समाज साहित्य

अग्निपरीक्षा

डा0 विद्या सिन्हा

अग्निपरीक्षा शब्द सीता के जीवन से निकल कर एक बड़ा प्रतीक बन गया । जीवन की कठिन परिस्थितियों से गुजरते हुए हम इस शब्द का प्रयोग करने लगे,बोल-चाल में भी।
इस शब्द के इतिहास के साथ जो गंभीर सवाल जुड़े हैं, उन्हें हम राम को भगवान, मर्यादा पुरुषोत्तम और राज धर्म का पालन करने वाले आदर्श राजा की विराट छवि के पीछे सरकाते रहे। कहें कि इन सवालों से नज़रें चुराये रहे। ऐसा तभी करते हैं जब कहीं न कहीं हम अपराध स्वीकार करते हैं पर खुल कर बोलना नहीं चाहते। शायद राम ने भी राज धर्म की आड़ में अपना दोष ढकने का प्रयास किया हो। रामायण के आधार पर संस्कृत भाषा में और अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक काव्य और नाटक लिखे गए हैं । मैं यहाँ अपनी बात कहने के लिए संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण और संस्कृत कवि कालिदास के रघुवंशम् का संदर्भ लूंगी ।
मुझे यहाँ सीता से लेकर आज तक की स्त्री के जीवन से जुड़े दो प्रश्न बरसों से उद्वेलित करते रहे हैं। स्त्री की शुचिता का प्रश्न क्यों और किसे उठाने का अधिकार है? पति-पत्नी को विवाह संस्था बराबर मानती है और पारस्परिक विश्वास और निष्ठा को इस संबंध का आधार मानती है,ऐसी स्थिति में शुचिता का प्रश्न यदि उठता है तो सीता से विलग रहे राम से भी सीता द्वारा प्रश्न पूछा जाना और उर्मिला से विलग रहे लक्ष्मण से भी यह पूछा जाना क्यों न्यायसंगत नहीं है?दूसरा प्रश्न उस अग्निपरीक्षा से गुजरने के बाद सीता की क्या प्रतिक्रिया रही होगी और बाद में राम से उनके संबंधों पर इस अनुभव का क्या प्रभाव पड़ा होगा।
वाल्मीकि रामायण में राम का अधिक मानवीय रूप मिलता है।बाद में वैष्णव धर्म में तो राम ईश्वर के रूप हैं जो दशरथनंदन के रूप में लीला कर रहे हैं । अग्नि परीक्षा के संदर्भ में वाल्मीकि रामायण के राम का आचरण और सीता का तेजस्वी, समर्थ,व्यक्तित्वसम्पन्न रूप अत्यंत महत्वपूर्ण हैं ।यहां लंका विजय के बाद राम युद्ध में मारे गए लोगों का अंतिम संस्कार कराने की व्यवस्था करते हैं, विभीषण को उचित निर्देश देते हैं और लक्ष्मण को विभीषण का राज्याभिषेक करने का दायित्व सौंपते हैं क्यों कि राम स्वयं वनवास की अवधि में किसी नगर में प्रवेश नहीं कर सकते । इस सबके हो जाने के बाद वे विभीषण को संदेश भेजते हैं कि वे सीता को उनके पास भेजने की व्यवस्था करें । सीता के आ जाने पर वे अपनी सेना के सम्मुख खड़ी सीता से अपने पराक्रम, पौरुष और विजय से प्राप्त यश का विस्तार से वर्णन करते हैं, सीता राम का स्वयं पर यह अभिमान देख कर अवाक् हैं ।इसके बाद राम सीता से जो कहते हैं वह अविश्वसनीय और अवाच्य है । राम कहते हैं कि रावण ने तुम्हारा स्पर्श किया और तुम इतने समय तक रावण के महल में रही।