पेंगांग लेक
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पेंगांग त्सो और चीनी होटल

ऊपर आप जो चित्र देख रहे हैं, वह पेंगांग त्सो का है। त्सो लद्दाखी में झील या लेक को कहते हैं। यानी यह पेंगांग लेक है, जो इन दिनों खबरों में बना हुआ है। मैं यहां तीन बार जा चुका हूं और हर बार मैंने इसे नए नजरिये से देखा है। पहली बार मैं यहां 1999 में करगिल युद्ध के फौरन बाद आया था। तब यह पूरा इलाका बेहद शांत हुआ करता था और बहुत कम लोगों को ही वहां तक जाने की मंजूरी थी। भारतीय फौज जब करगिल में व्यस्त थी, उसी समय मौके का लाभ उठाकर चीनियों ने इस इलाके में सड़क का निर्माण कर लिया था, पर तब इससे कोई खतरा नहीं दिखता था। अगर चीनी सेना इस सड़क पर पेट्रोलिंग करती थी, तो भारतीय सेना भी ऐसा ही करती थी। दोनों सामने-सामने पड़ भी जाते थे तो एक-दूसरे को हाथ हिलाकर मुड़ भी जाते थे।

पैंगांग लेक पर लेखक
Ranjan Kumar Singh at Pangong Tso

आखिरी बार मैं वहां 2013 में गया था और तब तक ‘थ्री इटियट्स’ फिल्म आ चुकी थी, जिसका क्लाइमेक्स इसी लेक के साथ फिल्माया गया था। फिल्म मे इसकी खूबसूरती से आकर्षित होकर पर्यटक भारी संख्या में वहां पहुंचने लगे थे। सबसे बड़ा अन्तर यह आया था कि वहां एक होटल एवं कुछ रेस्टूरेंट बन गए थे। हमारे लिए तब सबसे चौंकानेवाली बात यह थी कि होटल किसी चीनी नागरिक था और मुझे याद है कि हमारी उससे बड़ी झड़प भी हुई थी। हमारे साथ की कुछ महिलाओं को टॉयलेट का उपयोग करना था और होटल मालिक इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। हमारा कहना था कि तुम चीन से भारत में आकर होटल बना ले सकते हो और हम भारतीय होकर उसका उपयोग नहीं कर सकते? बहुत झगड़ने पर वह माना था और शायद इसके लिए उसने हमसे कुछ रुपये भी लिए थे। काश कि हमने उस समय उसकी कुछ पिटाई की होती तो मेरे कलेजे को आज थोड़ा आराम महसूस हो रहा होता।

बहरहाल, 1999 में मैं सरहद के दौरे के क्रम में वहां पहली बार पहुंचा था और मैंने सरहद की जिन्दगी पर फिल्म बनाने के अलावा सरहद जीरो मील नामक पुस्तक भी लिखी थी। यह नियंत्रण रेखा की जिन्दगी पर लिखी मूल हिन्दी में एकमात्र पुस्तक है, जिसमें भोगा हुआ यथार्थ है। यह पुस्तक स्याही से नहीं लिखकर खून से लिखी गई है क्योंकि इस क्रम में मैंने जीवन और मृत्यु का खेल देखा है। पुस्तक को रक्षा मंत्रालय ने तो अपने राजभाषा पुरस्कार के योग्य जरूर समझा, पर हिन्दी जगत और खासकर हिन्दी के मूर्ध्यन्य आलोचकों ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी क्योंकि मैं न तो वामपंथी खेमे में हूं और न दक्षिणपंथी खेमे में। पाठकों का प्यार जरूर मिला, खासकर फौजियों का जिन्हें इसमें अपनी जिन्दगी की सच्ची झलक दिखलाई पड़ी। उसी पुस्तक से इस इलाके का वृतान्त मैं नीचे दे रहा हूं। चीनी अतिक्रमण की वजह से बीस साल पुरानी यादें फिर से लौट आई हैं और वे सभी दृश्य एक बार फिर से ताजा हो उठे हैं।

