Donald Trump
विदेश

चीन की दखलंदाजी से ट्रम्प को फायदा

रविकान्त सिंह

रविकान्त सिंह
रविकान्त सिंह

हर चार साल बाद विश्व में दो बड़ी महत्वपूर्ण घटनाएँ होती हैं – पहला तो ओलम्पिक खेल और दूसरा अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव। इस साल ओलम्पिक खेल तो कोरोना वाइरस के कारण स्थगित करने पड़े लेकिन ऐसा अमेरिकी चुनाव के साथ होता बिलकुल नहीं दिख रहा है। ख़ास तौर पर तब जब ट्रम्प अपनी स्थिति को मज़बूत पा रहे हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ लोकप्रिय मुहीम छिड़ी हुई थी क़ि अचानक सब कुछ बदल गया। आखिर ट्र्म्प ने अमेरिकी नागरिकों पर कौन सा जादू मन्तर फूँक दिया? किया वास्तव में तो चीन ने, लेकिन इसका भरपूर फायदा अब ट्रम्प उठाने में लगे हैं। अमेरिका की मीडिया में उनके खिलाफ जो खबरें आ रहीं थीं, अचानक उसमें चीन का हाथ होने का खुलासा हुआ है और इसने वहां जनमत ट्रम्प के पक्ष में घुमा दिया है। जहां यह लग रहा था कि ट्रम्प बड़ी मुश्किल ही दुबारा चुनाव जीत पाएंगे, वहीं अब वे डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बिडेन के खिलाफ बहुत ही मज़बूत दिखाई पड़ने लगे हैं। अब तो माना यही जा रहा है कि 8 नवंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव वे आसानी से जीत लेंगे।
इस बदली हुई स्थिति को समझने के लिए अमेकियों का मिजाज समझना जरूरी है। आधुनिक युग के सबसे महान चिंतक एवं दार्शनिक स्वामी विवेकानंद ने सन 1897 में अपनी पहली विदेश यात्रा से लौटने के बाद कहा था क़ि अलग-अलग देशों की अलग अलग सोच है और इसे समझने के लिए उस देश के मूल विचार को जानना ज़रूरी है। जैसे भारत में लोगों को कुछ भी समझाने के लिए धर्म का सहारा लेने की ज़रूरत होती है तो ब्रिटैन के लोगों को राजनीति के सहारे कोई बात आसानी से समझाई जा सकती है। ठीक उसी तरह अमेरिका के लोगों को समाजिक न्याय के दम पर कोई भी बात मनवाई जा सकती है।
लेकिन वहीं अगर अमेरिकियों को ज़रा भी भनक लगी की कोई उनके साथ धोखे से कुछ करवाने की कोशिश कर रहा है तो बात ठीक उलटी हो जाने का खतरा रहता है। इस मामले में भी यही हुआ। कोरोना वाइरस के फैलने के बाद से लगातार चीन के साथ ट्र्म्प के संबंध बिगड़ते ही जा रहे हैं। ऐसे में चीन ने अमेरिकी अखबारों में ट्रम्प के खिलाफ समाचार डलवाने शुरु कर दिए। पहले तो लोगों पर इसका बड़ा ही भारी असर हुआ और लोग ट्रम्प के खिलाफ होने लगे, पर जैसे ही इसमें चीन की दखलंदाजी की बात सामने आई, पासा पलट गया। इस बात से अमेरिकी जनता खीज गई क़ि कोई दूसरा देश उनके घरेलू मामलों में दखल देने की हिम्मत कैसे कर सकता है?
अमेरिकी इतिहास को ध्यान से देखें तो यह बात आसानी से समझी जा सकती है। 4 जुलाई, 1776 को अमेरिका ने अपने आप को स्वतंत्र घोषित किया था। तब तक उसपर ब्रिटेन का कब्जा था। उस समय अमेरिका में ब्रिटेन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजानेवालों में अधिकांश आयरिश मूल के लोग थे। आयरलैंड के लोगों को अपनी आज़ादी बेहद प्यारी है और इसी कारण उन्होंने कभी ब्रिटेन की राजशाही को स्वीकार नहीं किया। अमेरिका में खेलों से लेकर सड़क पर चलने के नियम सभी कुछ ब्रिटेन से ठीक उलटे हैं। क्रिकेट की जगह बेसबाल, तो रग्बी की जगह अमेरिकी फुटबॉल – सब कुछ ठीक उल्टा।
अब उनकी नई लड़ाई जब चीन के साथ है तो उनका गुस्सा चीन को लेकर खासा तेज है। और जैसे ही चीन ने उनकी अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप शुरू किया, पासा उल्टा बैठने लगा। फिर भी अभी चुनाव में पूरे चार महीने बाकी हैं और ट्रम्प की स्पष्ट जीत हार में भी बदल सकती है। लेकिन एक बार बाज़ी उनके हाथ में आ जाए तो ट्रम्प आसानी से उसे गंवाने वालों में नहीं हैं। ऐसे में लगता तो यही है कि चार साल और ट्रम्पशाही ही चलेगी।

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