संस्कृति

बॉलीवुड पर आतंक का साया

रंजन कुमार सिंह

कुछ दिनों पहले हमने बिहार में मेट्रिक के सर्टिफिकेट बिकते देखे थे और अब महाराष्ट्र में देशभक्ति का सर्टिफिकेट बिकता भी देख लिया।

सेना कल्याण कोष में पाँच करोड़ रुपए मात्र जमा कराने को राज़ी होकर करण जौहर रातों-रात देशद्रोही से देशप्रेमी हो गए। राज ठाकरे की नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने धमकी दी थी कि करण जौहर ने अगर अपनी फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ से पाकिस्तानी एक्टर फवाद खान को बाहर नहीं किया तो वे उनकी मुश्किलें बढ़ा देगे। इस समझौते के बाद जाहिर है कि एमएनएस को हिन्दी फिल्म में पाकिस्तानी एक्टर की मौजूदगी से कोई शिकायत नहीं रह जाएगी। लगभग आठ साल पहले कुछ आतंकवादियों ने इंडियन एअरलाइंस के विमान का अपहरण कर लिया था और फिरौती के तौर पर अजहर मसूद के साथ दो और आतंकवादियों की रिहाई की मांग की थी। उस प्लेन के लगभग दो सौ यात्रियों एवं विमान कर्मियों की हिफाजत के लिए सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी थी। एमएनएस को बेशक हम आतंकवादी संगठन कहना न चाहें, पर काम उसने वैसा ही किया है। जिस तरह निर्दोष नागरिक आतंकियों के निशान पर होते हैं, ठीक वैसे ही निर्दोष फिल्म अभिनेताओं को उसने निशाना बनाया।

हां, अंतर इतना जरूर है कि उन मुसलिम आतंकियों की तरह एमएनएस ने किसी को जान से मारने की धमकी नहीं दी और ना ही फिरौती में किन्हीं आतंकवादियों को छोड़ने की मांग रखी, पर दोनों ही मामलों में कानून को तो अपने हाथ में लिया ही गया, और दोनों ही मामलों में फिरौती भी मांगी ही गई। एक में अगर लगभग दो सौ लोगों की जानें संकट में थीं, तो दूसरे में मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री का करोड़ों रुपया दांव पर था। करण जौहर यदि केवल इसलिए दोषी थे कि उन्होंने अपनी फिल्म में पाकिस्तानी एक्टर को काम दिया तो अब इसमें क्या बदल गया है? लाखों रुपए लेकर कुछ लोग अगर बिहार में मेट्रिक का सर्टिफिकेट बांटते हैं तो करोड़ों रुपए लेकर कुछ लोग यहां देशभक्ति का प्रमाण-पत्र बांटते नजर नहीं आ रहे क्या? सेना कल्याण कोष का सहयोग होना चाहिए, पर इसके लिए किसी की मजबूरियों का फायदा उठाना सही है क्या? सही मंशा किसी गलत तरीके पर नहीं खड़ी होती। आज भारतीय फिल्मों से पाकिस्तानी कलाकारों को हटाने की मांग उठी है तो कल को हिन्दी फिल्मों से बिहारी कलाकारों को हटाने की बात नहीं उठेगी, ऐसा कहा जा सकता है क्या? एमएनएस ने जाहिर तौर पर भले ही सेना कल्याण कोष में पाँच करोड़ जमा कराने पर समझौता किया हो, पर उसने खुद अपने खाते में कोई पैसा नहीं लिया होगा, ऐसा दावे के साथ कहा जा सकता है क्या?

यह सही है कि उरि तथा उससे पहले पठानकोट में हमला पाकिस्तानी फौज की शह पर ही किया गया, पर इसमें फवाद खान का कोई हाथ था क्या? और अगर था तो फिर वह तो आज भी ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में बना ही हुआ है। सच कहा जाए तो यह मामला कुछ ऐसा ही है, जैसा कि 1984 में सिक्ख दंगा था। किया किसी ने, भरा किसी और ने। इंदिरा गांधी को मारने वाले सतवन्त और बेअन्त थे, पर उसकी गाज गिरी समस्त सिक्ख समुदाय पर। हां, सिक्खों को तब इतना मौका भी नहीं दिया गया कि उनसे कहा जाता कि या तो तुम सतवन्त-बेअंत की कारस्तानी की खुलेआम भर्तस्ना करो या फिर मरने के लिए तैयार रहो। वैसे तब हर सिक्ख से यह आशा करना कि वह सार्वजनिक तौर पर इंदिरा गांधी हत्याकांड की निन्दा करे, सही होता क्या? फिर यह अपेक्षा क्यों कि भारत में काम करने वाला हर पाकिस्तानी उरि तथा पठानकोट घटना की निन्दा करे?

