संस्कृति

नाचना थोड़े ही छोड़ दूंगा – पं0 बिरजू महाराज

राजेन्‍द्र उपाध्‍याय

Birju Maharajयों तो पंडारा रोड के मेरे घर के अगल-बगल में अनेक बड़े-बड़े अफसर, मंत्री, सांसद रहते हैं, जो कभी एक दूसरे से नहीं बोलते। अपने कुत्‍तों को घुमाते हुए दिख जाते हैं। शादी-ब्‍याह, खुशी-गमी में भी नहीं बुलाते। पर मैंने सुना है कभी यहां रंगकर्मी ब.व.कारथ, शुभा मुदगल आदि कलाकार भी रहते थे। आजकल भी ऐसे ही लोग रहते होंगे-मन में जिज्ञासा थी। न्‍यूयार्क स्‍थित कलाकार-लेखक मित्र विजयकुमार ने बताया था कि पंडित बिरजू महाराज भी यहीं रहते हैं। घर का नबंर नहीं मालूम था। एक दिन नेट से पता कर मैं डी-2/33 में पहुंच गया। नीचे का घर था। इसमें वे बरसों से रह रहे है। अब यह घर यह यह नंबर पंडित बिरजू महाराज के घर के नाम से मशहूर है। एक लड़का टॉवल सुखाने बाहर आया तो पूछा- ‘उस्‍ताद बिरजू महाराज’ यही रहते है। उसने कहा- हां पंडित बिरजू महाराज यहीं रहते है। अपनी गलती का अहसास हुआ। उस वक्‍त सुबह-सुबह उनसे मिलने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया। बाद में भी जाना टालता रहा। पता चला मुम्‍बई गए हैं। डी-2 के इन मकानों में कितने ही बड़े-बड़े अफसर आए और चले गए, उनको कौन याद रखता है। पंडित जी को सब याद रखेंगे।

एक दिन यूंही सुबह टहलने निकला और उनका किवाड़ खुला देखा तो घुस गया। कुत्‍ते का डर नहीं था। उस्‍ताद एक तख्‍त पर ड्राईंगरूम में बैठे थे। रूम हीटर चल रहा था। नहाधोकर प्रसन्‍न लग रहे थे। लखनऊ के अपने बाबा, चाचा, पिताजी अच्‍छन महाराज की तस्‍वीरें दिखाने लगे। उनका घर ही एक तरह का संग्रहालय है। उनकी इच्‍छा लखनऊ में एक कथक संग्रहालय बनाने की है। उसमें कथक से जुड़ी तमाम यादें रखने की योजना है। हाल ही में दिवंगत सितारा देवी की तस्‍वीरें, उनके घूंघरू-पाजेब, नृत्‍य-पोशाक भी उसमें रखना चाहते है। सितारा देवी उनको अपने घर का चिराग और बेटा मानती थी। घर का खलीफा मानती थी। आजकल ये सब मुहावरे पुराने पड़ गए है। हमारे लखनऊ में ये चलते थे।

उन्‍हें सरकार ने 1984 में पदमणिभूषण दिया था। उसकी तस्‍वीर खो गई है। उन पर बनी एक डाक्‍यूमेंटरी में तो है, पर उनके पास नहीं है। तमगा जरूर कहीं रखा है। उनको दुनिया भारत रत्‍न मानती है, पर सरकार नहीं। सरकार इंतजार करती है, कलाकार के मरने का। सरकार इंतजार कराती है। अभी जापान-मलेशिया-लंदन में प्रदर्शन करके लौटा हूं। जहां-जहां भी जाता हूं, लोग-बाग कहते हैं आप तो भारत रत्‍न हैं। सरकार दे या न दे, मैं नाचना थोड़े ही छोड दूंगा। मेरा काम, मेरी साधना, मेरी पूजा नाचना है, मैं नाचूंगा। दे या ना दें। पर समय रहते दे देते हैं तो अच्‍छा लगता है। काम में जोश आता है। उत्‍साह बढ़ता है। वे अपनी बड़ी-बड़ी आंखें घुमा-घुमाकर बोलते है।

पंडितजी ने बैठकखाने को ही अपना बेडरूम भी बना रखा है। उसी में पूजा भी करते हैं। लिखते-पढ़ते हैं। दीवान पर सोते है। दीवान पर ही एक टेवलमेट-टेबललैम्‍प भी रखा है। दीवान में ही तिजोरी जैसी दीवारें हैं। जिन में ताला लगा है। ड्राईंगरूम में ही सीसीटीवी कैमरा लगा है। जिस पर घर भर में हुई हलचलें वे देखते रहते है। दीपक महाराज भी उनके साथ ही रहते है। वे भी कथक करते है। पंडित जी के लिए उस्‍ताद अल्‍ला रक्‍खां और उनके बेटे जाकिर हुसैन ने भी तबला बजाया है।

पंडितजी को आज भी नए-नए तरह के कैमरे, रेडियो, वीडियो कमरे आदि इकट्ठा करने, खरीदने का शौक है। कत्‍थक नृत्‍य का लखनऊ घराना उनके घर का घराना है। उनका दिल्‍ली का घर भी संगीत-नृत्‍य का मंदिर है। इस फर्श ने कई घुंघरूओं की आवाज सुनी है। कई पैरों की थिरकन जानी है। संगीत की वे पदचापें सुनी देखी है, जिनके लिए दुनिया तरसती है। पंडित जी के रियाज का पहला गवाह पहला स्‍वाद इस फर्श ने जाना है। ये खिड़कियां-ये दीवारें, ये पेड़ उनकी कला के मर्म को जानते है। दिल्‍ली में भारतीय कला केन्‍द्र में सरकार ने उनको कत्‍थक नृत्‍य सिखाने के लिए रखा था। हमारे बीच कुछ देर चुप्‍पी भी रही। मैं उनको देखता रहा।

दिल्‍ली में शाहजहां रोड पर रहने से पहले वे मातासुंदरी लेन की बैरक्‍स में रहते थे। वही उस्‍ताद अमज़द अली खां भी रहते थे। भारत सरकार ने उन बैरक्‍स को नृत्‍य, संगीत, साज़ आदि सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ाने के लिए विकसित किया था। वहीं वे कत्‍थक की कक्षाएं लेते थे। कत्‍थक सम्राट बहुत अच्‍छे गायक भी है। उनके गाए गीत, भजन, गज़लें, कजरी लोगों को अब भी याद है। 75 से ऊपर की उम्र में भी उनमें युवाओं जैसा जोश, उत्‍साह और लगन है।

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