अन्य समाज

किसी और से संभाले नहीं संभलेगी वह बिन्दी

शीला दीक्षित का चले जाना अभी ताजा ही था कि सुषमा स्वराज भी हमारे बीच से चली गई। आज की विद्रूप होती जा रही राजनीति में दोनों महिलाएं शालीनता की प्रतिमूर्ति थीं। दोनों पर ही कीचड़ उछाले जाते रहे, पर दोनों में से किसी ने भी अपनी शालीनता नहीं छोड़ी। इस बात को अभी एक महीने भी नहीं हुए हैं कि जब किसी सिरफिरे ने शीलाजी के प्रति सुषमाजी के उद्गार पर उन्हें लिखा था – आपकी भी बहुत याद आएगी एक दिन शीलाजी की तरह अम्मा! निर्लज्जता से भरी इस टिप्पणी को स्वीकारते हुए उन्होंने संजीदगी से जवाब दिया था – इस भावना के लिए आपको मेरा अग्रिम धन्यवाद। तब हम उनकी इस बात का अर्थ नहीं समझ पाए थे, पर एक तरह से वह अघट की ओर संकेत कर रही थीं।

मुझे याद है कि मेरे पिता भी अपने सांसद निधि का उपयोग करते हुए लोगों से कहते थे कि मत समझिएगा कि मैं यह राशि इसलिए दे रहा हूं कि लोकसभा का उम्मीदवार हूं। लोकसभा नहीं, मैं तो अब परलोकसभा का उम्मीदवार हूं। तब सभी उनकी इस बात पर हंस देते थे, और वह खुद भी अपने चिर-परिचित अंदाज में जोर से ठहाका लगा देते थे, पर जल्दी ही लोगों को समझ में आ गया कि अपने बारे में वह सही  कह रहे थे। ऐसे लोग विड़ले होते हैं जो अपनी मौत की भविष्यवाणी हंसते-हंसते कर जाते हैं। मेरे पिता उनमें से एक थे और सुषमाजी दूसरी।

मेरे पिता श्री शंकर दयाल सिंह के निधन पर सुषमाजी हमारे घर पहुंची थीं। मेरी पत्नी रचना उन्हें याद करते हुए बताती है कि वह मेरी मां के पास पहुंची तब रचना उनसे बात कर रही थी। घर की बहू के रूप में उसे नहीं पहचानते हुए उन्होंने समझा कि कोई मां को बेवजह परेशान कर रही है और उसे जोर से झिड़क दिया। दरअसल पिताजी को वह अपने बड़े भाई होने का गौरव देती थीं और इस नाते वह अधिकार भाव से सब कुछ देख-कर रही थीं।

एक बार मैं उनसे मिलने उनके घर गया तो उन्होंने मुझे अंदर के ड्राइंग रूम में बुला लिया। तब वह मंत्री नहीं थीं, लेकिन आगत चुनाव को लेकर उनके यहां भीड़-भाड़ खूब थी। मैं अभी दरवाजे पर ही था कि वे अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई और मेरे स्वागत में आगे बढ़ चलीं। मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय था क्योंकि मैं उनसे हर तरह से छोटा था। मैं संकोच में पड़ा था कि फिर मैंने देखा कि उनके पाँव आप से आप ठिठक गए और मुस्कुराते हुए वह वापस अपनी सीट पर जा बैठीं। मैंने जब उन्हें पैर छूकर प्रणाम किया तो मुस्कुराते हुए ही उन्होंने कहा – “रंजन, तुम्हें भीतर आता देखकर एक क्षण को तो मुझे लगा कि शंकर दयाल जी ही चले आ रहे हैं।” मेरे मित्र हरिशंकर जी इस धटना के साक्षी रहे।

मैं उस चुनाव में चतरा से भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार होना चाहता था। मेरे पिता चतरा से 1971-77 में सांसद रह चुके थे और इस कारण वहां के लोगों का मेरे प्रति अनुराग था। मेरी दलील थी कि झारखंड में भाजपा ने इससे पहले के चुनाव में चूंकि किसी राजपूत को टिकट नहीं दिया, इसीलिए वह यहां सभी सीटों पर हार गई। इस बार किसी राजपूत को उम्मीदवार बनाया जाना जरूरी है। उन्होंने मेरे तर्क को समझा और सराहा ही नहीं, मेरी उम्मीदवारी को लेकर उन्होंने झारखंड के नेताओं से बातचीत भी की। यह दीगर बात है कि मेरे इस तर्क के दम पर तब श्री पी0एन0 सिंह जी ने घनबाद से पार्टी का टिकट सुनिश्चत कर लिया और मैं रह गया। हालांकि प्रदेश से राजपूत उम्मीदवार देने का भरपूर लाभ पार्टी को मिला। आज  तो धनबाद से श्री पी0एन0 सिंह के साथ-साथ चतरा से श्री सुनील सिंह भी सांसद हैं।

चुनाव के बाद सुषमाजी ने मंत्री पद की शपथ ली तो मेरी पत्नी ने मेरे हाथ से उनके लिए एक साड़ी भिजवाई। उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकारते हुए कहा कि मैं इसे पहनकर सदन में जरूर जाउंगी। मैंने भी मजाक में कह दिया कि अच्छा होगा कि आप इसे पहनकर सदन में जाएं, नहीं तो रचना को लगेगा कि मैंने यह साड़ी अपनी किसी मित्र को दे दी है। इसपर वह जोर से हंस पड़ी थीं। विदेश मंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल हमेशा याद किया जाता रहेगा। उन्होंने भारत का संबंध दूसरे देशों से ही मजबूत नहीं किया, बल्कि वहां के नागरिकों के दिलों को भी छू लिया। सरकार में रहते हुए मानवीय करुणा को बनाए रखना कोई उनसे सीखे। इसे लेकर उनकी आलोचना भी हुई, पर उन्होंने हमेशा वही किया जो उन्हें करना चाहिए था और जो देश के लिए हितकर था।

मेरी उनसे आखिरी मुलाकात गत वर्ष मॉरिशस में हुई थी, जहां मैं विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने पहुंचा था। वह वहां भारत की विदेश मंत्री के तौर पर तो उपस्थित थी हीं, हिन्दी के प्रति अपने अनुराग की वजह से उससे भावात्मक तौर पर भी जुड़ी हुई थीं। सम्मेलन में मैंने एक प्रस्ताव तैयार किया कि यहां स्थित विश्व हिन्दी सचिवालय की तर्ज पर दूसरे देशों में विश्व हिन्दी उपसचिवालय बनाए जाएं। इस प्रस्ताव पर देश-विदेश के अनेकों विद्वानों से हस्ताक्षर कराकर मैंने उसे उनके सुपुर्द कर दिया। उन्हें यह विचार बहुत सुहाया। यह दीगर बात है कि इसके बाद अपने स्वास्थ्य की वजह से वे इसपर पूरा ध्यान नहीं दे सकीं।

हिन्दी के प्रति उनका प्रेम उनके वक्तव्यों में स्पष्ट प्रकट होता था। भाषा पर उनकी जितनी पकड़ थी, उतना ही उनकी वाणी में ओज था। उनके जैसे वक्ता कम ही होते हैं। वह जब बोलतीं तो लगता मानो कविता कर रही हों। उनके वक्तृत्व में कथ्य और तथ्य का बल होता था। हमारे बीच से उनका उठ जाना भारतीय राजनीति से एक सशक्त और प्राणवान नेत्री का कम हो जाना तो है ही, हिन्दी जगत की तो यह अपूरणीय क्षति है। उनके माथे की बड़ी बिन्दी किसी और से संभाले कहां संभलेगी!

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