समाज

आरक्षण पर चन्द सवाल

ललित शास्त्री

protestलोग पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करने के लिए मध्यप्रदेश की सड़कों पर निकल आए

पिच्यानवां संविधान संशोधन, जिसे आधिकारिक तौर पर संविधान (95 वां संशोधन ) अधिनियम, 2009, के रूप में जाना जाता है, के द्वारा लोकसभा व विधानसभाओं में अनुसूचित जनजाति व् अनुसुचित जाति व आंग्ल भारतीयों के लिए आरक्षण में 2020 तक वृद्धि की गई।

संविधान के अनुच्छेद 334 के अन्तर्गत निर्वाचित सीटों का आरक्षण 1960 में समाप्त हो जाना चाहिए था लेकिन संविधान के आंठवें संशोधन द्वारा आरक्षण व्यवस्था को 1970 तक बढ़ा दिया गया। आरक्षण की अवधि 23 वें, 45 वें, 62 वें और 79 वें संशोधन के द्वारा क्रमश: 1980, 1990, 2000 और 2010 के लिए पूर्व में बढ़ा दी गई। 95 वें संशोधन ने आरक्षण की अवधि 2020 तक बढ़ा दी है। 2020 में संसद को एक बार फिर से आरक्षण के सवाल का सामना करना पड़ेगा।

आरक्षण कोई ऐसा नागरिक अधिकार नही है जिसके लिए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोगों ने कभी भी कोई आंदोलन किया। इन वर्गों को आरक्षण इस लिए दिया गया क्यों कि आज़ादी हासिल करने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अग्रणी नेताओं ने और हमारे संविधान के निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर ने समाज के उस वर्ग के उत्थान के लिए जो कि ऐतिहासिक कारणों से सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़ा रह गया था उसके उत्थान के लिए विशेष बल दिया ।  इस विषय पर संविधान सभा में बिना किसी विद्वेष के एक व्यापक आम सहमति बनी थी।

राजनैतिक दलों ने विशेष रूप से एक बहुत बड़े वर्ग को आरक्षण के मामले में “क्रीमी लेयर” के दायरे से बहार रख कर तथा मध्यप्रदेश जैसे राज्य ने सरकारी सेवाओं में “पदोन्नति में आरक्षण” जैसा असंवैधानिक नियम लागू कर, आरक्षण को एक बहुत ही जटिल मुद्दा बना दिया है। जहां तक राजनैतिक पार्टियों का सवाल है, सभी  वाम दलों ने आरक्षण के मामले मे हमेशा, अपेक्षाकृत, चुप रहना ही ठीक समझा है जबकि अन्य सारे दल आरक्षण के वर्तमान स्वरुप के  पक्ष मे हर वक़्त मजबूती से खड़े रहे हैं।

सवाल उठता हैं:

क्या आरक्षण को वर्तमान स्वरूप में भारत में जारी रखना चाहिए?

इस सवाल से हम बच नहीं सकते क्योंकि परिस्थितियां तेजी से बदल चुकी हैं। आज हर देश में होड़ लगी है कि किस तरह अपने को नई अर्थ व्यवस्था तथा वैश्वीकरण से उत्पन्न प्रतिस्पर्धा और चुनौतीयों का सामना करने के लिए ढाला जाए।

आज, जहाँ तक आरक्षण का वर्तमान स्वरुप है, आम सहमति पूरी तरह से समाप्त हो चुकी और इसका असीमित विरोध हो रहा है।  संविधान में मूलतः केवल अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए ही आरक्षण दिया गया था। आगे चल कर मंडल कमीशन ने यह सिफारिश दी कि अन्य पिछड़े वर्गों के लिए भी सरकारी सेवाओं में तथा केंद्र सरकार द्वारा संचालित सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों मे 27 फीसदी आरक्षण लागू करना चाहिए। यह उच्च शिक्षा के संस्थानों में प्रवेश के लिए भी लागू किया जाना चाहिए।

जहाँ तक नौकरियों में आरक्षण का सवाल है, अखिल भारतीय सिविल सेवा अथवा राज्य सिविल सेवा, नियम यह है कि यदि कोई व्यक्ति आरक्षित श्रेणी में स्वयं को चयन के लिए प्रस्तुत करता है पर उसे सामान्य श्रेणी में चयन के लिए पर्याप्त अंक प्राप्त होते हैं तो वह सामान्य श्रेणी में चयनित किया जाएगा और आरक्षित श्रेणी मे नहीं गिना जायेगा।

ऐसे कई उदाहरण हैं जहां आरक्षित श्रेणी के अभ्यार्थी जो कि “क्रीमी लेयर” (मलाईदार परत) से होते हैं उनका चयन उनके द्वारा प्राप्त अंकों के आधार पर सामान्य श्रेणी में हो जाता है। इस प्रकार अनुसूचित जनजाति तथा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित पदों से भी अधिक पदों पर आरक्षित श्रेणियों का प्रतिनिधित्व कर रहे व्यक्तियों का चयन हो जाता है। इस प्रक्रिया से पिटता है केवल वह व्यक्ति जो सामान्य श्रेणी से होता है।

