषा की मधुरता और भावों का बल था। नहीं पता कि इसके बाद कोई और कभी लिख पाएगा ऐसा अध्याय। जिस तरह भारतीय संस्कृति विविधताओं से भरी हुई है, वैसे ही भारतीय राजनीति विचित्रताओं से […]

समाज संस्कृति

भाषा और संस्कृति – कुछ विचार

(11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर विशेष) शंकर दयाल सिंह भाषा और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं या अनुपूरक? जहां भाषा हमारे भावों को अभिव्यक्तिक चेतना प्रदान करती है, वहां संस्कृति मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक सौष्ठव की संवाहिका है। इसे इस रूप में भी कहा या समझा जा सकता है कि भाषा की भी […]

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लोकतंत्र को खोखला होता देखना उनके लिए मुश्किल था

अटलजी नहीं रहे। उनके साथ ही लोकतंत्र का एक सुन्दर अध्याय भी समाप्त हो गया – एक ऐसा अध्याय जिसमें भाषा की मधुरता और भावों का बल था। नहीं पता कि इसके बाद कोई और कभी लिख पाएगा ऐसा अध्याय। जिस तरह भारतीय संस्कृति विविधताओं से भरी हुई है, वैसे ही भारतीय राजनीति विचित्रताओं से […]

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भाषा और संस्कृति – कुछ विचार

(11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर विशेष) शंकर दयाल सिंह भाषा और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं या अनुपूरक? जहां भाषा हमारे भावों को अभिव्यक्तिक चेतना प्रदान करती है, वहां संस्कृति मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक सौष्ठव की संवाहिका है। इसे इस रूप में भी कहा या समझा जा सकता है कि भाषा की भी […]

संपादकः रंजन कुमार सिंह

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