सरहद जीरो मील से

बाहरी पर्यटकों के लिए तो लेह की मुश्किल पहले दिन से ही शुरू हो जाती है। दरअसल, यहां हवा का दबाव इतना कम है कि साँस लेना दूभर लगता है। हवाई जहाज से आनेवाले पर्यटकों को पहले दिन चुपचाप आराम करने की सलाह दी जाती है। दूसरे दिन उनसे हल्के-फुलके काम करने को कहा जाता है और तीसरे दिन तक ही वे यहां की जलवायु और पारिस्थितिकी के अभ्यस्त हो पाते हैं। चूंकि हम यहां सड़क मार्ग से आए थे और वह भी रास्ते में रुकते-रुकते यहां पहुंचे थे, इस कारण हमें यहां की जलवायु से तादात्म बैठाने में अधिक समय नहीं लगा। जिस नियंत्रण रेखा के साथ-साथ हम संगम से यहां तक बढ़े चले आए थे, अब हमें उसे छोड़कर चीन के साथ की अपनी सरहद की तरफ जाना था। पश्चिम में लाईन ऑफ कंट्रोल (नियंत्रण रेखा) है तो पूर्व में लाईन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (वास्तविक नियंत्रण रेखा), जो कश्मीर को भारत और चीन के बीच बांटती है। 

चांग ला पर लेखक
Ranjan Kumar Singh at Chang La

अगले दिन ही हम चुशूल के रास्ते पर थे। चुशूल जाने के लिए चांग ला से गुजरना पड़ता है, जो दुनिया का दूसरे नंबर का सबसे ऊंचा मोटर मार्ग है। कुछ समय पहले तक इसे तीसरे नंबर पर माना जाता था, पर नए अध्ययन में इसने रोहतांग को पछाड कर अपना स्थान खरदुंग ला के बाद दूसरे नंबर पर कर लिया। यहां पहुंचकर लगा कि मानो साँस रुंध रही है। संभवतः हम यदि चुपचाप गाडी में बैठे रहते तो यह स्थिति न होती, पर तब हम यहां बैठने तो आए नहीं थे। कैमरा और ट्राइपॉड उठाकर थोड़ी दूर चलते-चलते ही हम हाँफ उठे। 

चांग ला से आगे बढ़ने पर दूर-दूर तक आबादी का कहीं नामो-निशान नहीं मिलता था। इस रास्ते से पेंगांग त्सो जाने के लिए सुबह-सुबह पर्यटक गाड़ियों की काफी भीड़ रहती है, पर शाम से पहले वे सभी लौटने लगती हैं। जबकि हम शाम की झुरमुट में ही पेंगांग की तरफ बढ़ रहे थे। रास्ते में जब कभी हमें चिरुओं के भुण्ड दिखाई दे जाते तो कहीं किआंग कुलाचें लगा रहे होते। चिरु हरिण की जाति का पशु है तो किआंग यहां का जंगली गधा। कहने को ही यह गधा है, नहीं तो वह अपनी चाल में घोड़े को भी मात कर दे। उसके ऊपर की धारियां उसे जेबरा की कोटि में भी ला रखती हैं। हालांकि याक यहां बहुतायत में हैं, पर वे तब हमें एक नहीं दिखे। संभवतः पालतू पशु होने के कारण उनके मालिक उन्हें ठौर की ओर ले जा चुके थे। न कहीं सड़क थी और न कहीं रौशनी। हम अंदाज से ही अपने गंतव्य चुशूल की तरफ बढ़ रहे थे। दोनो ओर के सतरंगे पर्वत भी अब अंधेरे में डूबकर धंधली आकृति भर रह गए थे। न कोई वहां हमें रास्ता दिखाने वाला था, न बताने वाला। बिजली के खंभों के साथ-साथ हम एक सीध में बढ़ते गए। दो-एक जगहों पर खंभे दो दिशाओं में मुड़े भी तो हमने अपनी दिशा और लीक नहीं बदली। अंततः हमें दूर कहीं रौशनी की मद्धिम किरण दीख पड़ी। मन में नई आशा जगी और हम तेजी से उधर बढ़े। वाकई वह हमारा गंतव्य चुशूल ही था। इस समय तक समय इतना अधिक हो गया था कि कोई भी हमारे आने की उम्मीद छोड़ चुका होता, पर यहां के फौजी मित्रों को दूर से हमारी गाड़ी की हेड लाईट चमकती दीख रही थी, अतः उन्हें निश्चिंतता थी कि हम पहुंच रहे हैं। 

