संस्कृति

मॉरीशस में डोडो की तरह कहीं भोजपुरी न विलुप्त हो जाए

शिवाजी सिंह

हिंद महासागर के ‘छोटे भारत’ मॉरीशस में ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के बाद लोगों में उम्मीद जगी है कि उनके राष्ट्रीय पक्षी ‘डोडो’ की तरह यहां हिंदी एवं भोजपुरी भाषा और भारतीय संस्कृति विलुप्त नहीं होगी।
मॉरीशस के स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में 18 से 20 अगस्त तक चले 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान और उसके बाद भी स्थानीय लोगों विशेषकर हिंदी बोलने और समझने वालों के उत्साह ने वहां विलुप्त हो रही इस भाषा के पुनर्जागरण की अलख जगाई है।
क्वात्रे बोर्न्स के होटल व्यवसायी कवि बुली ने कहा कि दादा-दादी और नाना-नानी हिंदी बोला करते थे लेकिन उनके माता-पिता ने हिंदी और भोजपुरी के बदले फ्रेंच और अंग्रेजी भाषा सीखी। इसके बाद वह अपने माता-पिता के साथ फ्रांस चले गये थे लेकिन, उनकी पैतृक संपत्ति क्वात्रे बॉर्न्स में ही थी। वह अपने देश से दूर नहीं रह सके और वह यहां लौट आये।
श्री बुली ने बताया कि वह मूल रूप से भारत के बिहार राज्य से हैं। शायद उनके गांव का नाम बलिया था, इसलिए उनके नाम में बुली जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि वह अपने होटल के कर्मचारी की मदद से हिंदी समझने लगे हैं लेकिन अभी पूरी तरह से बोल नहीं पाते हैं। इस दिशा में हालांकि उनकी कोशिश जारी है।
होटल व्यवसायी ने कहा कि मॉरीशस के लोगों को लगता था कि हिंदी सीखने से रोजगार नहीं मिलता और मॉरीशस से बाहर जाने पर उन्हें इस भाषा का कोई लाभ मिलने वाला नहीं है लेकिन अब स्थिति बदली है। उन्होंने कहा कि देश में पर्यटन बढ़ रहा है। यदि मॉरीशस के लोग हिंदी और भोजपुरी ज्यादा बोलने लगेंगे तो भारत के पर्यटक यहां की खूबसूरती के साथ ही यहां की बोलचाल की भाषा के कारण भी आकर्षित होंगे।
मनदॉस रॉयल रोड के किशन राहमा और पैलेस की परमाला हैरी ने भी कहा कि उनकी मां अभी भी घर में हिंदी बोलती हैं लेकिन बाहर वह हिंदी की बजाय फ्रेंच, अंग्रेजी या स्थानीय भाषा क्रियोल में बातचीत करती हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी या भोजपुरी बोलने वालों का शहर के लोग मजाक उड़ाते हैं और उन्हें कम पढ़ा-लिखा या गांव वाला समझते हैं लेकिन मॉरीशस और भारत की सरकार हिंदी और भोजपुरी के प्रसार के लिए प्रयास कर रही है। अब लोग अपने बच्चों को स्कूलों में हिंदी पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन से इस कार्य को और गति मिलेगी।
मॉरीशस में हिंदी भाषा के प्रसार में भारतीय सिनेमा की भूमिका भी उल्लेखनीय है। सम्मेलन में हालांकि ‘फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति का संरक्षण’ विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता कर रहे हिंदी के प्रसिद्ध गीतकार एवं सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी की यहां आये स्थानीय प्रतिनिधियों ने खूब खिंचाई की और आरोप लगाया कि भारतीय फिल्में अनावश्यक हिंसा और अश्लीलता दिखाती हैं, बावजूद इसके यहां की अधिकांश टैक्सियों में बॉलीवुड फिल्मों के गाने ही बजते सुनाई देते हैं।
टैक्सी चालक राज रघुनाथ ने कहा कि लोग भले ही शहरों में हिंदी या भोजपुरी कम बोलते नजर आयें लेकिन गांवों में अभी भी ज्यादातर लोग हिंदी या भोजपुरी बोलते हैं। इसमें यहां की महिलाएं सबसे आगे हैं। लोग मानते हैं कि अपनी संस्कृति को बचाये रखने के लिए अपनी भाषा को बचाना जरूरी है।
भारत और मॉरीशस की सरकार इसके लिए पूरी कोशिश कर रही है। अब तो माता-पिता का भी रुझान हिंदी या अन्य भारतीय भाषा की ओर बढ़ रहा है। सेशल्स एयरलाइंस में काम करने वाली स्मिता सुबल ने कहा कि उनके माता-पिता अच्छी भोजपुरी बोलते हैं और वह उनसे कभी-कभी भोजपुरी में बातें करती हैं। उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि सभी को अपनी मातृभाषा बोलनी चाहिए। उनके दो बच्चे शुभम और साक्षी अभी बहुत छोटे हैं लेकिन दोनों भोजपुरी बोलना जानते हैं। उन्होंने कहा कि एयलाइंस की एक अन्य सहकर्मी मनीषा कुलपतया भी भोजपुरीभाषी हैं। काम के दौरान मौका मिलने पर दोनों भोजपुरी में बातें करती हैं।
श्रीमती सुबल ने कहा कि मॉरीशस में हिंदी, भोजपुरी और भारतीय संस्कृति का सूरज कभी अस्त नहीं होने वाला है। भारत और मॉरीशस सरकार के प्रयास से यहां शुरू की गयी पाणिनि प्रयोगशाला का लाभ भारतीय भाषा सीखने के इच्छुक लोगों को अवश्य मिलेगा। उन्होंने कहा कि मॉरीशस के सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था है और वहां विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है। इसके कारण अब यहां बड़ी संख्या में लोग हिंदी पढ़ रहे हैं।

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