मुक्तकण्ठ क्यों?

जैसा कि नाम से स्पष्ट है – मुक्तकण्ठ हिन्दी में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष विचारों का मंच है, बल्कि इसे खुला मंच कहना ही युक्तिसंगत होगा क्योंकि इसने अपने अस्तित्व के लिए ऑनलाईन माध्यम को चुना है, जो सर्वसुलभ होने के साथ-साथ तत्क्षण प्रतिक्रियाओं के लिए खुला हुआ भी है।

वैसे कहने को तो कोई भी समाचार पत्र-पत्रिका अथवा रेडियो एवं टीवी चैनल स्वयं को स्वतंत्र और निष्पक्ष ही बताता है, फिर हम यदि ऐसा कहते हैं तो इसमें अलग क्या है? दरअसल, किसी भी समाचार या विचार पर हाथ के हाथ प्रतिक्रिया दे पाना ऑनलाईन माध्यम के कारण ही संभव हो सका है। इस मायने में यह माध्यम अपने पहले के सभी माध्यमों, जैसे कि समाचार पत्र-पत्रिका, रेडियो या टेलिविजन से बहुत ही आगे निकल गया है। यह माध्यम एक साथ ही समाचार पत्र-पत्रिका, रेडियो तथा टेलिविजन सभी कुछ हो सकता है, और साथ ही भागीदारी के नए आयाम खोल दे सकता है, जो इससे पहले संभव नहीं था। समाचार पत्र-पत्रिका को पढ़ा जा सकता है, रेडियों को सुना जा सकता है और टेलिविजन को देखा जा सकता है, पर इस सर्वसुलभ माध्यम का ही करिश्मा है कि इसे पढ़ने, सुनने और देखने के अलावा इसमें व्यक्त समाचारों और विचारों को आगे भी बढ़ाया जा सकता है। इस तरह इसमें दूसरे पक्ष की भूमिका पाठक, श्रोता या दृष्टा की न रहकर, भागीदार की हो जाती है, जो समाचार एवं विचार को अपनी सूचनाओं एवं प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़ाता जाता है और इसे एकपक्षीय होने से बचाता है। ऐसे में यह माध्यम वास्तविक रूप से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष बना रहता है।

मुक्तकंठ इस मायने में औरों से भिन्न है कि यह समान विचार के लोगों को एक मंच पर लाने की कोशिश न होकर विभिन्न विचार के लोगों को एक मंच से जोड़ने की कोशिश है। ऐसे में कहा जा सकता है कि मुक्तकंठ की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता पूरी तरह से आपकी भागीदारी पर निर्भर करती है। जिस अनुपात और स्तर पर यह भागीदारी होगी, मुक्तकंठ की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता उतनी ही पोख्ता होगी। मुक्तकंठ को मुक्तकंठ बनाने के लिए हमारा यह निमंत्रण स्वीकार कर आप हमें अनुगृहित करेंगे तो हमें विशेष प्रसन्नता होगी। एक वादा या गारंटी हम अपनी और से जरूर करना चाहेंगे – आपकी किसी भी सूचना या प्रतिक्रिया की हम कांट-छांट नहीं करेंगे, बशर्ते वह संदर्भ से जुड़ा हुआ हो और उसकी भाषा मानुषिक हो, अमानुषिक नहीं। क्योंकि यह तो आप भी मानेंगे कि गाली-गलौज की आज़ादी किसी भी हाल में बोलने की आजादी याकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं कही जा सकती। इस वजह से और इसी वजह से मुक्तकंठ को गाली-गलौज से भारी परहेज है – आप कह सकते हैं कि नफरत की हद तक परहेज।

रंजन कुमार सिंह
संपादक