राजनीति

बड़ी महंगी पड़ी बिरयानी

उरि का बदला हमने भिंबर में लिया वहां स्थित आतंकियों के अनेक ठिकाने नेस्तनाबूत कर के। भिंबर पर आज भले ही पाकिस्तान का कब्जा हो, पर यह इलाका हमारा ही है। भिंबर शहर सहित भिंबर घाटी का बड़ा भाग पाक अधिकृत कश्मीर में है, जबकि नियंत्रण रेखा जिस जगह से गुजरती है, उसे भिंबर गली कहते है। यह इलाका हमारे पास है। 1999 में मैं यहां तक पहुंचा हूं। तब मैं नियंत्रण रेखा के आसपास की जिन्दगी पर फिल्म बना रहा था। रजौरी से पुंच के रास्ते में है भिंबर गली। यहां से घाटी का नजारा बड़ा ही मोहक है। यहां पहुंचकर समझा जा सकता है कि सिर्फ कश्मीर और डल झील ही कश्मीर की सुन्दरता नहीं है, बल्कि इस प्रदेश की सुन्दरता अनेक वादियों में पसरी हुई है। ठीक सरहद जीरो मील से इसकी सुन्दरता निहारने के बाद मैं दावे से कह सकता हूं कि यहां के सौंदर्य के गर्भ तक तो आम सैलानी कभी पहुंच ही नहीं पाता है। कश्मीर यदि बंटा न होता, कश्मीर में यदि आतंक का बोलबाला न होता, और कश्मीर में यदि बमों का चलन न होता, तो अन्तरराष्ट्रीय पर्यटक स्विटजरलैंड को भुला चुके होते। सुन्दरता से भरे-पूरे इस इलाके में बम गोलों के धमाके विरोधाभासी लगते हैं।

बीच में पीर पंजाल न होता तो आसानी से भिंबर गली या पुंच से उरि पहुंचा जा सकता था। वैसे हाजी पीर भी हमारे पास रहा होता तो भी हम आसानी से भिंबर गली और उरि के बीच आ-जा सकते थे। मुझे याद है, पुंच से जम्मू के रास्ते उरि जाने के दौरान हम नांगी टेकरी पर भी रुके थे। ऊपर से पूरी पुंच घाटी देखी जा सकती है।  रावलकोट सहित पुंच घाटी का एक बड़ा भाग पाकिस्तान के कब्जे में है। यहां से दुश्मन के अनेक ठिकाने दूरबीन लगाकर देखे जा सकते हैं। यहां तक कि हाजी पीर भी साफ-साफ दिखाई देता है। सदियों से पीर पंजाल पार करने का यही एक रास्ता रहा है। अब यह घुसपैठियों के काम आता है। पाकिस्तानी घुसपैठिये  भिंबर के आतंकी ठिकानों से पुंच या उरि में इसी रास्ते से आते हैं। यह पहली बार नहीं है कि इस रास्ते से घुसपैठ हुई हो। ना ही पहली बार हमने उनके कब्जेवाले इलाके में घुसकर उन्हे मारा है। सच तो यह है कि 1947 में पाकिस्तान ने कबायली हमले में हाजी पीर पर कब्जा जमा लिया था, पर 1965 युद्ध में हमने इस दर्रे को उससे फिर छीन लिया। यह हमारी बहुत बड़ी जीत थी और उसकी जबरदस्त हार। किन्तु फिर बिरयानी की दावत में हमने इसे गंवा दिया।

दरअसल, पंडित नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री जब प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान को लगा कि पूरा कश्मीर कब्जाने का उसके लिए अच्छा मौका है। इसके लिए तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो की शह पर ऑपरेशन जिब्राल्टर की योजना बनी। इस नाम का भारी महत्व था। अरब सेनापति अबुदुर्रहमान तारिक ने अब से सैकड़ों साल पहले जिब्राल्टर पर धावा बोला था। जिब्राल्टर पहुंचकर उसने अपनी तमाम नावें जला डालीं और अपने फौजियों के सामने चुनौती रखी – करो या मरो। वापसी के लिए उनके पास कोई उपाय नहीं था। ऐसा ही पाकिस्तान ने कश्मीर में करना चाहा। रजाकारों के भेष में उसके सैनिक उतारे गए और उनसे कह दिया गया कि जीत हासिल कर कश्मीर में रहो या फिर लड़ते-लड़ते वहीं मर जाओ। भारत को घुसपैठ के इस दबाव को कम करने का तब एक ही रास्ता सूझा, लाहौर पर चढ़ाई। पर इसके लिए हमें अन्तरराष्ट्रीय सीमा लांघनी थी। फौज के असमंजस को भांप कर शास्त्रीजी ने कहा – अगर वे हमारी सीमा में जबरन घुस आए हैं तो हमें उनकी सीमा को लांघने से गुरेज क्यों? इतना ही इशारा फौज के लिए काफी था। उसने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर उसके छक्के छुड़ा दिए। इस क्रम में हाजी पीर दर्रे पर भी हमारा कब्जा हो गया।

युद्ध के बाद सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति कोसिगिन ने भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता स्वीकराते हुए उनके नेताओं को ताशकंद बुलाया। शास्त्रीजी को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा – कृपया बिरयानी और कबाब खाने आप ताशकंद पधारें। निमंत्रण स्वीकार कर शास्त्रीजी ताशकंद जा पहुंचे। इस समझौता वार्ता में तिथवां के साथ-साथ हाजी पीर पर भी चर्चा हुई। न भारत इसे छोड़ने को तैयार था और न पाकिस्तान इसके बिना कोई समझोते के लिए राजी था। शास्त्री जी ने यहां तक कह दिया कि अगर आप हाजी पीर और तिथवां चाहते हैं तो आपको किसी और प्रधानमंत्री से बात करनी पड़ेगी। उनके इस कड़े रुख को देखकर पाकिस्तान ने वार्ता को खत्म मान लिया और वापसी की तैयारी में लग गए। तब मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे कोसिगिन ने अपनी साख बचाने के लिए एक और कोशिश की तथा शास्त्री जी को इस बात के लिए राजी कर लिया कि अगर पाकिस्तान भविष्य में भारत के खिलाफ कभी युद्ध न छेड़ने का लिखित वायदा करे तो भारत उसे हाजी पीर और तिथवां लौटा देगा। दोनों ने ऐसा ही किया। पाकिस्तान ने फिर कभी हमला न करने का लिखित वायदा किया और भारत ने हाजी पीर तथा तिथवां उसके हवाले कर दिए।

परिणाम सामने है। पाकिस्तान ने अपना वह वायदा कभी नहीं निभाया। बल्कि इस दर्रे का इस्तेमाल वह घुसपैठ के लिए करता ही रहा है, तब से लेकर आज तक। किसे पता था कि बिरयानी और कबाब की यह दावत भारत को इतनी महंगी पड़ेगी। इस दावत ने भारत से उसका लाल भी छीन लिया।

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