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दुनिया का थानेदार बनने की जुगत में है चीन

मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा

एक समय जैसे यूरोप के देश दूसरे देशों में व्यापारी की तरह आये थे और फिर उन्हीं देशों में खुद थानेदार बन बैठे, वैसे ही आज चीन भी करने की कोशिशों में लगा है।

‘परचेजिंग पॉवर’ की दृष्टि से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, और इस उपलब्धि ने दुनिया की दूसरी बड़ी ताकत या महासुपर पॉवर बनने की उसकी चाहत बढ़ा दी है। सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया का शक्ति समीकरण बिल्कुल बदल गया। अमेरिका ने दुनिया में जो चाहा किया, वही किया। उसने मध्य पूर्व में लड़ाइयों को बढ़ावा दिया और खुद भी कई बार उसमें कूद पड़ा। चीन पहले चुपचाप अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करता रहा और जब उसे लगा कि वह ताकतवर हो गया है तो उसने अपनी सामरिक शक्ति तेजी से बढ़ाई और इसकी घोषणा दक्षिण चीन सागर के दो द्वीपों पर कब्जा करके की।

चीन ने सागर के टापुओं में ने केवल बंदरगाह बनाए, बल्कि हवाई अड्डे भी बनाए। उसकी नौसेना के दर्जनों जहाज आसपास के छोटे देशों जैसे वियतनाम, फिलीपीन, ब्रुनेई को  धमकाने में लग गए। ये वो देश हैं जिनका इस क्षेत्र पर सदियों से कब्जा था। चीन अपने पुराने फॉर्मूले के तहत वहां जम गया। यह फॉर्मूला है सीधे यह कहना कि यह इलाका पहले हमारे पास था। ठीक यही फॉर्मूला चीन ने गलवन घाटी में भी आजमाया तथा यही वह अरूणाचल प्रदेश में भी आजमाता रहता है। कुछ पुराने दस्तावेजों की आड़ में, जिनकी प्रमाणाकिता संदिग्ध है, चीन किसी भी जगह पर कब्जा कर लेता है। भारत के खिलाफ भी वह यही खेल वर्षों से खेलता रहा है। लेकिन कई दशकों के बाद इस बार उसकी दादागीरी खूनी हो गई और हमारे 20 जवान शहीद हो गए। उसके कितने मारे गए, यह कभी नहीं जाना जा सकेगा क्योंकि चीन एक तानाशाही व्यवस्था वाला देश है और उसने कभी अपने सिपाहियों की मौत का आंकड़ा नहीं दिया है। वहां हर सच पर पर्दा डाला जाता है।

कट्टर कम्युनिस्ट बन गया पूंजीपति

इस कट्टर कम्युनिस्ट चीन ने पूंजीपति अमेरिका का हाथ पकड़कर 1990 से जो तरक्की करनी शुरू की, उसका ही नतीजा है कि आज उसकी अर्थव्यवस्था 15 खरब डॉलर की है। इस मुकाम पर पहुंचने के लिए चीन ने हर तरह के कदम उठाए, दुनिया भर में अपने पैर पसारे और अपने को विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केन्द्र बनाया। सस्ते सामान, सस्ते श्रमिक, तमाम आधुनिक सुविधाएं चीन ने दूसरे देशों के कारोबारियों को उपलब्ध कराया। इसका नतीजा यह हुआ कि अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने संयंत्र चीन में लगाए। यहां उन्हें बेहद सस्ता श्रम और कच्चा माल मिला तथा सरकार का समर्थन भी। और तो और, दुनिया की सबसे ज्यादा लाभ कमाने वाली कंपनी ऐप्पल तक ने अपना संयंत्र वहां लगाया। अमेरिका-यूरोप के मुकाबले बेहद सस्ते श्रम की उपलब्धि के कारण वहां की कंपनियां दौड़ी चली आईं और उन्होंने जमकर मुनाफा भी कमाया। कम्युनिस्ट चीन सही मायनों में दुनिया का सबसे बड़ा पूंजीवादी देश बन गया, जहां श्रमिकों पर बेइंतहा जुल्म हुए। उनसे गुलामों की तरह काम कराना आम बात है। इसके ठीक विपरीत अमेरिका-यूरोप के विशुद्ध पूंजीवादी होने के बावजूद वहां कड़े श्रमिक कानून हैं। वहां श्रमिकों का पारिश्रमिक चीन की तुलना में कई गुना ज्यादा है। इसके अलावा श्रम कानून बहुत ही सख्त हैं जिनका उल्लंघन करने पर कड़ी सजा का प्रावधान है। यूरोप और इंग्लैंड में तो लेबर यूनियनें इतनी मजबूत हैं कि वे किसी भी समय हड़ताल करके कामकाज ठप कर सकती हैं। चीन कहने को तो कम्युनिस्ट देश है लेकिन वहां श्रमिकों की हालत बहुत बुरी है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऐप्पल फोन तथा लैपटॉप ठेके पर बनाने वाली कंपनी फॉक्सकॉन में काम करने वाले श्रमिकों से यह बांड लिखवाया जाता है कि अगर उन्होंने आत्म हत्या कर ली तो उनके परिवार को कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। लगातार दो-दो शिफ्ट में काम करना कम्युनिस्ट चीन में श्रमिकों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। पैसे भी उतने ही मिलते हैं जिसमें सिर्फ पेट ही भर सके।