सोशल मीडिया में लोग आरक्षण के वर्तमान स्वरूप जैसे ज्वलंत विषय पर आगे बढ़कर लिख रहे हैं। आरक्षण का मुद्दा एक ऐसा मुद्दा है जिसपर वर्तमान में कोई भी राजनीतिक पार्टी या व्यवस्था कुछ करेगी ऐसा किसी को भी विश्वास नहीं है। इसके अलावा – किसानों के मुद्दे, भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट, गरीबी, नौकरियों का अकाल, धार्मिक कट्टरवाद, घोर पूंजीवाद – कुछ प्रमुख मुद्दे हैं जिनपर लोगों का आजकल विशेष ध्यान है। कुछ और मुद्दे भी हैं जिनपर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है जैसे कि शिक्षा के क्षेत्र में कुप्रबंधन का मुद्दा, लोगों को सस्ती और विश्वसनीय स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का मुद्दा, आदि।

1990 के दशक तक, अनेक सर्वेक्षण इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की कुल जनसंख्या का एक बहुत ही छोटा भाग आरक्षण के लाभ समेटने में सफल रहा है। इस समस्या के समाधान के तौर पर कुछ क्षेत्रों द्वारा यह सुझाव दिया गया कि आरक्षण का लाभ किसी भी व्यक्ति को जीवन में एक या दो बार से अधिक नहीं मिलना चाहिए। यह भी सुझाव दिया गया कि आरक्षण प्राप्त करने के लिए एक “आय सीमा” को परिभाषित किया जाना चाहिए, या आरक्षण पर एक ‘सामाजिक स्थिति सीमा’ को परिभाषित करना चाहिए, जैसे आईएएस व अन्य अखिल भारतीय सेवाएं तथा स्टेट सिविल सर्विस अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण नहीं मिलेगा। चूंकि नीति निर्माताओं द्वारा  सीमा को स्थापित करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली गई, अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा और “सुपर स्पेशियलिटी” जैसे कार्यों एवं फौज को आरक्षण के दायरे से अलग रखा गया।“

आज़ादी के इतने वर्ष बाद जब यह देखा गया कि आरक्षण के नाम पर सारे फायदे एक विशेष वर्ग समेट रहा है और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के अधिकांष लोग सामाजिक पिछड़ेपन से जूझ रहे हैं, मुखर सामाजिक समूह आज आरक्षण के वर्तमान स्वरूप का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। जाट, गूजर और पटेल समरूप समूह नहीं हैं। वास्तव में वे कोई जाती भी नहीं हैं। वे भी अन्य जाति आधारित समूहों के समान विविध हैं। जिस प्रकार आरक्षण के मुद्दे पर कुछ राज्यों मे पटेल, गूजर और जाट आंदोलन इन वर्गों में एकता लाने मे सफल हुए, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी आरक्षण के विरोध में सामान्य वर्ग, पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक वर्ग लामबद्ध हो गए हैं।

सवाल यह भी भी उठता है कि आरक्षण का लाभ मलाईदार परत क्यों उठाए?

आरक्षण के वर्तमान स्वरूप के  खिलाफ भारत में विद्रोह शुरू हो गया है। इसका भयावह रूप 1990 मे देखने को मिला । ये वो समय था जब देश में नौकरियों का आकाल था और नौकरियों में आरक्षण से उत्पन्न भयावह स्थिति के कारण अनेक युवा तो आत्मदाह करने के लिए भी विवष हो गए।

एक ओर आरक्षण के वर्तमान स्वरुप का विरोध हो रहा है तो दूसरी और इसके ठीक विपरीत एक और धारा आज बह रही है। गुजरात, राजस्थान और हरयाणा मे पटेल, गूजर, और जाट आरक्षण मांगने लगे हैं। इन वर्गों के द्वारा किये जा रहे आंदोलन को 60 बरसों से भी अधिक समय से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ एक विद्रोह के रूप में देखा जा रहा है। नौकरियों में स्थापित वर्तमान आरक्षण व्यवस्था, विशेष रूप से “पदोन्नति में आरक्षण” वरिष्ठता के सिद्धांत तथा मेरिट के विचार को कमजोर कर रही है। हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि वर्तमान आरक्षण प्रणाली, जो कि योग्यता तथा वरिष्ठता के सिद्धांत को दरकिनार कर नागरिकों को संविधान के द्वारा प्रदत्त समान अधिकारों पर कुठाराघात करती है, उसे संविधान अनुसार युक्तिसंगत बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक नागरिक की आर्थिक स्थिति को केंद्र में रख कर समाज आधारित समानता की नीति लागू कर तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति के हर वर्ग तथा अन्य पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा करते हुए आरक्षण व्यवस्था में जरूरी परिवर्तन कर हर भारतवासी के हितों का सरंक्षण करते हुए देश को प्रगति के मार्ग पर आगे बढाने कि दिशा मे पहल होनी चाहिए।

2 thoughts on “आरक्षण पर चन्द सवाल”

  1. बकवास, बच्चों जैसी बातें करते है। कभी समय निकाल कर वास्तविक्ता को समझिए।

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