रात भर फौजी कैंप में रुककर सुबह-सुबह ही हम पेंगांग के लिए रवाना हो गए। पेंगांग लेक की खूबसूरती बयान कर पाना लफ्जों से परे की बात है। लेक लगभग 165 किलोमीटर लंबा और सात किलोमीटर चौड़ा है। यह तालाब भारत से लेकर चीन तक में फैला है। सरहद इस लेक के दो किनारे नहीं हैं, बल्कि वह इस लेक को ही दो भागों में बांटती है। इस लेक का एक भाग हमारी सीमा में है, तो उसका दो-तिहाई भाग चीन की सीमा में। चारों ओर के सतरंगे पहाड़ लेक में उतरकर इसके पानी को भी सतरंगा बना देते हैं। बताते हैं कि इसमें गोल्डन ड्रैगन का वास है। जब-तब वह दीख पड़ता है, हालांकि हमें एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने खुद उसे देखा हो। बहुत संभव है कि लद्दाखी या तिब्बती कहानी का सुनहरा दैत्य ही अब लोगों की फंतासी में यहां उपस्थित हो रहता हो। सर्दियों में यहां का तापमान -45 डिग्री तक चला जाता है और तब इस तालाब के ऊपर बर्फ की इतनी मोटी परत जम जाती है कि उसपर मोटरसाईकिल चलाई जा सके। चीन के फौजियों के पास हिम स्कूटर है भी, जिस पर सवार होकर वे जब-कभी सीमा के निकट तक निकल आते हैं। 

पेंगांग लेक से वापस चुशूल न जाकर हमने रेजांग ला की राह पकड़ी। रास्ते में रिबो जाति के लोगों को छोड़कर कोई आबादी नहीं दिखी। रीबो यहां की खानाबदोश जनजाति है, जो भेड़ पालकर अपना गुजर-बसर करती है। ऊन बनाकर बेचना उनका मुख्य पेशा है। 1962 में इस सारे इलाके पर चीन ने कब्जा जमा लिया था। रेजांग ला में मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में हमारे बहादुर सिपाहियों ने उनसे डट कर मोर्चा लिया। हालांकि दुश्मन की तादाद के सामने उनकी संख्या नगण्य थी, पर हमारे आखिरी जवान और उसकी आखिरी गोली तक यह लड़ाई जारी रही। हमारे 114 जाबांज रेजांग ला की इस घाटी में शहीद हो गए। बताते हैं कि उनके शव बर्फीली तूफान में दफन हो गए और इलाके में शांति लौटने तथा बर्फ के पिघलने के बाद जब उन्हें खोज निकाला गया तो उनके हाथों में तब भी राइफलें जकड़ी हुई थीं। 

रंजन कुमार सिंह
लेखक-पत्रकार-फिल्मकार रंजन कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्स से सफर शुरु कर टीवी की दुनिया में कदम बढ़ाया। अनके टीवी कार्यक्रम का निर्माण-निर्देशन करने के साथ ही वह अब तक आठ पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से तीन हिन्दी की तथा शेष अंग्रेजी की हैं। देश-विदेश में वह भारतीय कला-संस्कृति तथा भारतीय हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान के लिए भी बुलाए जाते रहे हैं। वह अनेक शिक्षा संस्थानों तता अकादमियों से भी जुड़े रहे हैं।

2 thoughts on “पेंगांग त्सो और चीनी होटल

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