समाज संस्कृति

लालच बुरी बला

रंजन कुमार सिंह

जीवन की पहली प्रतिक्रिया भूख के तौर पर प्रकट होती है। बच्चा रोता है तो माँ समझ लेती है कि उसे भूख लगी है। सभी जीव-जन्तुओं की भूख उनके पेट के अनुपात एवं आवश्यकता से संचालित होती है। एकमात्र मनुष्य ही ऐसा जीव है जिसकी भूख उसकी शारीरिक आवश्यकता से संचालित या नियंत्रित न होकर उसके मन या उसकी इच्छा से संचालित रहती है और इसीलिए वह अपने लिए अपनी भौतिक आवश्यकताओं से ज्यादा पाना चाहता है।

वैसे तो सभी जीवों को अपनी भूख शांत करने के लिए कुछ न कुछ करना पड़ता है, पर यह मनुष्य ही है जो इसके लिए कुकर्म तक पर उतारू हो रहता है। बाघ को भूख लगती है, तभी वह किसी हिरण का शिकार करता है। भूख न होने पर वह उनकी ओर ताकता तक नहीं। प्रकृति ने सभी जीवों की भूख को नियंत्रित रखने का उपाय कर रखा है, पर मनुष्य प्रकृति के इन नियमों से स्वयं को ऊपर पाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करने से वह बाज नहीं आता।

उसकी इस अनियंत्रित अथवा असीमित भूख को नियंत्रित करने का काम धर्म करता है। धर्म हमें भूख से निजात तो नहीं दिलाता, पर पाने और सिर्फ पाने की आपाधापी से बचा जरूर लेता है –

साई इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाए
मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाए

बाघ अपनी प्रकृति की वजह से कह बैठता है – अब और नहीं, बस। परन्तु मनुष्य को तो और-और चाहिए। उसके शब्दकोष में बस शब्द शायद है ही नहीं। उसे देते जाओ, देते जाओ, उसका लेना जारी रहेगा। उसे मालूम ही नहीं कि उसे बस कब कहना है। उसकी प्रकृति में ही नहीं है यह। ऐसे में धर्म ही है जो उसे बताता है – अब बस। मैं भूखा ना रहूं, यह जरूरी है। अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकूं, यह भी जरूरी है। कोई अतिथि अगर आ जाए तो उसका भी समुचित सत्कार कर सकूं, यह भी जरूरी है। बस इतना ही, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। इससे ज्यादा फालतू है और जो फालतू है, वह लोकहितकारी नहीं हो सकता।

सच कहे तो पाने की दौड़ मनुष्य को मनुष्य रहने ही नहीं देती। समेटने की होड़ में वह अमानुषी हो जाता है। ऐसे में धर्म ही उसका सहायक है। धर्म से बंधकर उसका मनुष्यत्व जागृत हो पाता है। अधर्म की राह पर चलते हुए वह पैशाचिक हो उठता है, जिसकी भूख का कोई अन्त ही नहीं। बचपन में हमें उस पिशाच की कहानी सुनाई जाती थी, जिसकी भूख कभी शांत ही नहीं होती। तब हम यह नहीं सोच पाते थे कि हम सबके भीतर का पिशाच है यह जो पाने की होड़-दौड़ में अपनी मनुष्यता ही खो बैठा है।

चाहे वह मनुष्य हो या कोई अन्य जीव, भूख तो उसकी सीमित ही होती है, यदि असीम कुछ होती है तो वह है मनुष्य की इच्छाएं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनुष्य की जरूरतें तो और जीवों की तरह थोड़ी ही हैं, पर उसकी इच्छाओं का कहीं कोई अन्त नहीं। महात्मा गांधी के शब्दों में कहें तो सभी मनुष्यों की तमाम जरूरतें तो प्रकृति जुटा सकती है, पर किसी एक व्यक्ति की भी अनन्त इच्छाओं की भरपाई वह नहीं कर सकती। ये इच्छाएं ही हैं जो मनुष्य को मोहपाश में बांध रखती हैं और फिर मोहपाश में बंधकर वह दुख एवं क्लेश का शिकार हो जाता है।

