समाज

हिम्मते मर्दा, मददे खुदा

नाम – मो0 दुलारे कुरैशी। निवासी – बेतिया (पश्चिम चम्पारण)। पिता – काश्तकार। खेती इतनी भी नहीं कि परिवार का गुजारा ठीक ढंग से हो जाए। परिवार भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि नौ लोगों का। उसमें एक बहन भी। उसकी शादी एक अलग समस्या। पिता ने अपना पेट काटकर पढ़ाया-लिखाया और बेतिया भेज दिया फिटर का प्रशिक्षण लेने को। परिवार का बड़ा बेटा होने के कारण उसके कंधे पर जिम्मेदारी भी बड़ी थी। बड़े ही अरमान से घर से चला फिटर बनने को। सोचा था कि प्रशिक्षण पूरा कर के जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा और फिर अपने पिता का हाथ बंटाएगा। बड़े ही जतन और लगन से प्रशिक्षण पूरा किया। लगा कि जैसे सब दुखों का अन्त अब नजदीक है। परन्तु दुख का अन्त हुआ नहीं। कहीं नौकरी नहीं मिली। शिक्षा व्यवस्था की खामियों के कारण उसे न तो लक्ष्य का ज्ञान था और ना ही दिशा का बोध। पढ़ाई पूरी कर ली, पर रोजगार लायक तब भी न हो सका। मन का उत्साह समय के साथ निराशा और हताशा में बदल गया। और तभी किसी ने उसे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के बारे में बताया। किसी ने कहना ठीक नहीं होगा। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की सहयोगी संस्था आईएल एंड एफएल स्किल ने ही अभियान चलाकर बेरोजगार युवकों को रास्ता दिखाया। उन्हें बताया कि रोजगार के लिए सिर्फ डिग्रीधारी होना जरूरी नहीं है, उसके लिए कुशल भी होना आवश्यक है। हाथ में सिर्फ डिप्लोमा होने से बात नहीं बनती, नौकरी के लायक भी बनना पड़ता है। इस बार फिर उसे प्रशिक्षण लेने के लिए कहा गया। हालांकि पहले की तरह साल-छह महीने के लिए नहीं, बल्कि केवल एक माह के लिए ही। वह भी मुफ्त में। सारी व्यवस्था प्रशिक्षण केन्द्र के जरिये राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की। हाथ कंगन को आरसी क्या। मौका उसने हाथ से जाने न दिया। आईएल एंड एफएल इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल्स, अकबरपुर (बेतिया) पहुंचने पर उसने पाया कि पैसे खर्च कर के भी वह जो नहीं सीख पाया था, यहां के मानक पाठ्यक्रम तथा उन्नत सुविधायुक्त प्रशिक्षण केन्द्र की बदौलत वह उससे बहुत ज्यादा सीख सका है। वहां उसे पेशे की जानकारी के साथ-साथ अनुभव भी हासिल करने का भरपूर मौका मिला। प्रशिक्षण के अन्त में उसके पास महज प्रमाण-पत्र ही नहीं था, उसके हाथों में कौशल भी था और सबसे बड़ी बात कि वह अब कहीं भी नौकरी करने के लायक बन चुका था। इसी वजह से प्रशिक्षण पूरा करते ही उसकी नौकरी लग गई। अब वह इंडो-ऑटोटेक प्राइवेट लिमिटेड में काम करता है और दस हजार रुपये प्रति माह कमा रहा है। उसके माँ-बाप तो इससे खुश हैं ही, उसके छोटे भाइयों में भी उसकी इस सफलता से नई उम्मीद जगी है। अब वे भी मानते हैं – हिम्मते मर्दा, मददे खुदा।

रंजन कुमार सिंह
लेखक-पत्रकार-फिल्मकार रंजन कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्स से सफर शुरु कर टीवी की दुनिया में कदम बढ़ाया। अनके टीवी कार्यक्रम का निर्माण-निर्देशन करने के साथ ही वह अब तक आठ पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से तीन हिन्दी की तथा शेष अंग्रेजी की हैं। देश-विदेश में वह भारतीय कला-संस्कृति तथा भारतीय हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान के लिए भी बुलाए जाते रहे हैं। वह अनेक शिक्षा संस्थानों तता अकादमियों से भी जुड़े रहे हैं।

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