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लो फिर आ गया नया साल!

फिर नया साल आ गया। पुराना साल पीछे छूट गया। कहनेवाले कह सकते हैं कि साल अभी नहीं लगा है। वह तो शुरु होगा चैत्र के पहले दिन से। हिन्दू पंचांग के अनुसार बात करें तो उनकी बात गलत भी नहीं। शक संवत शुरु होता है चैत्र के पहले दिन से ही। लेकिन फिर शक संवत ही क्यों? 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के समय देश में 13 कैलेन्डर थे। विभिन्न प्रांतों और ध्रर्मों के अपने-अपने कैलेन्डर – कोई शक संवत को मानता था, तो कोई विक्रम संवत को; बंगालियों का अपना कैलेन्डर था तो तमिलों का अपना। ऐसे में एकरूपता जरूरी थी और वह भी वैज्ञानिकता पर आधारित रहते हुए। इस चुनौती को स्वीकार किया तब के सबसे बड़े भारतीय खगौलशास्त्री श्री मेघनाद साहा ने। उनके नेतृत्व में कैलेन्डर सुधार समिति का गठन हुआ, जिसमें उनके साथी थे ए0सी0 बनर्जी, के0के0 दफ्तरी, जे0एस0 करिन्दकर, गोरख प्रसाद, आर0वी0 वैद्य और एन0सी0 लाहरी।

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के तहत गठित इस समिति के सामने चुनौती थी वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर एक ऐसा सटीक कैलेन्डर तैयार करने की, जिसे पूरे भारत में समान रूप से अपनाया जा सके। चुनौती और भी बड़ी इसलिए थी कि उस समय के विभिन्न कैलेन्डर किसी न किसी जन भावना का प्रतिनिधित्व करते थे। समिति ने सभी कैलेन्डरों का विधिवत अध्ययन किया और फिर अपना निर्णय शक संवत के पक्ष में दिया। हालांकि इसके साथ ही उसने ग्रेगेरियन कैलेन्डर को भी मान्यता दी। शक संवत और ग्रेगेरियन कैलेन्डर दोनों में ही 365 दिन ही थे और दोनों में ही अधिवर्ष या लीप इयर का भी प्रावधान था। यही कारण है कि चैत्र का पहला दिन हरेक साल 22 मार्च को ही पड़ता है और अगर अधिवर्ष हो तो शक कैलेन्डर 21 मार्च से शुरु होता है। समिति के इस निर्णय की वजह से एक तरफ जहां राष्ट्रीय गौरव की रक्षा हुई, वहीं दूसरी तरफ भारत का वैश्विक स्वरूप भी प्रकट हुआ।

इस निर्णय के फलस्वरूप 22 मार्च 1957 को शक कैलेन्डर के साथ-साथ ग्रेगेरियन कैलेन्डर को भी अपना लिया गया और दोनों का ही उपयोग गजट से लेकर सरकारी पत्राचार तक में किया जाने लगा। विश्व के अधिकतर हिस्सों में ग्रेगेरियन कैलेन्डर को मान्यता मिली हुई है। ऐसे में अपने देश में उसका विरोध क्यों होना चाहिए? वह भी तब, जब हम इस बात पर गर्व करते हों कि हमारे योग विज्ञान को विश्व फलक पर मान्यता मिली हुई है। क्या यह जिद्द उचित है कि दूसरे हमारी मान्यताओं को तो अपनाएं पर हम उनकी मान्यताओं को नहीं अपना सकते? हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शक कैलेन्डर को ही भारत के हरेक समाज में मान्यता नहीं मिली हुई है। कोई बैसाखी पर नया साल मनाता है तो कोई ओणम पर। किसी के लिए नया साल बिशु से आरंभ होता है तो किसी के लिए उगादी से। तो क्या पंजाबियों या बंगालियों को शक कैलेन्डर के विरोध में खड़ा हो जाना चाहिए? उत्सव तो उत्सव है, उसे मनाने में संकोच क्यों?

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