चीन ने सुपरपॉवर बनने का सपना तंग श्यायोपिंग के समय से ही पालना शुरू कर दिया था और उसके लिए दीर्घकालीन योजनाएं बनानी शुरू कर दीं। शी ने इसे और आगे बढ़ाया। उन्हें समझ में आ गया था कि बिना ‘कटिंग एज टेक्नोलॉजी’ के उनका देश सुपरपॉवर नहीं बन सकता। इसके लिए चीन ने हर जगह से टेक्नोलॉजी पाने की जुगत भिड़ानी शुरू कर दी, लेकिन यह धीमी  प्रक्रिया थी और उसे काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। फिर उन्हें एक लाख टके का आइडिया सूझा। चीन ने पहले अंग्रेजी की पढ़ाई पर ज़ोर दिया और फिर अपने बच्चों को अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों तथा यूनिवर्सिटी में भेजना शुरू कर दिया। चीन के हजारों बच्चे अमेरिका में पढ़ने लगे। उनकी फीस तथा अन्य खर्चे चीन सरकार ने उठाना शुरू कर दिया। जहां भारतीय छात्र-छात्राएं 11 प्रतिशत ब्याज पर ऋण लेकर अमेरिका-यूरोप पढ़ने जाते हैं और वहां आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, वहीं चीनी बच्चे अमेरिका में कारों पर घूमते देखे जा सकते हैं। इस समय अमेरिका में लगभग पौने चार लाख चीनी छात्र-छात्राएं शिक्षा पा रहे हैं और सभी को चीन सरकार से मदद मिलती है।

अमेरिकी विश्वविद्यालयों को अरबों का तोहफा

लेकिन चालाक चीन ने अपने बच्चों को बेहतरीन संस्थाओं में प्रवेश दिलाने के लिए इसके बाद दूसरी चाल चली। यह थी सीधे वहां के कॉलेजों एवं यूनिवर्सिटीज को पैसे देना। ताजा रिपोर्ट के अनुसार चीन ने अमेरिका के बड़े शिक्षा संस्थानों को करीब एक अरब डॉलर के उपहार या दान दिये हैं। अकेले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को उसने सौ मिलियन डॉलर का दान या उपहार दे रखा है। इसके अलावा यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वानिया और स्टैनफोर्ड तथा न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी को भी करोड़ो के उपहार वगैरह दिए गए हैं। यह राज, राज ही बना रहता, अगर हावर्ड के एक केमिस्ट्री प्रोफेसर की गिरफ्तारी नहीं हुई होती। उस घटना के बाद तो चीन के षडयंत्र उजागर हो गए। उस जैसे कई प्रोफेसरों को चीन ने धन देकर अपने छात्र-छात्राओं की मदद करवाने का काम किया और रिसर्च लीक करवाये। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अमेरिकी यूनिवर्सिटीज से चीन ने बहुत से रिसर्च रिपोर्ट पा लिये हैं।

इन सभी का नतीजा है कि चीन ने टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी जबर्दस्त छलांग लगाई है और कई ऐसी चीजें बनानी शुरू कर दी हैं जो पहले उसके बस की नहीं थी। बड़ी-बड़ी मशीनों से लेकर नैनो टेक्नोलॉजी तक से लैस उत्पाद बनाने का काम वहां धड़ल्ले से चल रहा है। इनका उपयोग आधुनिक सैन्य सामग्री जैसे ड्रोन, दूर तक देखने वाले रेडार, परमाणु चालित पनडुब्बी वगैरह में किया जा रहा है। इनका साथ लेकर चीन ने अपनी सेना को बेहद मजबूत बना लिया है।

एक कारोबारी अब दुनिया का थानेदार बनने को तैयार है।

मधुरेन्द्र सिन्हा
Madhurendra Sinha is a senior journalist with vast experience in print and web based journalism. Currently he is the Editor with Policy Pulse.

One thought on “दुनिया का थानेदार बनने की जुगत में है चीन

  1. Very informative analysis by Madhurendra Sinha. Thanks for this hidden agenda by China. An eye opener.

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