संस्कृति

मॉरीशस में हिंदी विदूषी का छलका दर्द

शिवाजी सिंह

विश्व हिन्दी सम्मेलन के भव्य आयोजन से जहां मॉरीशस में विलुप्त होने की ओर बढ़ रही हिन्दी के प्रचार प्रसार को नयी उर्जा भले ही मिली हो लेकिन एक युवा हिन्दी सेवी जो उमंग के साथ उसमें हिस्सा लेने गयी थी उसे घोर निराशा हुई और वह हिन्दी के प्रति आयोजकों के रवैये के कारण आयोजन स्थल पर ही फफक-फफक कर रो पड़ी ।
विश्व भर से एक जगह जुटे हिन्दी विद्वानों के बीच यदि किसी युवा हिन्दी प्रेमी को अपना आलेख पढ़ने का मौका मिल जाये तो उसके उत्साह और खुशी का अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा । यह मौका था मॉरीशस में 18 से 20 अगस्त तक आयोजित 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन, जिसमें हिन्दी के कई जाने माने हस्ताक्षर हिस्सा ले रहे थे। उनके बीच ही मध्यप्रदेश की एक युवा हिन्दी प्रेमी को अपना आलेख पढ़ना था। उसके आलेख का चयन सम्मेलन की एक उच्चस्तरीय निर्णायक समिति ने किया था।
ऐसे सुनहरे मौके पर उस आलेख को पढ़ने की तैयारी वह पिछले करीब 40 दिनों से कर रही थी। भला तैयारी भी क्यों न करे, उसे हिन्दी के दिग्गज लोगों के बीच अपना आलेख जो पढ़ना था। कहीं कोई गलती न हो जाये वह उसका खास ख्याल रखने के लिए सतर्क थी। तैयारी के लिए उसने सबसे पहले मॉरीशस के विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय केन्द्र के बारे में इंटरनेट से जानकारी जुटायी, जहां उसे करीब तीन हजार लोगों के बीच आलेख को पढ़ना था। उसने इसके लिए अपने घर पर ही पूरा साउंड सिस्टम भाड़े पर लेकर लगा रखा था। वह करीब 40 दिनों तक लगातार उसपर बोलने का अभ्यास करती रही । इसके लिए उसने अपनी आवाज के माड्यूलेशन पर विशेष ध्यान दिया था लेकिन जब वह इतनी तैयारी के बाद स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय केन्द्र पहुंची तब वहां आलेख पढ़ने के लिए की गयी व्यवस्था को देखकर हतप्रभ रह गयी ।
एक छोटे से कमरे में जहां मुश्किल से 15 लोग बैठे थे और कुछ जगह नहीं मिलने के कारण खड़े थे। कमरे की एक दीवार पर 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का पोस्टर लगा था और उसके सामने एक व्यक्ति को आलेख पढ़ने के लिए कहा जाता और दो तीन लाईन पढ़ने के बाद उसे कह दिया जाता कि आपका आलेख पढ़ा हुआ मान लिया गया। आलेख पढ़ते हुए आपकी तस्वीर भी ले ली गयी है। अब आप कमरे से बाहर चले जायें और दूसरे को मौका दें। यह सब देखकर युवा हिन्दी सेवी को गहरा सदमा लगा और वह वहीं पर फूट-फूटकर रोने लगी । उसने रोते हुए कहा कि ऐसा तो उसके कॉलेज में भी नहीं होता है । वह विश्व हिन्दी सम्मेलन में यह सोचकर आयी थी कि उसे हिन्दी के विद्वान लोगों के बीच आलेख पढ़ने का मौका मिलेगा और विद्वान लोग उसकी गलतियों को बतायेंगे और वह भी उनसे तथा अन्य आलेख पढ़ने वालों से कुछ सीखेंगी। उसने आलेख पढ़ने की तैयारी पर करीब 50 हजार रुपये खर्च कर दिये। वह यह कह कर रोने लगी। उसे रोते देख आयोजकों ने उसे पूरा आलेख पढ़ने का मौका तो दे दिया लेकिन विश्व हिन्दी सम्मेलन को लेकर उसकी धारणा टूटने का दर्द शायद कभी कम न हो।

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