समाज

बेटी हुई तो क्या हुआ

बिना दरवाजा वाले इस मकान को देखकर कौन भला समझेगा कि यहां कोई बैंक अधिकारी रहता है। बल्कि रहता नहीं, रहती है। पटना के कुर्जी मुहल्ले की कुम्हार गली में स्थित इस मकान को बाहर से ही देखकर उसमें रहनेवालों की दयनीय स्थिति का ज्ञान हो जाता है। भीतर भी कुछ ठीक-ठाक नहीं है। सिर्फ मामूली चीजें हैं, आम जरूरत की। इंदिरा आवास योजना के तहत बने इस मकान में सुरेन्द्र प्रसाद अपने परिवार के साथ रहते हैं। परिवार में वैसे तो पत्नी के अलावा दो बेटे, पाँच बेटियां और बहू-दामाद, नाती-पोता सभी हैं, पर बड़ा बेटा शादी के बाद कहीं और रहने लगा और तीन बेटियां भी शादी के बाद अपने-अपने ससुराल चली गईं। रह गए पति-पत्नी और साथ में दो बेटियां और एक बेटा। उन्हीं में एक है दुर्गा।

दुर्गा शुरु से ही पढ़ने-लिखने में होशियार थी। मेट्रिक, तब आईए, और फिर बीए… पिता गर्व से कहते हैं सभी में वह फर्स्ट रही। दुर्गा आगे कम्प्यूटर सीखना चाहती थी, पर पिता की माली हालत को देखकर मन की बात मन में ही दबा लेती। अपने बड़े भाई-बहनों में वही सबसे अधिक पढ़ सकी थी। बाकी बहनों की शादी मेट्रिक के बाद ही कर दी गई। बेटी जब स्यानी हो जाए तो उसके हाथ पीले कर देने चाहिए। तीन बेटियों की शादी किसी साधारण आदमी की कमर तोड़ देने के लिए काफी है। सुरेन्द्र प्रसाद की कमाई भी कितनी है – रोज के साढ़े तीन सौ रुपये मात्र। रोज की दिहाड़ी भी मिल जाए तो हद से हद 10-11 हजार रुपये। रंग-रोगन का काम कर के बाल-बच्चों का पेट पालते रहे। अपना और अपनी पत्नी का पेट काटकर अपनी चौथी बेटी को पढ़ाते रहे। अब कैसे कहे दुर्गा कि उसे कम्प्यूटर सीखना है?

इसी बीच दुर्गा को जानकारी मिली प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के बारे में। पता चला कि वह कम्प्यूटर सीख सकती है बिना फीस दिए। खुशी-खुशी वह पिता के पास पहुंची और उनसे इजाजत मांगी कम्प्यूटर क्लास में जाने की। पिता रुआंसे हो गए – अब कहां से लाएंगे उसे और पढ़ाने का पैसा। बीए तो कर ही चुकी है। शादी-ब्याह भी कर दें तो चौन की सांस लें। बेटी ने बताया कि पैसे नहीं लगेंगे तो जान में जान आई। इजाजत दे दी। सरकार को मन ही मन शुक्रिया कहा। भगवान का आभार जताया। दुर्गा पास के ही ओरियन एडुटेक में कम्प्यूटर सीखने जाने लगी। कोर्स खत्म हुआ नहीं कि उसे नौकरी भी मिल गई और वह पड़ोस के बिग बाजार में सात हजार रुपये कमाने लगी। बेटी की कमाई लेना पिता को गंवारा नहीं हुआ, पर बिटिया अपने खर्चों के लिए तो अपने पैरों पर खड़ी हो ही गई। भाई-बहन, माता-पिता के लिए भी जब-तब अपनी खुशी से कुछ न कुछ करती रही।

हालांकि सफलता की यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दुर्गा का पता लगाने के लिए मैंने किसी को बिग बाजार भेजा। पता चला कि वह अब वहां काम नहीं करती। कहां गई, मालूम नहीं। कुम्हार गली में उसके पिता का पता लगाते हुए मेरे साथी उसके घर जा पहुंचे। दुर्गा वहां भी नहीं मिली। उसके पिता वहां जरूर मिल गए, अपने टूटे पैर के साथ। मैने अपने साथी के फोन पर उनसे बात की। मालूम हुआ कि भारी ड्राम उनपर गिर गया और उनके पैर की हड़्डी टूट गई। हफ्ते भर से काम बंद है। लेकिन दुर्गा? हां-हां, यहीं रहती है। पर अभी गई है अपने काम पर। लेकिन हम तो उसे बिग बाजार में ढूंढ आए। वहां तो वह मिली नहीं। नहीं-नहीं, वह अब बिग बाजार में नहीं है। बैंक में नौकरी लग गई है उसकी – पिता के स्वर में गर्व था। अरे वाह! तो बैंक में नौकरी लग गई है उसकी? हां-हां, स्टेट बैंक में।

चलते-चलते उन्होंने मेरे साथी को बताया – दुर्गा तो कह रही थी दरवाजा लगवाने को, पर हमने ही जिद कर के उसे स्कूटी खरीदवा दी। बैंक से मदद मिल गई। अब मेरे पैर ठीक हो जाएं तो दरवाजा खुद लगवा लेंगे बिटिया को अभी और आगे बढ़ना है। फिर उसकी शादी की सोचेंगे।

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