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हमें क्या देकर जाएगी दिवाली?

रचना सिंह

कहने को दीपावली अपने साथ खुशियां लेकर आती है, लेकिन सच यह है कि हमें प्रदूषण देकर जाती है। पटाखों से वायु प्रदूषण तो होता ही है, उससे भी बढ़कर ध्वनि प्रदूषण होता है। और इन दोनों का दुष्परिणाम हम दीपावली के काफी बाद तक भुगतने के लिए बाध्य रहते हैं।

वैसे तो दीपावली का अर्थ होता है दीयों की पंक्ति, पर दीपों के दर्शन दीपावली पर अब शायद ही होते हैं। दीपों का स्थान पहले कंदील ने और अब बिजली की लाईटों ने ले लिया है। मैं कह सकती हूं कि यह सब कुछ मेरे देखते-देखते बदला है। मुझे याद है कि बचपन में हमारे घरों में घी के दीये जलाए जाते थे। जब मैं किशोर वय की हुई तब तक घी का स्थान तेल ने ले लिया था। तब पर भी यह अच्छा समय था। फिर हमारे देखते ही देखते तेलों का प्रचलन भी कम होता गया और दीपावली पर दीयों को जलाने के लिए जले हुए मोबील की खोज होने लगी। निश्चय ही यह बदलाव महंगाई की वजह से होता रहा, पर सस्ते के चक्कर में पड़कर हम अपनी आबो-हवा का नुकसान ही करते रहे।

घी की आहूती शुभ मानी गई है क्योंकि आग में पड़कर घी अपने चरम प्रभाव पर जा पहुंचता है और उसका लाभ एक की बजाय अनेक तक पहुंच जाता है। इसलिए भी घी के दीयों का अपना महत्व था। इससे पर्यावरण शुद्ध हो जाता था और बरसात के बाद बहुतायत में आ चुके कीट-पतंग भी खत्म हो जाते थे। फिर जब दियों में तेल का प्रयोग होने लगा तो इससे पर्यावरण का नुकसान तो नहीं हुआ, पर पर्यावरण को कोई लाभ भी नहीं हुआ। हां, कीट-पतंगें अब भी खत्म हो जाया करते थे। इसके बाद जब जली हुई मोबील का इस्तेमाल होने लगा, फिर तो मानो पर्यावरण की शामत ही आ गई। गनीमत है कि मोबील के दीयों का स्थान जल्दी ही कंदील ने ले लिया, लेकिन जो खूबसूरती दीयों की टिमटिमाहट में थी, उसका पूरी तरह लोप हो गया।

हमारे बाल-बच्चे तो खैर न दीये जानते है और ना कंदील। वैसे भी दीये जलाना आसान काम न था। उसके लिए समय और श्रम दोनों लगते थे। दीपावली से दो दिन पहले दीयों को पानी में डाल दिया जाता था ताकि वह बेवजह घी-तेल सोख न ले। एक दिन पहले ही पूरे घर में दीये लगा देने होते थे। लगते भी थे वे सैकड़ों की संख्या में, आज की तरह दर्जनों में नहीं। दीपावली की सुबह तक उनमें बाती और घी या तेल डाल देना भी जरूरी हो जाता था, नहीं तो इतने दीयों को समय पर जलाना मुश्किल था। अब तो न किसी के पास समय है और ना ही कोई इतना श्रम ही करना चाहता है। मदद के लिए पहले जितने हाथ हुआ करते थे, वे भी तो अब नहीं रहे। इस फटाफट युग में तो चीन से आयातित लाईटें ही भली हैं। दीपावली की सुबह-सुबह खरीद कर लाओ और शाम तक घर के बाहर टांग-टूंगकर जला दो। जला भी क्या दो, एक स्विच के दबाते ही सभी की सभी लाईटें एक साथ जल उठती हैं। फिर उन्हें एक दिन जलाकर रखो या हफ्ते भर जलाते रहो, कोई फर्क नहीं पड़ता।

