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अधिसंख्य किसान तो खड़ी फसल बेचने को ही मजबूर

कृषि कानूनों को लेकर माहौल गरम है। लंबे समय से किसान दिल्ली को घेरे बैठे हैं और दिल्ली उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है। मैं कोई विधिवेत्ता तो हूं नहीं कि इस विवादास्पद अधिनियम के वैधानिक पहलुओं पर अपनी कोई राय दे सकूं, पर कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां जो मुझे सूझ पड़ती हैं, उन्हीं जरूर साझा करना चाहता हूं।

साल तो मुझे नहीं याद, पर दशक पुरानी बात जरूर होगी। मैं अपने खेत में धान की कटनी की तैयारी कर रहा था, तभी मेरे ही गाँव के बाबू बिचको सिंह आते हुए दीख पड़े। हाल-चाल के साथ मैंने उनसे पूछा कि कहां से आ रहे हैं। पहले कुछ ना-नुकुर करने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि वे देव बाजार से आ रहे हैं और अपने धान का सौदा कर के लोटे हैं। मुझे यह जान कर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने यह सौदा न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी कम में तय कर दिया था क्योंकि व्यापारी इससे अधिक देने को तैयार ही नहीं था, जबकि पैसों की जरूरत उन्हें तत्काल थी। यह जानकर मैंने उनका धान खुद खरीदने की पेशकश की। पहले तो वे घबराये कि जाने मैं उसकी क्या कीमत लगाऊंगा और फिर पूरे पैसे भी तत्काल दूंगा या नहीं। पर जब मैंने विश्वास दिलाया कि मैं उनका धान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही लूंगा और वह भी नगद पैसे देकर तो कुछ सकुचाते हुए उन्होंने मुझसे पैसे ले लिए और मुझे अपने खेत से ही धान उठाने के लिए अधिकृत कर दिया।

आज जब सरकार कह रही है कि उसके द्वारा पारित

किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक, 2020 अनुमति देता है कि उपज का राज्यों के बीच और राज्य के भीतर व्यापार निम्नलिखित के बाहर भी किया जा सकता है: (i) राज्य एपीएमसी एक्ट्स के अंतर्गत गठित मार्केट कमिटी द्वारा संचालित मार्केट यार्ड्स के भौतिक परिसर, और (ii) राज्य एपीएमसी एक्ट्स के अंतर्गत अधिसूचित अन्य बाजार, जैसे निजी मार्केट यार्ड्स और मार्केट सब यार्ड्स, प्रत्यक्ष मार्केटिंग कलेक्शन सेंटर्स और निजी किसान उपभोक्ता मार्केट यार्ड्स। उपज के उत्पादन, उसे जमा और एकत्र करने वाली किसी भी जगह पर व्यापार किया जा सकता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) फार्म गेट्स, (ii) कारखाने के परिसर, (iii) वेयरहाउस, (iv) सिलो, और (v) कोल्ड स्टोरेज।

तो मैं चिन्ता में पड़ गया हूं कि जब मैंने बाबू बिचको सिंह से उनका धान खरीदा था, तब क्या मुझे कानूनन ऐसा करने की अनुमति नहीं थी? और मैं ही क्यों, देव बाजार के उस व्यापारी को भी सीधे किसी किसान के खेत से धान खरीदने की अनुमति नहीं थी क्या? या फिर तब कोई ऐसा कानून था जो बाबू बिचको सिंह को ही अपने खेत से अपना धान बेचने से रोकता था। जिस भी किसान को आयकर लाभ नहीं चाहिए, वह अपनी उपज  राज्यों के बीच और राज्य के भीतर कहीं भी बेचने के लिए तब भी उतना ही स्वतंत्र था, जितना कि इस कानून के बन जाने के बाद आज है। हां, तब भी इस बात की गारंटी नहीं थी कि उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा, और इस नए कानून से भी उसे इसकी गारंटी नहीं मिली है। यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि देश में छोटे एवं सीमांत किसान 82 फीसदी हैं जिनकी कुल आय इतनी नहीं कि उन्हें आयकर की छूट की जरूरत भी हो। मतलब यह कि देश के बहुसंख्य किसान को इस कानून से कोई लाभ नहीं होने जा रहा।

