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मेक इन इंडिया vs मेड इन इंडिया

मधुरेन्द्र सिन्हा

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नब्बे के दशक में जब देश में आर्थिक उदरीकरण शुरू हुआ तो जिस राज्य ने सबसे तेजी से तरक्की की वह था गुजरात। कुशल प्रशासन और बिज़नेस फ्रेंडली माहौल ने देखते-देखते ही इसे बुलंदियों पर पहुंचा दिया। यह एक बेहतरीन प्रयास था और इसके पीछे जिस राजनेता का दिमाग था वह और कोई नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी थे। उन्होंने अपने कुशल प्रशासन, विभिन्न विभागों में बेहतरीन तालमेल और कारोबारी माहौल से राज्य को निवेशकों का पसंदीदा बना दिया। देश के कोने-कोने से कंपनियां वहा पहुंची और उन्होंने अपने उद्योग-धंधे लगाए। हालत यह हो गई कि महाराष्ट्र जैसे पूर्ण औद्योगिक राज्य से भी लोग वहां पहुंचने लगे।

बंगाल छोड़ने को मजबूर टाटा मोटर्स को मुख्यमंत्री मोदी ने जिस तरह से अपने राज्य में जगह दी और उसे तमाम सुविधाएं मुहैया कराईं उसकी गूंज दूर तक सुनाई दी। नतीजा हुआ कि कई और बड़ी कंपनियों ने भी गुजरात का रुख किया। मोदी ने इसे गुजरात मॉडल का नाम दिया और लोकसभा चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा भी बनाया। चुनाव प्रचार में यह एक बड़ा लुभावना नारा बना रहा। इसी नारे की बदौलत वह प्रधान मंत्री बन गए। तब ऐसा लगा कि देश में उद्योग-धंधों का जाल बिछ जाएगा। उन्होंने पद संभालते ही इसके लिए प्रयास भी शुरू कर दिया।

विदेशों से बड़े पैमाने पर निवेश करने के इरादे से पीएम मोदी कई देशों के दौरे पर गए। दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों के सीईओ और चेयरमैन से मिले। सभी को आमंत्रित किया कि वे अपने कारखाने भारत में लगाएं। यूपीए के कार्यकाल में विदेशी कंपनियों का कहना था कि वे यहां के टैक्स कानूनों से परेशान हैं। पीएम मोदी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह उन कानूनों और नियमों को सरल बनाएंगे। इसका नतीजा हुआ कि जीई, वेस्टिंगहाउस, बोइंग जैसी कई विशालकाय कंपनियों ने भारत में अपने प्लांट लगाने पर हामी भर दी। उनकी साख पर भरोसा करके अकेले अमेरिका ने तीन वर्षों में 41 अरब डॉलर निवेश का वादा किया।

कभी भारत से शत्रुता रखने वाले देश चीन ने नरेन्द्र मोदी को पूरी तवज्जो दी और भारत में बड़े पैमाने पर निवेश का वादा किया। मोदी के चीन दौरे में चीन के नेतृत्व ने उनके आग्रह और वादों पर ध्यान देते हुए भारत से 22 अरब डॉलर के व्यापार तथा आर्थिक सहयोग के सौदों पर मुहर लगा दी। शंघाई में हुए इस करार की गूंज सारी दुनिया में सुनाई दी। इन समझौतों के तहत कई तरह के उद्योगों और गैरपरंपरागत ऊर्जा के क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग का करार हुआ। इसके अलावा बाद में और दस अरब डॉलर के सहयोग के दस्तावेज पर भी दस्तखत हुए। यानी चीन ने भारत में अपना बिज़नेस बढ़ाने में अपनी प्रतिबद्धता दिखा दी।

इसी तरह जापान का दौरा करके पीएम मोदी वहां से कुल 35 अरब डॉलर का निवेश का वादा करवाने में सफल हुए। जापान ने भारत में हेल्थकेयर, फाउंड्री, इलेक्ट्रॉनिक्स, इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्वच्छ ऊर्जा वगैरह में अरबों डॉलर के निवेश का वादा किया। जापन तो भारत के बुलेट ट्रेन का निर्माण भी करने जा रहा है। उसकी रुचि यहां कई तरह के कारखाने लगाने में है। उधर फ्रांस में भी पीएम मोदी के दौरे से निवेश का बड़ी खबरें आईं। वहां के राष्ट्रपति हॉलैंडी ने भारत में दो अरब यूरो के निवेश का वादा किया। इसके अलावा हवाई जहाज बनाने वाली बड़ी कंपनी एयरबस ने भी भारत से दो अरब डॉलर के आउटसोर्सिंग का वादा किया। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे बड़े देशों से भी भारी निवेश का वादा मिला। इन सभी देशों ने पीएम मोदी की पहल का स्वागत किया और उन्हें अपने निवेश के बारे में आश्वस्त किया।

लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था का एक और पहलू भी है। बड़े उद्योगों और कल कारखानों से निसंदेह देश की तरक्की होती है और अर्थव्यवस्था में जान आ जाती है पर भारत जैसा विशाल देश अपने छोटे उद्योंगो तथा कुटीर उद्योगों के कारण ही आगे बढ़ सकता है। यह सच है कि हर जगह बड़े-बड़े कारखाने नहीं लग सकते। देश के ज्यादातर राज्यों में तो वे हैं भी नहीं। वे तो अपने छोटे उद्योगों से ही रोजगार पैदा करते रहे हैं। इस देश में कृषि के बाद अगर किसी क्षेत्र ने सबसे ज्यादा रोजगार दिया है तो वह हैं लघु उद्योग, जहां कम निवेश में ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। इसने हमारे परंपरागत उद्योगों और हस्तकलाओं को न केवल जिंदा रखा है बल्कि उसे नया जीवन भी दिया है।

भारत जैसे बहुत ज्यादा आबादी वाले देश में लघु उद्योग ही रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है। लघु उद्योग देश में उत्पादित सामानों का 40 प्रतिशत पैदा करता है। ये असंगठित क्षेत्र में हैं और उसके बावजूद यहां लगभग आठ करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इन उद्योगों ने देश में तमाम तरह की समस्याओं का डटकर सामना किया है और अर्थव्यवस्था में बराबर योगदान किया है। देश में लघु उद्योगों में 6,000 तरह के सामान बनते हैं, जिनमे सिर्फ परंपरागत सामान ही नहीं, कई तरह के हाई टेक सामान भी शामिल हैं।

लघु और मध्यम उद्योग दिहाड़ी मज़दूरों और इस तरह के कामगारों के लिए जीवन यापन का बढ़िया और प्रभावी माध्यम है। इनमें हाथ से काम करने वाले कारीगरों की जरूरत होती है और इसलिए ये बड़े उद्योगों की तुलना में कई गुना ज्यादा रोजगार देते हैं। कम पूंजी और ज्यादा रोजगार ही इनका मूलमंत्र होता है। छोटे शहरों और बड़े शहरों के बाहरी इलाकों में स्थित होने के कारण कामगारों के लिए कम पैसे में जीवन यापन आसान होता है क्योंकि वहां महंगाई उतनी नहीं होती है जितनी बड़े शहरों में या औद्योगिक नगरों में।

भारत में बड़े और विशाल उद्योग कुछ खास शहरों और महानगरों में ही हैं जहां उनके लिए सुविधाएं हैं या जहां उस तरह का बुनियादी ढांचा बन चुका है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गुजरात और महाराष्ट्र तथा कुछ हद तक तमिलनाडु है जहां बड़े पैमाने पर उद्योग-धंधे फल-फूल रहे हैं। इस कारण वहां के औद्योगिक इलाकों में जनसंख्या का जमाव हो गया है। दूसरी ओर लघु उद्योगों देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं। इससे देश में आबादी के अनुपात का संतुलन बना है। देश के पूर्वी हिस्से में जहां बड़े उद्योग नहीं के बराबर हैं, इनकी उपयोगिता कम करके नहीं आंकी जा सकती है। सच तो यह है कि देश के कई हिस्सों में जहां बड़े उद्योगों के लिए उपयुक्त माहौल या इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं, वहां लघु उद्योग खूब फल-फूल सकते हैं।

यह भी ध्यान देने की बात है कि देश में जो निर्यात हो रहा है उसका बड़ा भाग लघु और परंपरागत उद्योगों की मदद से ही होता है और यह लगातार बढ़ता जा रहा है। 1973-74 में जहां उन्होंने 393 करोड़ रुपए का निर्यात किया था, वहीं 2002-03 में यह बढ़कर 71,244 करोड़ रुपए हो गया। वे भारत के कुल निर्यात के 35 प्रतिशत के हिस्सेदार हैं। वे देश के लिए बेशकीमती विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं। लेकिन पिछले डेढ़ दशक से उन्हें चीन का कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है जो अपने सस्ते सामानों से सारी दुनिया में छा गया है।

1991 में भारत ने आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के दबाव में ऐसी कुछ आर्थिक नीतियां बनाईं जिनसे लघु और मध्यम उद्योगों को खासी चोट पहुंची। भारत में उस समय एक नया आर्थिक शब्द प्रचलन में आया। यह था ग्लोबलाइज़ेशन और इसका दुष्परिणाम हमारे छोटे उद्योगों को झेलना पड़ा। जो समान भारत में बनते थे वे बाहर के देशों से अबाध रूप में आने लगे। उनकी कीमतें भी कम थीं जिससे यहां के उद्योगों को धक्का लगा। कई उद्योग जैसे खिलौना और बिजली के सामान बनाने वाले तो ध्वस्त हो गए। विदेशों में बने सामान तकनीकी रूप से कहीं बेहतर और सस्ते थे। बाजार में इनकी बाढ़ आ गई और छोटे उद्यमी काम छोड़कर चले गए। उनमें से सैकड़ों तो चीन से आयातित सामान ही बेचने लगे।

