समाज

जीते चाहे कोई, हारती है जनता

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भारतीय लोकतंत्र में आप अल्पसंख्यक होकर तो रह सकते हैं, पर असंगठित होकर नहीं. आप खुद कितने ही काबिल क्यों न हो, आपकी पहचान जमात या फिर छाप से होती है, आपकी योग्यता और ईमानदारी से नहीं. वोटर भी यहाँ जीतने वाले घोड़े पर दांव लगाना चाहते है, हारने वाले पर नहीं. और इस जीत-हार का बोध उन्हें इस बात से होता है कि आपके पीछे कितनी बड़ी जमात खड़ी है. यदि आप अपनी जाति के नेता नहीं हैं, या फिर किसी ऐसी पार्टी के टिकेट पर नहीं खड़े हैं, जिसके पीछे जमात चल रही हो तो आपको सबसे बेहतर समझते-जानते हुए भी वोटर दरकिनार कर दें तो आश्चर्य नहीं. ऐसे में देखा यह जाता है कि अमुक क्षेत्र में कितने वैश्य, कितने राजपूत, कितने भूमिहार, कितने पासवान हैं, न कि उम्मीदवारों के गुण-दोष. आप स्वयं में कितने ही अच्छे या बुरे क्यों न हों, मायने सिर्फ यह रखता है कि आपको वोट देने से कहीं दूसरी जाति का उम्मीदवार तो नहीं जीत जायेगा.

किसी पार्टी के टिकेट की गारेंटी भी यहाँ आपका अच्छा-बुरा होना नहीं होता, बल्कि यह होता है की आप किस नेता के साथ कितनी शिद्दत से खड़े हैं. ऐसे में राजनीतिकों की निष्ठा जनता के प्रति कम और उन नेताओं के प्रति अधिक रहना स्वाभाविक है जो लड़-झगड़ कर भी अपने ख़ास लोगों का टिकट सुनिश्चित करा सकते हैं. जाति और जमात के अलावा पैसा और शराब भी वोट का पैमाना बन जाते हैं. धन बल पर निष्ठा खरीदी-बेचीं जाती है, चाहे वह आम वोटर हो या फिर टिकट बांटने वाले नेता, धन बल के आगे सभी नतमस्तक नज़र आते है. ऐसे में जीते चाहे कोई भी, हारती है जनता ही. हमारे संविधान निर्माताओं ने सबों को वोट का अधिकार तो दे दिया, पर उन्हें वोट देना नही सिखाया. इसका खामियाजा यह देश आज तक भोग रहा है.

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