साहित्य

मौसम जुआ-जुआ

रंजन कुमार सिंह

cardsमेरे मित्र ने हर साल की तरह मुझे दीपावली के पहले भोज का निमंत्रण दिया तो मुझे याद हो आया कि जुआ का मौसम आ चला है। दरअसल, साल में एक बार ही हमें उनके घर से बुलावा आता है और वह भी ठीक दीपावली से पहले। मित्र सरकारी सेवा में हैं और पांक में रहकर भी पंकज की तरह पवित्र माने जाते हैं। ईमानदारी के लिए सरकार किसी को तमगा नहीं देती, बेइमानी के लिए उसे दंड जरूर दे देती है। हां, अगर ईमानदारी का तमगा दिया जाता तो मेरे मित्र उसके सशक्त दावेदार हो सकते थे। सभी काम या यूं कहें कि सभी का काम वह बड़ी ही तत्परता से करते हैं। न कभी किसी से उन्होंने कोई मांग की है और ना ही कोई उन्हें कुछ देने की हिम्मत कर पाया है। हां, दीपावली अलग है। इस दिन तो वैसे भी देने की परम्परा है। हालांकि यह परम्परा कब शुरु हुई, किसी को नहीं मालूम। दीपावली हम मनाते हैं श्री रामचन्द्र के अयोध्या लौटने की खुशी में। बताते हैं कि श्रीराम जब चौदह साल का वनवास खत्म कर अयोध्यापुरी लौटे तो अयोध्यावासियों नें पूरी अयोध्या को दीपों से जगमग कर दिया। पर तब कोई अयोध्या के हुक्मरानों के यहां भेट लेकर पहुंचा था, यह मुझे नहीं पता। अयोध्यापुरी में तब कोई जुआ खेलता था, मैंने ऐसा भी नहीं सुना।

बहरहाल, दीपावली पर भेंट देने की परंपरा की शुरुआत का तो मुझे पता नहीं, पर इन मित्र के यहां दीपावली की दावत की परंपरा तो संभवतः तभी शुरु हुई, जबकि वे सरकारी सेवा में आए। अगर उससे भी पहले से यह परंपरा चल रही हो तो मुझे नहीं मालूम। पहली बार मेरे मन में इन मित्र के लिए इज्जत जागी थी, जब उन्होंने बिना किसी लेन-देन के मेरा काम निबटा दिया। सरकारी सेवा में ऐसा विरले ही करते हैं। काम हो जाने के बाद भी मैंने उनके यहां फल-मिठाई भिजवाना चाहा तो उन्होंने उसे लौटा दिया। सच कहूं तो मुझे तब डर लगा था कि मेरी इस गलती की सज़ा कहीं मुझे अगले काम में तो नहीं भुगतनी पड़ेगी? अपने अनुभव के आधार पर मैं जानता था कि सरकार में दो तरह के अफसरान हैं – एक जो अपनी ईमानदारी को लेकर इतने आक्रांत हैं कि कोई काम न खुद करते हैं और ना अपने मातहतों को करने देते हैं। और दूसरे वे जो इसीलिए काम की ताक में रहते हैं ताकि लेन-देन भी चलता रह सके। वैसे अनेक लोगों का मानना है कि ये दूसरे तरह के अफसर विकासशील प्रकृति के होते हैं। सरकार का कामकाज वही आगे बढ़ाते रहे हैं। लेकिन इन मित्र के आगे पड़कर मेरा सारा अनुभव धरा का धरा रह गया था। ये उस कोटि में थे जो काम के पक्के थे, पर जिन्हें लेन-देन से सख्त परहेज था।

और मैंने अपनी एक गलती से उन्हे नाराज कर दिया था। कम से कम तब तक मैं ऐसा ही मानता रहा था, जब तक कि उन्होंने दीपावली के पहले फोनकर मुझे अपने घर खाने के लिए नहीं बुलाया। मेरे लिए यह अप्रत्याशित था। अनेक अफसर मित्रों के यहां तो मैं बिन बुलाए ही पहुंच जाता हूं दीपावली की ‘शुभकामनाएं’ लेकर। कहने को तो ये ‘शुभकामनाएं’ छोटे से तोहफे के साथ होती हैं, पर तोहफा भारी न हो तो वह बाहर उनके अर्दली के हाथों में ही रह जाता है। घर की लक्ष्मी तक वह तभी पहुंचता है, जब उस तोहफे पर खुद लक्ष्मी सवार हों। दीपावली में लक्ष्मीजी की पूजा की परंपरा भी मेरे लिए आश्चर्य का कारण बनी हुई है। विजयदशमी या दशहरा पर श्रीरामचन्द्र जी के हाथों रावण का वध किए जाने के बाद हम मानों श्रीराम को भूल ही जाते हैं। हमारे घरों तक श्रीराम तो कभी आते ही नहीं, फिर रामराज्य क्योंकर आए? दीपावली की सर-सफाई और सजावट तो हम इसलिए करते हैं कि हमारे घरों में लक्ष्मी मइया का आगमन हो सके। दीपावली की रात तो हम अपने घर की सारी खिड़कियां तक खोल कर रखते हैं कि जाने लक्ष्मीजी किस रास्ते से हंमारे घर में प्रवेश करना चाहें। बीच-बीच में हम कनखियों से यह भी देख लेते हैं कि कहीं पड़ोसी का घर हमसे अधिक तो नहीं जगमगा रहा? ऐसा तो नहीं कि लक्ष्मी मइया पड़ोस के घर में जा घुसें और फिर इधर का रुख ही न लें?