तुम्हें अपने साथ रख कर मैं अपने कुल को अपमानित नहीं करना चाहता । तुम मुक्त हो, लक्ष्मण, विभीषण,सुग्रीव, या जिसके साथ तुम जाना चाहो जाने को स्वतंत्र हो। अंगारों के समान ये वचन सुन कर ही सीता की अग्निपरीक्षा होती है लेकिन तेजस्विनी सीता चुप नहीं रहीं, बड़े सधे शब्दों में वे राम को उत्तर देती हैं जब राम का ऐसा व्यवहार देख कर उपस्थित जनसमूह स्तब्ध है। वाल्मीकि की सीता कहती हैं कि आप ओछी सोच वाले छोटे पुरुष जैसा व्यवहार अपनी स्त्रियों से करते हैं उन पर संदेह करते हैं और छोटी स्त्रियाँ जैसे आपस में इसकी उसकी चरित्रहीनता की बातें करती हैं वैसी ही बात मेरी शुचिता को प्रश्नचिन्हित कर के कर रहे हैं, क्या आप मुझे ऐसी साधारण स्त्री समझते हैं ।यदि ऐसा था,तो जब पहली बार हनुमान को मेरी सूचना पाने के लिए भेजा था तभी यह संदेश दे देते तो यह युद्ध और विनाश तो बच जाता। मैं अपनी चिता वहीं सजा लेती। ऐसा कह कर वे लक्ष्मण को अपने लिए चिता बनाने का आदेश देती हैं ।चिता में वे प्रवेश कर जाती हैं और उसके बाद दैवीय शक्ति का प्रतीक अग्नि उन्हें ज्यों की त्यों निकाल कर प्रस्तुत कर देता है।
इसके बाद के घटनाक्रम के लिए मैं कालिदास के रघुवंशम् के उस प्रसंग को रखना चाहती हूँ जब अग्नि से निकली हुई सीता को राम पुष्पक विमान में अयोध्या ले जा रहे हैं । यह एक लंबी यात्रा है जिसमें विमान भारत के बड़े भूभाग के ऊपर से जा रहा है और राम पूरी यात्रा में पड़ने वाले प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्भुत और विस्तृत वर्णन करते हैं । यह कालिदास का अनुपम सौन्दर्य चित्रण है। राम निरन्तर बोल रहे हैं और सीता मौन हैं । सीता का यह मौन राम के व्यवहार से आहत सीता का विरोध था शायद।मौन होना कई बार अनुपस्थित होना होता है। आप शरीर से वहां हैं पर हृदय से,चेतना से वहां नहीं हैं ।कई बार बेहद अंतरंग संबंधों और क्षणों में भी यदि मन स्वीकार नहीं करता तो शरीर के उपस्थित होते हुए भी मन अनुपस्थित ही रहता है। इस प्रकार का यह मौन मुखर विरोध ही तो है यदि सामने वाला समझ पाए।
यहाँ मेरा लक्ष्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं है।भारतीय ज्ञान परंपरा शास्त्रार्थ के द्वारा तर्क को सिद्ध करती रही है। मैंने वाल्मीकि और कालिदास के शब्दों को अपनी दृष्टि से देखने की कोशिश की है।
वाल्मीकि रामायण को इतिहास और प्रबल भावानुभूति के साथ राम और सीता के अनन्य प्रेम की महागाथा के रूप में विद्वान देखते और प्रतिष्ठित करते हैं । अनेक प्रसंग ऐसे आते हैं जहाँ वाल्मीकि के राम कहते हैं कि मैं और सीता एक दूसरे में एकमेक हैं ।सीता कहती हैं कि मैं राम से उसी प्रकार एक हूँ जैसे सूर्य और उसकी किरणें । सीता हरण के बाद वाल्मीकि ने राम के विरह का विशद वर्णन किया है। राम एक अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति के रूप में अपनी सभी भूमिकाओं में दिखाई पड़ते हैं ।