देश राजनीति

कांग्रेस की दुकान खुलने के पहले ही बंद

मधुरेन्द्र सिन्हा

congress_esदेश की सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव का बिगुल जब बजा तो सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी कोशिशें तेज कर दीं। इसी क्रम में कांग्रेस ने भी नाटकीय ढंग से दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित को पार्टी के मुख्य मंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया। लोग इससे हैरान नहीं हुए बल्कि उन्हें लगा कि पार्टी विकास के फॉर्मूले पर काम कर रही है। इसके अलावा भी पार्टी ने एक ब्राह्मण को मैदान में उतारकर उन्हें खुश करने का काम भी किया। उत्तर प्रदेश देश का इकलौता ऐसा राज्य है जहां ब्राह्मण वोटों का अच्छा-खासा वज़न है। उन्हें खुश करने के अलावा पार्टी एक महिला को आगे बढाकर उस सेगमेंट को भी खुश करना चाहती थी। शीला दीक्षित की छवि एक विकासशील महिला की है। उन्होंने अपने 15 वर्षों के नेतृत्व में राज्य का काया पलट कर दिया था। उन पर भले ही भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे हों लेकिन सच्चाई है कि उन्होंने विकास की दिशा में बहुत काम किया। तो इस तरह से कांग्रेस ने शुरूआत की। लेकिऩ उधर पार्टी ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवाएं भी ले लीं जिन्होंने कुछ शर्तें रखीं। यानी पार्टी ने कई मोर्चों पर तैयारी की और गंभीरता से लड़ाई की तैयारी शुरू कर दी। लोगों को भी लगा कि इस बार कांग्रेस काफी बढ़िया प्रदर्शन करेगी। लेकिन दो-चार हफ्तों में ही यह स्पष्ट हो गया कि पार्टी के खंभे उखड़ गए हैं और वह वहां पहले की ही तरह पटरी पर आ गई है।

जब राहुल गांधी ने यूपी के गांवों का दौरा शुरू किया तो लगा कि उन्हें जबर्दस्त समर्थन और रिस्पांस मिल रहा है। उनकी शुरूआती सभाओं में तो इतनी भीड़ जमा हुई कि पार्टी में उम्मीदें जग गईं। प्रशांत किशोर के इशारे पर करवाई गई खाट सभा तो काफी सफल रही। इसके अलावा बुंदेलखंड में उनकी सभाओं में बड़ी तादाद में लोगों का स्वतः आना एक बड़ी बात थी। उनसे यह उम्मीद तो जग गई कि कांग्रेस सौ का आंकड़ा इस बार जरूर पार कर जाएगी। कुल मिलाकर एक माहौल बनता दिखाई दिया।

लेकिन जब राहुल की सभाओं में लोगों की दिलचस्पी घटने लगी तो पार्टी में चिंता की लकीरे दिखने लगीं। रही-सही कसर एनडीए सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक ने पूरी कर दी। हालत यह हो गई कि बाद की सभाओं में सौ-डेढ़ सौ लोग ही नज़र आने लगे। दूसरी ओर रणनीतिकार प्रशांत किशोर की योजनाएं बट्टे-खाते में डाल दी गईं यानी उनकी सलाहों पर अमल होना लगभग बंद ही हो गया। अपुष्ट खबरों के अनुसार उनकी दुकान भी ठंडी पड़ गई है और उनके कई लोग वहां से चल भी गए हैं। एक महत्वपूर्ण कांग्रेसी ने दिलचस्प बात कही कि प्रशांत किशोर मार्केटिंग के मास्टर प्लेयर तो हैं लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उन्हें एक सही प्रॉडक्ट तो मिले। नरेन्द्र मोदी एक उत्तम प्रॉडक्ट थे और नीतीश कुमार भी। लेकिन राहुल गांधी? उन सज्जन का मानना है कि प्रशांत किशोर कुछ भी रणनीति बनाएं, राहुल गांधी करेंगे वही जो उनका मन चाहेगा या फिऱ उनके दरबारी। यह बात सोलहों आने सही है। उन्होंने शुरूआती प्रचार अभियान में एक सही नीति अपनाई लेकिन बाद में दरबारियों के कहने पर उल्टे-सीधे बयान देने शुरू कर दिए। उनका खून की दलाली वाला बयान जनता को कतई पसंद नहीं आया। सर्जिकल स्ट्राइक से खुश भारतीय जनता के सामने ऐसा भद्दा बयान देकर राहुल ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। यही गलती सोनिया गांधी ने गुजरात में मोदी को मौत का सौदागर बुलाकर की थी। अगर एनडीए ने इस स्ट्राइक का श्रेय लेने का प्रयास किया तो उसकी काट किसी और ढंग से हो सकती थी लेकिन ऐसी हल्की बातों से तो कतई नहीं।

प्रशांत किशोर के खुले आम यह कहने के बावजूद कि प्रियंका गांधी को पूरी तरह से मैदान में उतारा जाए, सोनिया गांधी ने कुछ नहीं किया। प्रियंका को उन्होंने दूर रखा जिनमें उत्तर प्रदेश के काफी लोग इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं। सच तो यह है कि राहुल के दरबारियों और सलाहकारों को यह डर सता रहा है कि अगर प्रियंका को मैदान में उतार दिया जाएगा तो उनकी दुकान बंद हो जाएगी। ऐसे लोगों में एक मंजे हुए नेता भी हैं जो अपने बयानों से पार्टी का खासा नुकसान भी करते रहते हैं।

शीला जी अपने अभियान को तेज कर ही रही थीं कि उधर पार्टी की पूर्व प्रेदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने कांग्रेस छोड़कर एक धमाका कर दिया। यह पार्टी के लिए बड़ा आघात है और इससे उसे धक्का ही लगेगा। दरअसल पार्टी में हमेशा की तरह गुटबंदी है और चुनाव आते ही वह तेज हो गई है। कांर्गेस के लिए आने वाले दिन कठिन है। एक न्यूज चैनल ने जो सर्वे किया है उसके मुताबिक तो पार्टी को दस सीटें भी आती नहीं दिखतीं। यह पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। सोनिया गांधी को जग अब जाना चाहिए नहीं तो देर हो जाएगी, बहुत देर।

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