संस्कृति

मॉरिशस में 11वे विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन 18 अगस्त से

11वे विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन इस वर्ष मॉरिशस में होने जा रहा है। यह तीसरा मौका होगा जबकि मॉरिशस विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी करेगा। इससे पहले दूसरे तथा चौथे विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी वह कर चुका है। यह भी एक सुखद संयोग ही है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी में वह भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता रहा है। प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन भारत के नागपुर में हुआ तो द्वितीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन मॉरिशस में, तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी नई दिल्ली ने की तो चतुर्थ विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी पोर्ट लुई ने। और अब जब दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन भोपाल में हुआ तो मॉरिशस भी कहां पीछे रहनेवाला था!

मॉरिशस पर अब तक चाहे जिस किसी का भी शासन रहा हो, पर बसा है वह भारतवंशियों से ही। सर शिवसागर रामगुलाम, सर अनिरुद्ध जगन्नाथ, डा0 नवीन रामगुलाम, और प्रवीन जगन्नाथ का मॉरिशस का प्रधानमंत्री बनना यह बताने के लिए काफी है कि बहुमत यहां किनका है। नेपाल और भारत के बाद मॉरिशस में ही सबसे अधिक हिन्दू हैं। मॉरिशस की कुल जनसंख्या में उनका प्रतिशत 51.9 है। वर्ष 1834 में भारत से लोग पहली बार यहां लाए गए। तब यहां ब्रिटिश शासन था और उन्हें यहां गन्ने की खेती करने के लिए आदमियों की तलाश थी। कुछ समय तक तो अफ्रीका से दास बनाकर लोग लाए गए, पर दास प्रथा पर पाबंदी लग जाने के बाद उनकी नजर भारतवंशियों पर पड़ी।

चूंकि गन्ने की खेती भारत में होती थी, इसलिए वहां के लोग इस काम के लिए मुफीद समझे गए। वैसे तो ज्यादातर मजदूर यहां बिहार तथा उत्तर प्रदेश से लाए गए, पर राजस्थान, मध्य प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र, तमिल नाडु, और आंध्र प्रदेश के लोगों की संख्या भी कम-बेस रही। इन सभी को एक करार के तहत लाया गया था। करार या  एग्रीमेंट के तहत लाए जाने के कारण ही वे गिरमिटिया कहलाए। गिरमिटिया एग्रीमेंट का ही बिगड़ा रूप है। मॉरिशस में जिस जगह पर इन मजदूरों को उतारा गया, वह स्थान आज आप्रवासी घाट के नाम से प्रसिद्ध है। इस ऐतिहासिक स्थल को यूनेस्को ने अपनी विश्व दाय सूची (वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट) में शामिल कर लिया है और यह पोर्ट लुई का एक प्रमुख पर्यटन आकर्षण है।

मॉरिशस की स्थिति अफ्रीका के निकट है। स्वाभाविक रूप से अफ्रीकियों की नजर ही उसपर सबसे पहले पड़ी। लेकिन यूरोपीय देशों में पुर्तगाल के नाविकों ने इसे पहले पहले देखा। इसके बाद यहां डच और फ्रीसीसी, दोनो का कब्जा रहा। मॉरिशस नाम डच द्वारा दिया गया है। उन्होंने यह नाम मॉरीस ऑफ़ नासाउ के नाम पर दिया, जोकि 1585 से 1625 तक डच शासक था। इस तरह मॉरिशस विश्व के 22 ऐसे राष्ट्रों  में है, जिनका नामकरण किसी व्यक्ति के नाम पर हुआ है। इस सूची में बोलिविया से लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका तक शामिल हैं।

मॉरिशस ने अपना नाम बेशक डच से लिया हो, पर उसने अपनी भाषा अंग्रेजों, फ्रासिसियों तथा भारतीयों से ली है। मॉरिशस के पार्लियामेंट में अंग्रेजी तथा फ्रासिसी, दोनों भाषाएं बोली जाती है। दोनो देशों के साथ अपने रिश्ते कायम रखते हुए मॉरिशस राष्ट्रकुल देशो (कामनवेल्थ नेशन्स) के साथ ही ला फ्रैंकोफोनी में भी शामिल है। वैसे वहां की अधिसंख्य आबादी क्रेयोल नामक एक मिश्रित भाषा बोलती है, जिसपर फ्रेंच के साथ भोजपुरी का भी असर है। दिलचस्प बात यह भी है कि कुछ घरों में यहां आज भी खांटी या ठेठ भोजपुरी बोली जाती है, जो अब भारत में भी कम ही सुनाई देती है। हिन्दी के प्रति उनके समर्पण का भाव इस बात में तो प्रकट है ही कि वह भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन करता आया है, उससे भी बड़ी बात यह है कि मॉरिशस ने अपनी धरती पर विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना की है और वही उसका संचालन भी करता है।

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