समाज

कौशल के क्षेत्र में विश्व विजेता बनने की चाह

करन दस साल का ही था, जब बालों के साथ उसका रोमांस शुरु हो गया। एक दिन उसने अपने बाल खुद ही काट डाले और फिर खुद को शीशे में निहारता रहा। उसे लगा कि कुछ गलत हो गया है तो फिर से अपने बालों पर कैची चला दी। कभी सामने से तो कभी किनारे से वह बार-बार अपने बाल काटता रहा और अपने बदलते रूप को शीशे में निहार कर खुद पर ही मोहित होता रहा। मां ने उसे ऐसे में देखा तो गुस्सा हूई और फिर नाई के यहां उसे भेजकर उसके बाल बेहद छोटे करवा दिए ताकि वह उन्हें और काट ही न सके।

बाल तो बाल थे सो फिर बढ़ने लगे और बालों के साथ बालों के प्रति उसका आकर्षण भी बढ़ता गया। समय के साथ यह आकर्षण परवान चढ़ता गया। इतना कि बारहवीं पास करते-न करते उसने तय कर लिया कि उसे करना क्या है। उसकी उम्र में जब बच्चे इंजीयरिंग और मेडिकल करने की सोच रहे होते हैं, उसने फैसला कर लिया कि अगर उसे जिन्दगी में कुछ करना है तो वह है केश विन्यास या हेयर स्टाइलिंग। वह अपने और दोस्तों की तरह जिन्दगी की घुड़दौड़ में शामिल नहीं होना चाहता था, बल्कि ऐसा कुछ करना चाहता था, जिसमें वाकई उसकी अपनी रुचि हो।

घर की माली हालत अच्छी नहीं थी। पिता ड्राइवर हैं। रोजगार उन्हे चेन्नै से दिल्ली ले आया है। घर और बच्चों को मां ही संभालती हैं। दिल्ली के ही एक तमिल माध्यम स्कूल में उन्होंने बच्चों को पढाया। करन से बड़े दो बेटे हैं, पर उन दोनों की रुचि पढ़ाई से ज्यादा खेलकूद में रही। करन का सबसे बड़ा भाई क्रिकेट खेलता है और मंझला भाई फुटबाल। अरमुघम करन न तो अपने भाइयों की तरह खिलाड़ी बनना चाहता था, और ना ही अपने पिता की तरह ड्राइवरी को पेशा बनाना चाहता था। उसके मन में ललक थी कुछ कर दिखाने की और होसला था अपनी राह खुद बनाने का। उसके भीतर का कलाकार केश विन्यास या हेयर ड्रेसिंग के क्षेत्र में नाम कमाना चाहता था। उसे अपनी मंजिल पता थी और रास्ते का भी ज्ञान था।

हर माँ-बाप की तरह उसके मां-बाप भी चाहते थे कि उनके बच्चे कुछ पढ़-लिखकर कहीं नौकरी पा लें, पर उन्होंने अपने तीनों बेटों पर किसी तरह का दबाव नहीं डाला। अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद अपने सभी बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार अपना पेशा चुनने की आजादी उन्होंने दी। करन ने बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के ब्लासम कोचर कालेज ऑफ क्रिएटिव आर्ट एंड डिजाइन में दाखिला ले लिया और वहां हेयर स्टाइलिंग सीखने लगा। सीखने की ललक औक काम से प्यार की वजह से वह जल्दी ही इसमें निपुण हो गया। यहीं उसकी मुलाकात प्रदीप वैद से हुई जो वर्ल्ड स्किल चैम्पियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने साओ पाउलो जा रहा था और इसके लिए ब्लासम कोचर में ही प्रशिक्षण ले रहा था।

तभी उसने ठान लिया था कि एक दिन वह भी भारत का झंडा इसी तरह उठाएगा और कोशल के क्षेत्र में देश का नाम ऊंचा करेगा। वर्ल्ड स्किल चैम्पियनशिप को कौशल क्षेत्र का ओलिम्पिक कहा जाता है, जिसमें सौ से भी अधिक देशों के युवा विभिन्न कौशल का प्रदर्शन करते हैं और उनके बीच से विजेता चुना जाता है। जिस तरह ओलिम्पिक में खेलों का मुकाबला होता है, वैसे ही वर्ल्ड स्किल चैम्पियनशिप में हुनर का मुकाबला होता है। केश विन्यास या हेयर ड्रेसिंग भी उन्ही में से एक कौशल है। प्रदीप को साओ पाउलो में मेडल तो नहीं मिला, पर वह वहां से मेडेलियन लेकर लौटा। यह भी कोई कम बड़ी बात नहीं थी क्योंकि मेडिलियन उन्ही को मिलता है, जो कौशल में ऊंचा स्तर प्राप्त कर पाते हैं। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी कि प्रदीप ने करन के मन में विश्व कौशल प्रतियोगिता में भाग लेने की चाह जगा दी थी।

