समाज संस्कृति

भाषा और संस्कृति – कुछ विचार

(11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर विशेष)

शंकर दयाल सिंह

भाषा और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं या अनुपूरक? जहां भाषा हमारे भावों को अभिव्यक्तिक चेतना प्रदान करती है, वहां संस्कृति मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक सौष्ठव की संवाहिका है। इसे इस रूप में भी कहा या समझा जा सकता है कि भाषा की भी अपनी संस्कृति होती है और संस्कृति भाषा के बिना गूंगी होती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हमारा संस्कृत वांग्मय है, जिसके द्वारा हमें भाषा और संस्कृति दोनों का अक्षय भंडार प्राप्त हुआ।

वेद, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों ने जहां सूत्र और संस्कृति की स्थापना की, वहीं अष्टध्यायी जैसे ग्रंथों की रचना से भाषा का सौष्ठव बढ़ा। बाद में स्मृतियों ने इस चेतना को आगे बढ़ाया तथा रामायण और महाभारत की रचना के बाद धर्म, संस्कृति, नीति शौर्य, विवेक, मर्यादा एवं राष्ट्रधर्म को भाषाई सुदृढता तो मिली ही, साथ में सांस्कृतिक वैभव भी मिला। कालांतर में इन महान ग्रंथों द्वारा हमारी संस्कृति में अक्षुण्णता प्राप्त हुई।

श्रीमती महादेवी वर्मा का कहना है,

भारतीय संस्कृति का प्रश्न अन्य संस्कृतियॆं से कुछ भिन्न है क्योंकि वह अतीत की वैभव कथा ही नहीं, वर्तमान की करुणा गाथा भी है। उसकी विभिन्नता प्रत्येक अध्ययनशील व्यक्ति को कुछ उलझन में डाल देती है। संस्कृति, विकास के विविध रूपों की समन्वयात्मक समष्टि है और भारतीय संस्कृति विविध संस्कृतियों की समन्वयात्मक समष्टि है। इस प्रकार इसके मूल तत्व को समझने के लिए हमें अत्यधिक उदार, निष्पक्ष और व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी बल दिया है कि

भारतीय संस्कृति विविधतामयी है क्योंकि भारत की प्रकृति अनन्तरूपा है। यह समन्वयवादिनी है क्योंकि प्रकृति सभी को स्वीकृति देती है। किसी एक विचार, एक भावना और एक धारणा की सीमा उसके लिए बंधन है क्योंकि वह असंख्य नदियों-स्त्रोतों को अपने में मुक्ति देनेवाला समुद्र है।

इस सत्य की पहचान का सूत्र हमें भाषा ही प्रदान करती है। वह मानव की सृजनात्मक अभिव्यक्ति को अक्षरों या वाणी द्वारा आकार देती है। तभी तो अक्षर को ब्रह्म एवं वाणी को सरस्वती के रूप में माना गया है। हम कुछ कहना चाहते हैं, उसे आकार देना चाहते हैं, पूपायित करते हैं, बोधों के लिए भाव को और भावों के लिए भाषा को एक-दूसरे से गूंथते हैं, तबव जाकर कहीं सृजन प्रक्रिया पूरी होती है।

भाषा उस त्रिवेणी के समान हैं, जिसकी धाराएं व्यावहारिक जीवन के लिए आवश्यक हैं। इस विशाल देश में भाषाओं की कई सरितें प्रवाहित होती हैं जो अन्ततः संस्कृतिरूपी सागर में जाकर रुकती हैं। यही कारण है कि दक्षिण के सुब्रह्मणयम भारती का स्वर उत्तर के मैथिलू शरण गुप्त से स्वतः मेल खाता है। अलवार संतों की वाणी उत्तर भारत के संतों के साथ मिलकर संगम का रूप धर लेती है, भले ही खुद दोनों एक-दूसरे से कभी न मिलों हों।

भाषा की भिन्नता के बावजूद हमारी सांस्कृतिक एकता हमेशा कायम रही है। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक और अरुणाचल से लेकर गुजरात तक फैले इस विशाल भूखंड को भारतीय संस्कृति ने ही जोड़ रखा है। हमारी सामाजिक संस्कृति किसी कटघरे में कैद नहीं की जा सकती। ऐसे में यह दुखद है कि कभी-कभी भाषा के विवाद में पिसकर संस्कृति भी पिसने लग पड़ती है।

वाल्मिकी और कालीदास से शुरु कर कविगुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर और महादेवी वर्मा तक की यात्रा करें तो हम पाएंगे कि हमारा अक्षय कोष हमारी संस्कृति ही है। यह संस्कृति कभी पहाड़ों की चोटियों से निर्धारित होती है तो कभी पवित्र नदियों के तटों से झांकती है। कालिदास जब नगाधिराज हिमालय की प्रशस्ती करते हैं तो उनकी चेतना में केवल हमारा भौगोलिक परिवेश ही नहीं रहता, बल्कि सांस्कृतिक चिंतन भी रहता है। वैदिक ऋचों से लेकर सूफियों एवं सन्तों की की वाणियों तक हमारे पास जो अक्षय भंडार है, वह हमारी भाषाई विरासत की अवगाहिनी है। एक तरफ यदि तुकाराम, ज्ञानेश्वर, सूरदास, तुलसीदास, कबीर, रैदास आदि की परम्परा है तो दूसरी तरफ रामानन्द, माधवाचार्य और वल्लभाचार्य की परम्परा। एक का तत्व चिन्तन तो दूसरे का भाव बोध, दोनों ही भाषा के सहारे ही चलते हैं।

भाषा और संस्कृति दोनों को ही हम एक-दूसरे से जोड़कर ही देख सकते हैं। अभी हाल में मैं सूरीनाम, ट्रिनिडाड, गयाना, जैसे देशों की यात्रा पर गया था, जहां की जनसंख्या का आधा भाग भारतीय मूल के लोगों का है । इनके पूर्वज आज से सौ-डेढ़ सौ साल पहले मजदूर के रूप में उन देशों में गए थे, पर आज वे वहां के मालिक हैं। मैंने उन देशों के भारतवंशियों के भीतर जिस भारतीयता के दर्शन किए, उनके मन में हिन्दी के प्रति जो प्रेम देखा, और जिस तरह वे संस्कृति को अपने सीने से चिपकाए हुए थे, वैसा आज भारत में भी नहीं है। उनका कहना था, अगर हम अपनी भाषा की रक्षा नहीं कर सकते तो हम अपनी संस्कृति से भी अलग हो जाएंगे।

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