लक्ष्मीजी को लेकर हम सब कुछ ज्यादा ही स्वार्थी हैं। मेरे ही घर में वह आएं, ऐसी सबों की इच्छा रहती है। माँ सरस्वती को लेकर ऐसा नहीं है। माँ दुर्गा को लेकर भी ऐसा नहीं है। दुर्गा पूजा का पांडाल हर गली-नुक्कड़ पर सजता है। लोग नवरात्रि की पूजा भले ही अपने-अपने घरों में कर लें, पर माँ दुर्गा के आशीर्वाद के लिए तो पूजा-पांडाल तक ही जाते हैं। ऐसा ही सरस्वती पूजा में भी होता है। वैसे अब सरस्वती पूजा का चलन कम से कम ही होता जा रहा है। बचपन में मुझे याद है कि जहां हर गली में माँ सरस्वती के लिए पांडाल सजाया जाता था, वहीं अब यह मुहल्ले में एक जगह भी हो तो बड़ी बात है। वैसे माँ सरस्वती के लिए पांडाल सजानेवालों को भी माँ लक्ष्मी की ही आस रहती है। यदि लक्ष्मी मइया की कृपा न रहे तो सरस्वतीजी की जय शायद ही हो। लक्ष्मी और सरस्वती के वैर की कहानी मैं बचपन से ही सुनता रहा हूं। कहते हैं कि एक जाती है, तभी दूसरी आती है। दुर्गा पूजा से लेकर गणेश उत्सव तक सामूहिकता का पर्व-त्योहार है। मगर लक्ष्मी पूजा के साथ ऐसा नहीं है। हरेक घर में अलग-अलग लक्ष्मीजी का होना आवश्यक है और उनके चरणों का रुख हरेक घर के लिए भी अलग-अलग ही होता है। लक्ष्मीजी का तिरस्कार बड़ा महंगा पड़ता है और इसीलिए जिन उपहारों पर माँ लक्ष्मी स्वयं सवार होकर आई हों, उन्हें सीधे घर के भीतर की राह मिल जाती है।

लेकिन इन मित्र के आमंत्रण ने मुझे असमंजस में डाल दिया था। एक बार (बेशक काम होने के बाद) उनके घर फल-फूल भिजवाने पर मैं उनकी शान में गुस्ताखी कर चुका था। अब फिर ऐसा कुछ करना मेरे लिए भारी पड़ सकता था। इसलिए उनके सौजन्य का सम्मान करते हुए मैं उनके घर समय पर जा पहुंचा, जबकि उनकी ईमानदारी का सम्मान करते हुए खाली हाथ ही गया। पर वहां का नजारा ही कुछ और था। जो कोई भी आ रहा था, सभी के हाथों में भारी-भरकम ‘शुभकामनाएं’ थीं, जिसे वह बड़े ही सहर्ष भाव से ग्रहण भी करते जा रहे थे। मैंने सकुचाते हुए कहा – मैं तो समझता था कि आप कुछ भी लेना पसन्द नहीं करते, इसलिए खाली हाथ ही आ गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – बिलकुल सही किया आपने। किसी से कुछ लेना मैं आज भी नहीं चाहता हूं, पर लोग हैं कि अपनी आदत से बाज नहीं आते। अब दीपावली के समय उन्हें इनकार भी तो नहीं कर सकता। भला कौन चाहेगा कि लक्ष्मी माँ उससे रूठ जाएं? उनकी इस बात से मुझे अपनी भूल का एहसास फिर से हुआ। और अपनी इस भूल को सुधारने के लिए मैं रमी की बाजियां उनसे लगातार हारता रहा – पत्ते बुरे हों तो भी दांव लगाते रहकर और अच्छे हों तो पैक कर के। और मैंने पाया कि वहां आमंत्रित सभी ऐसा ही कर रहे थे।

हां, उसके बाद मैंने अपनी वह गलती कभी नहीं दुहराई। एक बार फिर इन मित्र का निमंत्रण दीपावली पर है तो उन्हें ‘शुभकामनाएं’ देने तो जाना ही है!

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