विदेश

अमेरिकी अखबारों को चीन की रिश्वत

बात बहुत पुरानी है, मैं काठमांडू में भारतीय दूतावास के एक वरिष्ठ राजनयिक से बातें कर रहा था तो उन्होंने एक बहुत दिलचस्प बात बताई। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर बेशकीमती उपहार ले गई हैं और वे उन्हें वहाँ के नामी-गिरामी पत्रकारों को देंगी। मुझे बहुत हैरानी हुई और मैंने पूछा, वाकई ऐसा होता है क्या? तो उनका जवाब था, बिल्कुल। वे भी उपहार वगैरह पसंद करते हैं, हालांकि यह वहां की परंपरा नहीं है। वे तो खबरो और यहां तक कि इंटरव्यू के लिए पैसे देते हैं।

तब इस विषय पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन सुना कि इंदिरा जी के बारे में अमेरिका के अखबारों में काफी कुछ छपा। अब इतने वर्षों के बाद अचानक ही एक खबर ने अपनी ओर ध्यान खींचा। इस खबर ने तो अमेरिकी मीडिया की विश्वनीयता को संदेह के घेरे में ला खड़ा कर दिया है। पहले से ही पक्षपातपूर्ण लेखन का आरोप झेल रही अमेरिकी मीडिया बेनकाब हो गई या यूं कहें कि नंगी हो गई।

हुआ यह कि अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट के हवाले से एक खबर आई कि चीन के सरकारी अखबार चाइना डेली ने अमेरिकी अखबारों को विज्ञापन के नाम पर करोड़ों दिए हैं। इसने सनसनी फैला दी। फ्रीडम हाउस नाम की संस्था ने जस्टिस डिपार्टमेंट से सारे विवरण निकाले तो पता चला कि चार वर्षों में चीन ने अमेरिका ही नहीं, दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित अखबार वाशिंगटन पोस्ट को 4 करोड़ 60 लाख डॉलर (पौने पैंतीस करोड़ रुपए) दिए थे, विज्ञापन के नाम पर। इसी तरह एक और प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स को उसने 50 हजार डॉलर तथा वॉल स्ट्रीट जर्नल को 60 लाख डॉलर दिए थे, चीन के पक्ष में स्टोरी छापने के लिए। ये कहने को तो विज्ञापन होते थे लेकिन असल में ये पेड न्यूज ही होते थे। विज्ञापन के नाम पर चीन न केवल अपनी परियोजना बेल्ट रोड इनिशिएटिव के बारे में खबरें छपवाता था बल्कि यह भी छपवाता था कि इनमें भाग न लेने से अमेरिका को कितना फायदा हो सकता है। इसके अलावा इस तरह की खबरें भी छपवाई जाती थीं कि इसमें भाग न लेकर अमेरिका अपना कितना अहित कर रहा है। आत्म प्रशंसा की चाशनी से भरपूर खबरें-लेख-रिपोर्ट खूब छपवाए गए, उन अखबारों में जो अपने को स्वतंत्र पत्रकारिता की मशाल जलाने वाले कहते हैं। वाशिंगटन पोस्ट जैसे अखबार जो अपने को स्वतंत्र और न्यायपूर्ण खबरों के पुरोधा कहते थे, ऐसी खबरें छाप रहे थे।

जिन और अखबारों के नाम सामने आए उनमें से लॉस एंजिलिस टाइम्स, द सिएटल टाइम्स, द अटलांटा जर्नल कंस्टीट्यूशन, द शिकागो ट्रिब्यून, द ह्यूस्टन क्रोनिकल, बोस्टन ग्लोब, फॉरेन पॉलिसी, वगैरह हैं। लॉस एंजिलिस टाइम्स को तो लगभग दस करोड़ रुपए की बहुत मोटी रकम दी गई।

पैसे का यह खेल इसलिए सामने आ गया कि अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट को इसकी भनक लगी तो उसने फॉरेन एजेंट्स रिजस्ट्रेशन ऐक्ट के तहत चाइना डेली पर दबाव बनाया , जिसके कारण यह सनसनीखेज रिपोर्ट सामने आई। इसके बाद ही लोगों को पता चला कि चीन किस तरह से अमेरिका के पत्रकारों और अखबारों को अपनी मुट्ठी में कर रहा था। प्रो डेमोक्रेसी ग्रुप के कार्यकर्ताओं का तो यहां तक कहना है कि चीनी दलालों ने वहां कई नामी पत्रकारों और कॉलमिस्ट को खुश कर रखा है और उनसे अपने फायदे की या फिर किसी के खिलाफ खबरें छपवाते रहते हैं।

यह सभी जानते हैं कि कोरोना वायरस चीन से ही सारी दुनिया में फैला लेकिन चीनी एजेंटों ने वहां के कुछ अखबारों में यह छपवाया कि इसमें गलती अमेरिका और यूरोप की है। इतना ही नहीं, कुछ अखबार तो इस घड़ी में भी सरकार की बेवजह आलोचना कर रहे हैं। अब अमेरिकी सरकार ने ग्लाबल टाइम्स, पीपल्स टाइम्स और दो अन्य अखबारों को कम्युनिस्ट पार्टी का मुख पत्र घोषित करके फॉरेन एजेंट करार दे दिया है ताकि उनकी गतिविधियों पर अंकुश लगे।

ध्यान रहे कि मोटी रकम लेकर चीन के पक्ष में खबरे छपने वाला वाशिंगटन पोस्ट पिछले कुछ वर्षों से लगातार भारत विरोधी खबरें छाप रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स और यहां तक कि लॉस एंजिलिस टाइम्स भी इसमें पीछे नहीं रहा है। लेकिन ये दोनों काफी समय तक चीन विरोधी खबरें छापने से बचते रहे हैं। चीन ने यह दिखाने के लिए कि इन अखबारों से उसका कोई संबंध नहीं है, उनके दो संवाददाताओं पेइचिंग से निकाल भी दिया।

यह बात तय है कि अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए चीन किसी भी हद तक जा सकता है। मक्कारी तो कम्युनिस्ट पार्टी की रग-रग में है और वह दिखती भी है। हर समय दूसरों को धमकाना और अपने स्वार्थों की पूर्ति उसका उद्देश्य रहा है। लेकिन चीन पैसे देकर खबरें भी छपवाता है और वह भी दुनिया के सबसे बड़े अखबारों में, यह बात बेहद हैरान करती है।

मधुरेन्द्र सिन्हा
Madhurendra Sinha is a senior journalist with vast experience in print and web based journalism. Currently he is the Editor with Policy Pulse.

One thought on “अमेरिकी अखबारों को चीन की रिश्वत

  1. Madhurendra Sinha’s article is informative and one-sided. Speaks about ‘Makaari’ of China Daily n Chinese Communist Party but completely spares the great ‘receivers’ of the free-fearless media establishments of the US. The culture of paid news is rampant now across the world n our country too is no way spared.

    China is doing its part of game but converse also applies to US and other countries too. For instance whether English newspapers like Independent n Guradian are behaving similar? This investigation needs to be done in the US’ media context as well. The imperialist policies of the US is well known. China is expansionist, right but what about US ? The article is informative n biased n paints US media as ‘passive recipient’ the fact is they are active n motivated to accept such ‘donations’ !

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