वित्त के अभाव में लघु उद्योगों की बुरी हालत है। हालांकि प्रधान मंत्री मोदी ने मुद्रा लोन बैंक की घोषणा करके इस मामले में जानदार पहल की। कहा गया कि यह बैंक बिना किसी परेशानी के लोन दिलाएगा लेकिन यह योजना उतनी सफल नहीं हो पाई है जितनी होनी चाहिए थी। इस स्कीम के तहत उद्यमियों को 50,000 से 10 लाख रुपए तक लोन देने की बात कही गई। माना गया कि इस स्कीम के अंतर्गत बड़े पैमाने पर लोन बांटे जा सकेंगे और लघु उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा लेकिन अगर मीडिया रिपोर्ट पर ध्यान दिया जाए तो सच्चाई बिल्कुल अलग है। मुद्रा बैंक अपने लक्ष्य का एक तिहाई भी ऋण मुहैया नहीं करा पाया है।

लघु उद्योगों के सामने कच्चे माल की समस्या भी है। अपनी जरूरत के लिए उन्हें कई बार कच्चा माल उचित मात्रा में नहीं मिल पाता। कई बार उनकी कीमतें इतनी हो जाती हैं कि उत्पादन में घाटा झेलने की स्थिति आ जाती है। इसके लिए वे बाज़ार की शक्तियों पर निर्भर रहती हैं और इसमें असफल होने पर यानी सस्ते कच्चे माल की अनुपलब्धता के कारण कारखाना बंद करने को विवश हो जाते हैं। इसका निराकरण कैसे होगा इस पर विचार करना होगा लेकिन अब तक सरकार की ओर से इसपर कोई कदम नहीं उठाया गया है।

सबसे बड़ी बात है कि आज तक सरकार ने उनके योगदान को वह मान्यता नहीं दी है जिसके वे हकदार हैं। देश में बेधड़क आयात, पुराने लेबर लॉ, प्रोत्साहन की कमी, कर्ज का अभाव, टेक्नोलॉजी की कमी, ऊंची ब्याज दरें और स्थानीय कानूनों ने उन पर बहुत चोट पहुंचाई है। उनके सामने अपने उत्पादित माल को बेचने की भी बड़ी समस्या है जो उनके विकास में बाधक है। अपने विशाल मार्केटिंग तंत्र के कारण बड़ी कंपनियां अपना सामान आसानी से बेच लेती हैं लेकिन लघु और मंझोले उद्योगों के सामने यह प्रश्न खड़ा ही रहता है। केन्द्र सरकार ने भले ही एक मंत्रालय उनके लिए बना दिया है लेकिन ज़मीनी स्तर पर वह उनके लिए कुछ खास करने में सफल नहीं हो पाई है।

लघु उद्योगों के उद्यमी कुशल मार्केटिंग मैनेजरों को अपने यहां रख नहीं सकते जिससे उन्हें मार्केटिंग में परेशानी आती है। लघु उद्योगों को यह पता नहीं चल पाता है कि कौन सा उत्पाद बिकेगा और कौन नहीं। या फिऱ कितना उत्पादन करना चाहिए। इसके अलावा उनके पास सामान बेचने का कौशल भी नहीं है। अपना उत्पाद कैसे और कहां बेचा जाए, इस बारे में वे अनभिज्ञ रहते हैं। हालांकि केन्द्र में एक मंत्रालय छोटे और मध्यम उद्योगों की मदद के लिए है लेकिन वह कितना कारगर है यह अभी स्पष्ट नहीं है। मार्केटिंग ऐसी विधा है जिसके बिना लघु उद्योग असहाय हो जाते हैं। नतीजतन उनके सामने अस्तित्व का सवाल खड़ा हो जाता है। इस बारे में भी सरकार को सोचना होगा।

सरकारी संगठऩ लघु उद्योग में बने उत्पाद खरीदते हैं लेकिन यह मात्रा बेहद कम है। देश में कई विभाग हैं जो लघु और मध्यम उद्योगों की समस्याओं पर विचार कर रहे हैं। लेकिऩ उनकी गति धीमी है। यह एक ऐसा मसला है जिस पर जबर्दस्त प्रयास और विचार की जरूरत है। यह विदेशों से निवेश लाने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की बड़ी आबादी का भविष्य इससे जुड़ा है।

मधुरेन्द्र सिन्हा
Madhurendra Sinha is a senior journalist with vast experience in print and web based journalism. Currently he is the Editor with Policy Pulse.

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