उसी एमएऩएस ने या फिर किसी भी तथाकथित देशप्रेमी संगठन ने आज तक सरकार पर तो यह दबाव नहीं बनाया कि वह पाकिस्तान के साथ अपने कारोबारी रिश्तों में बदलाव की नीति बनाए, तो फिर करण जौहर पर ही ये रिश्ते तोड़ने का दबाव क्यों? सरकार चाहे तो नीति के तहत पाकिस्तान के सभी कलाकारों को यहां काम करने से रोक सकती है, पर वह ऐसा नहीं कर रही और उसपर ऐसा करने के लिए एमएनएस का कोई दबाव भी नहीं है। यह भी सही है कि करण जौहर ने उरि या पठानकोट की घटना के बाद फवाद खान को अपनी फिल्म में नहीं लिया था। जब लिया था, तब रिश्ते सुधारने की कोशिशें भारत सरकार के स्तर पर भी की जा रही थीं और उन्हीं कोशिशों को मुम्बइया फिल्म उद्योग अपने स्तर से भी कर रहा था। उसी के तहत ज़ी टीवी के ज़िन्दगी चैनल ने कई-एक पाकिस्तानी धारावाहिक शुरु किए थे। उसी कोशिश के तहत करण जौहर ने अपनी निर्माणाधीन फिल्म में फवाद को लिया था। ज़ी टीवी के लिए पाकिस्तानी धारावाहिकों का प्रसारण रोक देना आसान था, पर करण जौहर के लिए यह इतना आसान नहीं है। फिल्म निर्माण कोई बिरयानी की दावत नहीं है, जो एक शाम की बात हो। उसमें समय लगता है। जब उरि की घटना हुई, तब संभवतः फवाद के साथ फिल्म की शूटिंग भी न हो रही हो। जो शुरुआत दोस्ताना माहौल में हुई थी, उसका नतीजा ही तो अब आया है। यह तो महज संयोग है कि ‘ऐ दिल है मुश्किल’ उरि घटना के बाद आ रही है। अगर यह फिल्म उससे पहले रिलीज हो चुकी होती तब?

ऐसा भी नहीं कि फवाद खान को पहली बार किसी मुम्बइया फिल्म में लिया गया हो। इससे पहले वह ‘खूबसूरत’ में काम कर चुके हैं। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिल चुका है। ‘ऐ दिल है मुश्किल’ पर बैन की मांग करनेवाले एमएनएस ने फिल्मफेयर पुरस्कार से जुड़े लोगों से माफी मांगने को क्यों नहीं कहा? क्यों नहीं फिल्म खूबसूरत के निर्माताओं से भी सेना कल्याण कोष में पाँच करोड़ रुपये रखवाए? क्यों नहीं फवाद खान से फिल्मफेयर पुरस्कार छीन लेने की मांग की? उरि हमले की वजह से निर्देोष पाकिस्तानी कलाकारों पर बैन लगाने की मांग कर रहे एमएनएस को स्पष्ट करना होगा कि इंदिरा गांधी की हत्या की वजह से निर्देोष सक्खों के कत्लेआम पर वह क्या सोचता है। यदि 1984 का सिक्ख दंगा गलत था तो 2016 का पाकिस्तानी कलाकारों पर बैन कैसे सही कहा जा सकता है?

रंजन कुमार सिंह
लेखक-पत्रकार-फिल्मकार रंजन कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्स से सफर शुरु कर टीवी की दुनिया में कदम बढ़ाया। अनके टीवी कार्यक्रम का निर्माण-निर्देशन करने के साथ ही वह अब तक आठ पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से तीन हिन्दी की तथा शेष अंग्रेजी की हैं। देश-विदेश में वह भारतीय कला-संस्कृति तथा भारतीय हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान के लिए भी बुलाए जाते रहे हैं। वह अनेक शिक्षा संस्थानों तता अकादमियों से भी जुड़े रहे हैं।

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