सीता राम के प्रति पूर्ण समर्पित हैं अपने प्रेम में । वनवास के दौरान वाल्मीकि की सीता राघव के आगे चलती हैं उनकी राह की बाधाओं को रौंदते हुए। फिर वही राम कैसे सीता को अपने शब्दों की बर्छी से यों आहत करते हैं । ये राम मनुष्य हैं पर असाधारण, सीता भी स्त्री हैं पर असाधारण । जनसमूह की सीता के प्रति उत्सुकता और कुतूहल के भाव ,आश्चर्य और शायद संदेह के भाव राम को विचलित कर देते हैं, उन्हें अपना सार्वजानिक जीवन और उस जीवन से जन सामान्य द्वारा अपेक्षित आचरणसंहिता उद्वेलित कर देते हैं, और क्या एक व्यक्ति के रूप में वे अपना संतुलन खो देते हैं या वे इन सबका पूर्वानुमान कर के सुनियोजित तरीके से सीता की बलि देने का निश्चय कर चुके हैं । मुझे जो लगता है वही कहूँगी और मेरा लगना गलत भी हो सकता है जैसा मैं प्रायः अपनी क्लास में भी कहती हूँ ।साहित्य का तो सारा आनंद ही इस लगने, व्याख्या और इंटरप्रेटेशन में है।
राम और सीता के अनन्य प्रेम को देख कर ऐसा लगता नहीं कि राम को सीता पर किंचित भी संदेह हो सकता है।घटनाक्रम में राम विजय के बाद अपने सब कर्तव्य पूरे कर चुकने के बाद विभीषण को स्पष्ट निर्देश देते हैं कि सीता को स्नान के बाद पूरे श्रृंगार के साथ राम के पास लाने की व्यवस्था की जाय।सीता के पास जब आभूषण आदि सामग्री भेजी जाती है तो वे स्पष्ट कहती हैं कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, वे जिस भी स्थिति में हैं उसी में राम के पास जाना चाहती हैं। तब उनसे कहा जाता है कि राम का ऐसा ही आदेश है। वे जब जाती हैं तब राम कहते हैं कि चरित्र ही स्त्री का आभूषण है।उसके बाद का उनका आचरण सीता को व्यथा और आक्रोश से उद्वेलित कर देता है। वे स्वयं अग्नि में प्रवेश कर जाती हैं ,दुःख के कारण या राम की मंशा समझ कर ऐसा कर के राम की मर्यादा की रक्षा के लिए। सीता पर किसी का भी संदेह राम को प्रश्नचिन्हित करना है। राम ने अपने आप से एक युद्ध किया होगा, सीता को ऐसी परीक्षा की आग में झोंकने के लिए। शायद इसीलिए उनके शुभचिंतक हनुमान, लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण कोई भी उनके इस व्यवहार को समझ नहीं पाता। सभी स्तब्ध रह जाते हैं । इसलिए विद्वान यह भी मानते हैं कि यह सीता ही नहीं राम की भी अग्नि परीक्षा थी।
लेकिन राम को सीता के प्रति किए इस अन्याय का दुःख होता है और उनकी क्या विवशता थी इसका संकेत और उदात्त वर्णन संस्कृत के महान कवि भवभूति में मिलता है। भवभूति ने अग्नि परीक्षा की भर्त्सना की है। एक प्रसंग में राम सीता का मन बहलाने के लिए उस चित्रवीथि आर्ट गैलरी जो निर्माणाधीन है के विषय में लक्ष्मण से पूछते हैं जहाँ उन्होंनें अपने जीवन के चित्र बनवाए हैं । राम जब पूछते हैं कि वीथि कहाँ तक बन गई, और लक्ष्मण बताते हैं कि आर्या यानी भाभी की अग्नि शुद्धि तक। यह सुनते ही राम कहते हैं शांतम् पापम् । अर्थात ऐसी अनुचित बात मत कहो। एक अन्य प्रसंग में राम सीता से कहते हैं कि कुल ही जिनका धन है उन्हें जन साधारण की प्रसन्नता के लिए बहुत कुछ ऐसा करना पड़ता है जो तुम्हारे अनुरूप नहीं है।सुगंधित पुष्प मस्तक पर शोभित होता है , पैरों से नहीं रौंदा जाता।
साहित्य, शोध, विश्लेषण, तर्क और प्रश्न कभी अंतिम नहीं होते । जो चित्र बना सकी वही आपके सामने रख सकी।अब आप सोचें और बताएं ।