पर फर्क तो पड़ता है और सच कहिए तो पड़ ही रहा है। इन लाईटों से पर्यावरण को लाभ तो बिलकुल नहीं होता, उनसे निकलने वाली गरमी से उसका नुकसान जरूर हो जाता है। कीट-पतंग तो अब वैसे ही कम होते जा रहे हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो न जाने क्या होता। यह तो तय है कि घी के दीयों से पर्यावरण की शुद्धि का जो काम होता था, वह अब बिलकुल भी नहीं होता। हमारे पूर्वजों ने बड़ी सोच-समझकर जो परंपराएं स्थापित की थीं, उनका पालन अब हम ऊपरी तौर पर ही कर रहे हैं। कभी महंगाई के नाम पर तो कभी सरल विधि के नाम पर हमने वे तमाम परंपराएं बदल डाली हैं, जो मनुष्य और प्रकृति के लिए हितकारी थीं। बिजली की लाईटें हमारी खुशियों का तात्कालिक सूचक भले ही हो जाएं, पर इससे हम पर्यावरण के प्रति अपना दायित्व पूरा करने से वंचित रह जाते हैं।

मुझे याद है कि बचपन में अनार और फुलझरियां सबसे अधिक चलाई जाती थीं। उनका अपना आनन्द था। चूंकि सब लोग मिल-जुलकर पटाखे चलाते थे, इसलिए एक-एक अनार या फुलझरी का आनन्द भी सभी उठाया करते थे। और बारी-बारी से सभी को पटाखे चलाने का मौका भी दिया जाता था। अब जब लोग मिल-जुलकर पटाखे नहीं चलाते, तो ऐसे पटाखों का चलन बढ़ गया है, जो दूर से ही सुनाई या दिखाई दे जाते हों। अनार और फुलझरी का चलन इसीलिए कम हो गया है, क्योंकि उन्हें दूर से नहीं देखा जा सकता। सब जब अपने ही फोड़ने में लगे हों तो जरूरी है कि उनमें इतनी आग हो ही वह दूसरे की रौशनी को लील जाए। उसमें इतना धमाका हो कि वह दूसरे की आवाज पर भारी पड़े। इन सब का असर वायु तथा ध्वनि प्रदूषण के तौर पर दिखाई देने लगा है। और यह असर बढ़ता जा रहा है, बढ़ता ही जा रहा है।

पिछले दिनों मैं अपनी बेटियों के पास अमेरिका गई तो वहां उनका स्वतंत्रता दिवस समारोह देखने का मौका भी हाथ लग गया। इस अवसर पर हमारी ही तरह वे पटाखे चलाते हैं। लेकिन मार्के की बात है कि वह हर गली-मुहल्ले में नहीं होता और उसमें भी पूरे-पूरे दिन नहीं चलता। न्यू यार्क में यह ब्रुकलिन ब्रिज के पास ईस्ट रिवर में कुल मिलाकर आधे घंटे का होता है। लेकिऩ उसे देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। न्यू यार्क शहर के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि आसपास के उपनगरों से भी। और मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि इस आध घंटे में ही जो दृश्य वहां उपस्थित होता है, वैसा हम दिल्ली में पूरी-पूरी रात में भी नहीं देख पाते। इसी तरह के कार्यक्रम वाशिंगटन-डीसी, फिलेडेल्फिया आदि शहरों में भी देखे जा सकते हैं। और तो और, इन सभी शहरों में यह शो नदी के बीच में  होता है। बड़े से जहाज से पटाखे चलाए जाते हैं और नदी की दोनों ओर खड़े होकर लोग इनका आनन्द लोते हैं। नदी के बीच होने से आग का खतरा कम हो रहता है और प्रदूषण भी नियंत्रण में रहता है। स्थान तथा समय की पाबंदी के कारण पर्यावरण का नुकसान वैसा नहीं होता, जैसा कि हम अपने यहां देखते हैं।

काश हम भी अपने यहां ऐसा ही कुछ कर पाते।

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