जो लोग खेती-किसानी को समझते हैं और किसान की दुर्दशा से परिचित हैं, वे जानते हैं कि अमूमन किसान अपनी खड़ी फसल को ही बेच देने के लिए बाध्य रहता है। उसके ऊपर इतनी देनदारियां होती हैं कि अपनी महीनों की मेहनत के नतीजे को वह औने-पौने दामों में निकालकर अपने को उऋण करने की चिन्ता में होता है। जब कभी तो ऐसा भी होता है कि उधार के भुगतान के तौर पर महाजन ही उसकी फसल कटवा डालता है और उसके हाथों में कुछ नहीं आता।

सरकार बिलकुल सही कह रही है कि कृषि संबंधी तीनों ही अधिनियमों में न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात नहीं की गई। यही तो दिक्कत है कि नहीं की गई, जबकि की जानी चाहिए थी। इससे पहले अलिखित परिपाटी के तहत वह अपनी उपज राज्यों के बीच और राज्य के भीतर बेचने के लिए स्वतंत्र था पर जब इसे लिखित रूप दे दिया गया है तो जरूरी है कि इस कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात भी लिखित हो।

ऊंची कीमत की आशा में वह अपनी उपज लेकर कहीं दूसरे राज्य में चला भी जाए तो इस विधेयक में कौन सा ऐसा प्रावधान है जो उसे छले जाने से बचा सकेगा। सरकार के अनुसार,

व्यापार संबंधी विवाद का कोई भी पक्ष सुलह के माध्यम से राहत के लिए सब डिविजनल मेजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकता है। मेजिस्ट्रेट एक कंसीलिएशन बोर्ड नियुक्त करेगा और उस विवाद को बोर्ड को सौंप देगा। अगर विवाद 30 दिनों बाद भी नहीं सुलझता तो सभी पक्ष विवाद को निपटाने के लिए मेजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकते हैं। पक्षों के पास यह अधिकार है कि वे मेजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ अपीलीय अथॉरिटी (कलेक्टर या कलेक्टर द्वारा नामित एडीशनल कलेक्टर) में अपील कर सकते हैं।

अव्वल तो इसमें यही स्पष्ट नहीं है कि किस जिले के एसडीएम के पास विक्षुब्ध किसान जा सकेगा। क्या वह उस जिले के एसडीएम के पास जाएगा, जहां का वह निवासी है या उस जिले के एसडीएम के पास, जहां कि उसने सौदा किया है। कहीं जो उसे उस राज्य या जिले के एसडीएम से मिलना पड़ा जहां कि उसने सौदा किया है तो क्या आपको लगता है कि जिस किसान को अपने जिले के एसडीएम या डीएम से मिलने के लिए घंटों उसके कमरे के सामने खड़ा रहना पड़ता है और उसके सामने पड़कर भी वह सीधा खड़े होकर अपनी बात नहीं कह पाता, वह विवाद की स्थिति में किसी दूसरे राज्य तो क्या, किसी दूसरे जिले के एसडीएम या डीएम से मिलकर अपनी बात कह सकेगा?

जहां तक मैं समझ पाया हूं, एसडीएम को यह तक बताने की जरूरत नहीं समझी गई है कि उसके फैसले का आधार क्या है। ऐसे में अपीलीय अथॉरिटी के पास जाने की नौबत आई तो वह क्या समझ कर उस अपील पर विचार करेगा, यह भी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में पूरे मामले की सुनवाई फिर से करनी पड़ सकती है, जिसमें दोनों पक्षों का समय तो खराब होगा ही, लोक सेवक का भी कीमती समय जाया होगा।

रंजन कुमार सिंह
लेखक-पत्रकार-फिल्मकार रंजन कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्स से सफर शुरु कर टीवी की दुनिया में कदम बढ़ाया। अनके टीवी कार्यक्रम का निर्माण-निर्देशन करने के साथ ही वह अब तक आठ पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से तीन हिन्दी की तथा शेष अंग्रेजी की हैं। देश-विदेश में वह भारतीय कला-संस्कृति तथा भारतीय हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान के लिए भी बुलाए जाते रहे हैं। वह अनेक शिक्षा संस्थानों तता अकादमियों से भी जुड़े रहे हैं।

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