हर देश की सांस्कृतिक,पारंपरिक ,आध्यात्मिक कहानियां हर काल में सुनी सुनाई जाती हैं, वे इतनी लोकप्रिय हो जाती हैं कि जन साधारण की मौखिक परंपरा बन जाती हैं, रोज़ की जिंदगी के उदाहरण और आदर्श बन जाते हैं इन कथाओं के चरित्र । ऐसा शायद इसीलिए होता है कि वे अपना जीवन इस प्रकार जीते हैं, अपने जीवन में चाहे व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक, व्यक्तियों के प्रति, समूहों के प्रति उनका आचरण वैसा होता है जैसा हम जीवन में देखना चाहते हैं, प्रेम, संवेदनशीलता, सहानुभूति, करुणा और अन्याय करने वाले के प्रति कठोरता,क्रूरता को दंड इत्यादि ।
महान विद्वान कवियों द्वारा रचित ये रचनाएं एक ओर भावसम्पन्नता और कलात्मक सौन्दर्य के संतुलन का साहित्यिक मानदंड बनती हैं तो दूसरी ओर अपना कथातत्व ले कर लोककथाओं की मौखिक परंपरा बन जाती हैं ।
इन सब में दिलचस्प बात यह है कि आनन्द का भाव हमें पात्रों के संघर्ष में मिलता है किसी चमत्कार में नहीं ।राम और सीता,लक्ष्मण और उर्मिला इसलिए हमारे मन में प्रतिष्ठित होते हैं कि वे अपने जीवन में आई कठिन परिस्थितियों से संघर्ष करते हैं, दीनता और पलायन का भाव उनमें नहीं आता। रावण से युद्ध में राम अयोध्या से सैन्य सहायता नहीं लेते,न सीता कभी जनक के पास लौटती हैं ।चाहते तो शायद ऐसा कर भी सकते थे।राजा हो कर जीवन की कठिनाइयों में उलझना,जूझना और उन्हें सुलझाना,व्यक्ति और समाज के सम्बन्धों में संतुलन साधना,निजी हित की तुलना में सामाजिक हित को चुनना ये सब उन्हें हमारे लिए एक आदर्श बनाते हैं । संघर्ष और संतुलन के ये उदाहरण जन सामान्य का जीवन दर्शन बनते हैं ।उन्होंने कठिन समय में यह किया तो हम भी कर सकते हैं ।जीवन की राह पर चलने के लिए जी पी एस बनती हैं ये कथाएं।
अग्नि परीक्षा का यह जटिल संदर्भ एक और दृष्टि देता है जीवन के लिए।आधुनिक जीवन की तेजी और गति हमारा धीरज छीन कर हमें बहुत जजमेंटल बना देती है। हम राय कायम कर लेने की जल्दी में रहते हैं पता नहीं क्यों ।फलां लड़की को दफ्तर से लौटने में देर क्यों होती है जरूर कोई चक्कर है, फलां इतनी शौकीनी से कैसे रहते हैं,जरूर ऊपर की कमाई होगी, बहू उदास क्यों है जरूर सास से झगड़ा हुआ है। किसी भी स्थिति, आचरण और घटना को एक पूरे परिदृश्य में देखे बिना हम नतीजे पर कैसे पहुँच सकते हैं । कोई भी मनुष्य सौ प्रतिशत सही नहीं हो सकता।अगर दस बार कोई ठीक है और एक बार गलत तो फैसला कर लेने से पहले जरा ठहर कर सोचना ठीक रहेगा न कि इस गलती का कुछ तो कारण रहा होगा,दस और एक के बीच संतुलन ढूंढना उचित नहीं होगा क्या। सीता की अग्नि परीक्षा को भी शायद राम के पूरे जीवन भर के आचरण और व्यक्तित्व के परिदृश्य में देखना ठीक ही होगा बजाय उन्हें कटघरे में खड़ा करने के। दूसरी बात हम सभी को कभी न कभी किसी न किसी तरह की अग्निपरीक्षा से गुजरना ही होता है,ऐसे में तेजस्विनी असाधारण सीता का संघर्ष हमें धैर्य का संबल देता रहे तो अच्छा ही है न।

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