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लोकतंत्र को खोखला होता देखना उनके लिए मुश्किल था

अटलजी नहीं रहे। उनके साथ ही लोकतंत्र का एक सुन्दर अध्याय भी समाप्त हो गया – एक ऐसा अध्याय जिसमें भाषा की मधुरता और भावों का बल था। नहीं पता कि इसके बाद कोई और कभी लिख पाएगा ऐसा अध्याय।

जिस तरह भारतीय संस्कृति विविधताओं से भरी हुई है, वैसे ही भारतीय राजनीति विचित्रताओं से भरी है। अनेकोनेक पार्टियां है, अनेकोनेक नेता हैं। अनेकों सत्ताधारी दल हैं और अनेकों ही विपक्षी दल भी। कोई थोड़ा सा भी अपनी जगह से हिल जाता है, विपक्ष से सत्ता में या फिर सत्ता से विपक्ष में पहुंच जाता है, एक दल से दूसरे और कभी-कभी तीसरे दल में चला जाता है, तो अमूमन हमने देखा है कि स्थितियों के बदलते ही उसके बोल भी बदल जाते हैं, भाव-रंग सब कुछ बदल जाता है। परन्तु अटलजी वैसे नहीं थे। बहुत ही लम्बे समय तक वह विपक्ष में रहे और कुछ समय के लिए सत्ता के शीर्ष पर भी, पर कहीं कोई बदलाव उनके व्यक्तित्व में नहीं दीख पडा। वह जैसे थे, तैसे ही रहे।

भारतीय राजनीति ने भले ही अनेक प्रधानमंत्रियों को देखा हो, पर राजनीति की मुख्य धारा सिर्फ दो ही रही है। एक जो नेहरू से चलकर अटल तक ठहर गई और दूसरी जो इंदिरा से शुरु होकर मोदी तक जारी है। एक जिसे भारतीय समाज पर बेहद विश्वास था और दूसरी जिसे अपने आप पर भी कम ही विश्वास है। एक जिसे लोकतंत्र में गहरी आस्था थी और दूसरी जिसने लोकतंत्र को खेल बना रखा। एक जिसे विपक्ष में भी शत्रु नहीं दिखे और दूसरी जिसने स्वपक्ष में भी शत्रुओं को ही देखा। एक जिसने लोकतंत्र की सुदृढता के लिए विपक्ष को मजबूती दी और दूसरी जिसने अपनी सत्ता की खातिर विपक्ष को कमजोर बनाना चाहा।

जितना ही मैं सोचता हूं, उतना ही नेहरू और अटल में साम्य पाता हूं। वह नेहरू युग के सबसे युवा चेहरों में एक थे। नेहरू और अटल, दोनों की ही लोकतंत्र में अडिग आस्था थी। दोनों में ही गहरा विश्वास भरा था और दोनों ही अपने इस विश्वास के कारण छले भी गए। नेहरू के जमाने में हिन्दी-चीनी भाई-भाई कहनेवालों ने उनकी पीठ पर छुरा भोंका तो अटल को दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरु करते ही करगिल की मार झेलनी पड़ी। फिर भी दोनों में से किसी ने भी अपनी राह नहीं बदली, अपने भाव नहीं बदले, अपना इरादा नहीं बदला।

अटल जी मेरी शादी में हमें आशीर्वाद देने पहुंचे थे। मेरी पत्नी रचना को उनका वह स्नेहसिक्त आशीर्वाद आज भी भुलाए नहीं भूलता। मेरे पिताजी से उनका गहरा लगाव था। पिताजी जब संसदीय राजभाषा समिति के उपाध्यक्ष थे, तब वह उसके सदस्य हुआ करते थे। अटलजी जब प्रधानमंत्री बने तब यह देखने के लिए मेरे पिता नहीं थे। संसद के गलियारे में दोनों मिलते तो खड़े-खड़े ही लम्बी बातें करते। अटलजी कहा करते थे, भाई शंकर दयाल सिंह की नजरों से बच कर निकल जाना मुस्किल है और इसीलिए मैं उन्हें देखकर जहां का तहां खड़ा हो जाता हू। ऐसा न करूं तो शंकर दयाल जी संसद का लिहाज किए बिना जोर से बोल उठेंगे, पंडितजी, रुकिए तो जरा। आपके लिए देखिए मैं क्या रखे हुए हूं। उनके पास मुझे देने के लिए कभी कोई कलम होती तो कभी कोई किताब।

अटलजी से अंतिम मैं मिला था अपनी पुस्तकें देने के बहाने से ही। नहीं जानता कि वे कभी उन पुस्तकों को पढ़ भी सके या नहीं, क्योंकि उसका स्वास्थ्य बेहद खराब था और वे सब किसी से मिल भी नहीं रहे थे। बस उनकी वे टिमटिमाती आँखें मुझे ताकती रहीं थीं, बोले वह कुछ भी नहीं।

अटलजी के साथ ही मानो एक युग समाप्त हो गया, जिसकी जड़े निष्ठा और विश्वास तक जाती थी और अब जिसकी चूलें हिलाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं है। शायद यह सब देख पाना अटलजी के लिए असह्य रहा और इसीलिए शायद अपने निधन से पहले ही उन्होंने सोचना-समझना, बोलना-चालना बंद कर दिया था। लोकतंत्र को इस तरह खोखला होता वह नहीं देख सकते थे और इसलिए उन्होंने हम सब से विदा ले लिया, हमारी स्मृतियों में बने रहने को सदा के लिए।

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