समाज संस्कृति

मॉरिशस, हम आ रहल बानी!

मॉरिशस से मुझे पत्र मिला है,

आदरणीय श्री रंजन कुमार सिंह जी,
११वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सहभागिता हेतु भारत तथा अन्य देशों से मॉरीशस पधारने वाले सभी हिंदी प्रेमियों का स्वागत करने के लिए हम भी उत्साहित हैं| इस देश में आपके आवास को सुखद बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास किया जाएगा|
सादर
डॉ माधुरी रामधारी

डॉ माधुरी रामधारी मॉरिशस स्थित विश्व हिन्दी सचिवालय की उपमहासचिव हैं और फिलहाल 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की तैयारी में लगी हुई हैं। उनके द्वारा लिखे गए ये शब्द किसी अधिकारी के थोथे शब्द भर नहीं हैं, बल्कि इनमें भाव की गहराई और संकल्प की ऊंचाई, दोनो ही एक साथ है। वह हिन्दुस्तान से यहां पहुंचनेवाले पहले दस्ते तथा आज की पीढ़ी के बीच का सेतु हैं, जिनके हृदय में हिन्दी और हिन्दुस्तान बसता है।

पिताजी स्व0 शंकर दयाल सिंह की पुस्तक धार के इस पार, धार के उस पार के पन्ने पलटते हुए एक जगह पर जा रुकता हूं। उन्होंने लिखा है,

मॉरिशस की माटी में, कण-कण में, चप्पे-चप्पे में बिखरा है भारत – अपने मूल में, निजता में, संस्कारों में। भारत यहां जीवित है – बिरहा की तानों में, चिकनिया कबड़ी और गुल्ली डंडा के खेलों में, रामायण की दोहे-चौपाइयों में, लेकगीतों की धुनों में, मंदिर-शिवालय और देवी-देवताओं के प्रति निष्ठा में, हिन्दी भाषा और भोजपुरी बोली में, अक्षत-चन्दन, धूप-दीप-धृत तथा प्रसाद के थाल में, धोती-कुरता और पगड़ी में, बैंगन के चोखे और कोहड़े-लौकी की छौकन में, दाल-भात-तरकारी में, गंगा तालाब के पानी एवं आतमन के जल में, हरि कीर्तन के बोल में, ढोल-झांझर-मजीरा में, तबला-हारमोनियम में।

मुझे 16 अगस्त को मॉरिशस पहुंचना है, पर मन अभी से अधीर है। कैसा होगा मॉरिशस? भारत को अपनी संस्कृति, सभ्यता, एवं धार्मिक अनुभूतियों का केन्द्र माननेवाले सर शिवसागर रामगुलाम का मॉरिशस! हिन्दी को विश्व भाषा बनते देखने का सपना संजोनेवाले सर अनिरुद्ध जगन्नाथ का मॉरिशस! हिन्दी को मॉरिशस तथा भारत के बीच का सेतु समझने वाले श्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ का मॉरिशस! मॉरीशस के विपुल हिन्दी साहित्य को शोधकर्ताओं में रुचि जागृत करने में सक्षम माननेवाली डॉ माधुरी रामधारी का मॉरिशस! और तो और, “नमस्ते भइया, हाल-चाल बा न ठीक?” पूछकर मेरे पिता को चौंका देनेवाली होटल की अनाम सफाईकर्मी का मॉरिशस!

“हां हो, सब ठीक बा” का उत्तर पाकर उसने उनसे दूसरा सवाल किया था – “लड़िकन अऊ भउजी के काहे न लेके अईल?” कितना अपनापन से भरा था उसका यह सवाल। कहां खोजुंगा मैं उस अज्ञात महिला को यह बतलाने के लिए कि “लो बुआ, देखो, मैं आ गया!”

अधीर मन पुनः सोचने लग पड़ता है, कहीं मॉरिशस के तेजस्वी कवि श्री बृजेन्द्र भगत मधुकर अब भी तो हमारा स्वागत इन बोलों से करते नहीं मिलेंगे,

भारत का स्वागत करते है

मन-मंदिर श्रद्धा दीप जला अर्चन से स्वागत करते हैं

आस्तिकता के शुचि थाल सजा पूजन से स्वागत करते हैं

माला-मोती, हीरा-चांदी, कंचन से स्वागत करते हैं

अक्षत-कुमकुम, धूप-सुगंधी, चंदन से स्वागत करते हैं

माथ झुका शुचि चरणों में तन-मन से स्वागत करते हैं

भारत के वीर सपूतों का अभिनन्दन स्वागत करते हैं

जिसके मानस में बहती है युग-युग से गंगा की धारा

हिमगिरि की उन्नत चोटी से गुंजित आजादी का नारा

उस पुण्य-पुरातन धरती का अभिनन्दन-स्वागत करते हैं

मन यूंहीं अधीर नहीं है। मैं जानता हूं कि मॉरिशस मुझे बुला रहा है। सुनता आया हूं कि उसकी प्राकृतिक सुन्दरता मन को मोहनेवाली है, और जानता रहा हूं कि उसका अनुराग मन को बांधनेवाला है।

मॉरिशस, हम आ रहल बानी!

4 thoughts on “मॉरिशस, हम आ रहल बानी!”

  1. You will add to the grace of the program with your immense creativity and literary skill

  2. मन अधीर देखता रहा बाट,संजोता रहा सपने,
    मारीशियस तेरी धरती पर कदम होगे अपने !!!!

  3. बिलकुल सही कहा आपने मॉरिशस के कण कण में,चप्पे चप्पे पर मौजूद है भारत। आपकी उपस्थिति अवश्य रंग लाएगी और हिंदी का मान सम्मान भी बढ़ेगा।

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