मनुष्य को इस मोहपाश से उबारने का काम करता है धर्म। श्रीमद भगवत्गीता का संदेश यही है और यही ईशोपनिषद में भी व्यक्त हुआ है। ईशोपनिषद का पहला श्लोक हमसे कहता है

ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1॥

यह कोई कूटोक्ति नहीं है, ना ही कोई उलटबासी है। बड़ा ही सीधा और सपाट है यह कथन। बिना किसी लाग-लपेट के कही गई बात है – इस संसार में जो कुछ भी है, चल या अचल, सब का सब ईश्वर का है। उसे त्याग कर ही तुम उसका आनन्द पा सकते हो। जो कुछ तुम्हारा है ही नहीं, उसके लिए फिर लोभ कैसा? ईशोपनिषद के इस ब्रह्मोक्ति को मैंने आम लब्ज़ों में कहने की कोशिश की है

रब की चादर में ढका है सब का सब
न तेरा है, न मेरा है, है रब का सब
लालच ही क्यूं उसके लिए तो दूजे का
लो मजे से तुम, छोड़ हिस्सा औरों का

यदि हम दूसरों का हिस्सा छोड़ना सीख लें तो इससे स्वयं हमारे दुखों का भी अन्त हो रहेगा। इतना ही तो हमें चाहिए कि मैं, मेरे परिजन और पर-जन कोई भी भूखा ना रहे। समाजवाद. यहां तक कि साम्यवाद, की अवधारणा के पीछे भी तो ईशोपनिषद का यही तथ्य है – प्रकृति द्वारा प्रदत्त्त जो कुछ भी है, वह किसी एक व्यक्ति का नहीं होकर पूरे समाज का है। यह ईश्वर का है – भगवान का नहीं, ईश्वर का, यानी सबों पर सम्भाव एवं सद्भाव से शासन करनेवाले महान शासक का, समाज की सम्मिलित शक्ति का प्रतिनिधित्व करनेवाले पुरुष या संस्था का। और वही ईश्वर तय करता है कि किसका कितना प्राप्य है। वह यह भी सुनिश्चित करता है कि समाज में शामिल कोई भी व्यक्ति भूखा न रहे।

जो सरकार या शासन व्यवस्था ईश्वर के तौर पर काम करती है, वही लोकहितकारी होती है। चाहे वह साम्यवादी व्यवस्था हो, समाजवादी व्यवस्था हो, या फिर रामराज्य, सबों के मूल में ईशोपनिषद का यह ब्रह्मबोध है कि संसार में सभी सामाजिक वर्गों के सभी व्यक्ति तमाम प्राकृतिक संपदाओं या संसाधनों के समान अधिकारी हैं और उन्हें अपनी आवश्यकता के अनुरूप इनका उपभोग करने की स्वतंत्रता है। इन सबपर यदि किसी का आधिपत्य है तो सिर्फ और सिर्फ उस महान शासक का, जो इन संसाधनों पर कुंडली मारकर नहीं बैठा है, बल्कि जो लोगों को त्याग की भावना के साथ उनका सानन्द उपभोग करने की छूट देता है। जिस तरह इस शासक को आध्यात्मिक चिन्तकों ने राम, रहीम आदि नामों से पुकारा है, उसी तरह राजनैतिक विचारकों ने उसे कम्यून, सोसाईटी या समाज आदि कहा है। इन सब के मूल में लोकहित की भावना है, भले ही उनकी शासकीय व्यवस्थाएं अलग-अलग क्यों न हों।

नीतिशास्त्र के संदर्भ में कहें तो अपने प्राप्य से अधिक प्राप्त करना अधर्म है, और समाजशास्त्र की भाषा में कहें तो अपने प्राप्य से अधिक प्राप्त करना है चोरी। जो नीतिशास्त्र से बंधे होते हैं, वे सन्त कहलाते हैं और जो समाजशास्त्र से बंधे होते हैं वे आदर्श नागरिक। यह मनुष्य ही है, जिसमें सन्त और आदर्श नागरिक दोनों ही बनने के गुण विद्यमान हैं और यही उसे तमाम दूसरे जीवों से अलग करता है। इन्हीं अर्थों में मनुष्य विशिष्ट है और अद्वितीय भी।

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