हालांकि करन के लिए मंजिल अभी दूर थी। केश विन्यास में तीन महीने का पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद उसके सामने चुनौती थी नौकरी पाकर अपने परिवार का हाथ बंटाने की। उसकी छोटी उम्र को देखते हुए कोई उसे गंभीरता से लेने को तैयार ही नहीं होता था। कहीं नौकरी की पेशकश होती भी तो किसी छोटे-मोटे सैलून में सहायक के लिए, जो उसे मंजूर नहीं था। फिर भी उसने अपने अरमानों को मरने नहीं दिया। इस मुश्किल समय में उसे अपने परिवार का भरपूर साथ मिला। साल भर तक एड़ियां घिसने के बाद किसी सैलून में नौकरी मिली 2500 रुपए महीने पर। पहला वेतन मिला तो उसने सारा पैसा माँ के हाथों में रख दिया। मां का गला भर आया और उन्होंने अपने बेटे को गले से लगा लिया। पिता को भी अपने बेटे पर गर्व हुआ, पर उन्हें तो अभी और भी अच्छे दिन देखने थे।

करन जिस सैलून में काम करता था, वह साधारण सा ही था। यहीं अपनी लगन और मेहनत से उसने अपनी जगह बना ली और सीनियर हेयर ड्रेसर बना दिया गया। लेकिन साधारण नाई बनकर वह अपनी तमाम जिन्दगी नहीं गुजारना चाहता था। वह कुशल कारीगर के तैर पर अपनी पहचान बनाना चाहता था। अब उसकी निगाह टिकी थी वर्ल्ड स्किल चैम्पियनशिप पर। ब्लासम कोचर ने भी उसे इसके लिए प्रोत्साहित किया और चूंकि वह मूल रूप से दक्षिण बारत का रहनेवाला था, उन्होंने उसे दक्षिण क्षेत्र से ही इंडिया स्किल चैम्पियनशिप में भाग लेने की सलाह दी। इससे पहले डेढ साल तक उसे प्रतियोगिता की दृष्टि से प्रशिक्षण दिया गया। उसे तकनीक की बारीकियां समझाई गई। इस प्रशिक्षण और खुद उसकी मेहनत का नतीजा था कि वह दक्षिण क्षेत्र में रजत पदक जीतने में कामयाब रहा।

इसके बाद भी उसने कुछ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। किसी में रजत पदक मिला तो किसी में कांस्य। मन मे स्वर्ण पदक की आस लिए वह इन प्रतियोगिताओं में भाग लेता रहा, पर स्वर्ण उसे छलता रहा। फिर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता की बारी आ गई, जिसमें हर क्षेत्र में शीर्ष पर रहनेवाले पाँच प्रतियोगियों को भाग लेना था। अब उसके प्रशिक्षकों ने उसे समझाया, तुम्हारा मुकाबला किसी और से नहीं है, तुम्हारा मुकाबला अगर किसी से है तो खुद तुमसे। तुम्हें पदक जीतने के लिए प्रतियोगिता में भाग नहीं लेना है। तुन्हें इसमें भाग लेना है खुद को बेहतर बनाने के लिए। इसके बाद तो मानो उसका व्यक्तित्व ही बदल गया। अपने फंकी लुक के बावजूद उसमें गुरुता तथा गंभीरता आ गई। उसका पूरा ध्यान खुद को बेहतर बनाने पर लग गया। अपने कौशल को निखारने में वह जुट गया। नतीजतन, राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उसने स्वर्ण पदक जीत लिया और इसके साथ ही वर्ल्ड स्किल चैम्पियनशिप में देश की तरफ से भाग लेने का अधिकार भी पा लिया।

आगामी वर्ल्ड स्किल प्रतियोगिता अक्टूबर महीने में आबू धाबी में होने जा रही है। इसके लिए करन लगातार अपने कौशल को निखारने में लगा हुआ है। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम उसे इसमें पूरा समर्थन दे रहा है। उसे प्रशिक्षण देने के लिए चीन आदि देशों के प्रशिक्षकों की मदद भी ली गई है। ब्लासम कोचर के प्रशिक्षक तो उसके साथ हर समय हैं ही। करन आत्मविश्वास से भरा हुआ है। केश विन्यास की एक विधि लांग हेयर डाउन में उसने खुद को सिद्ध कर लिया है और दूसरी विधियों में भी महारथ हासिल करने की कोशिश में जुटा हुआ है। रोज वह कम से कम दस घंटे अभ्यास करता है और बीच-बीच में अपने साथियों के साथ मुकाबला भी करता रहता है ताकि वह अपने कौशल मे ही नहीं, बल्कि Sसमय में भी लगातार सुधार कर सके। विश्व स्किल प्रतियोगिता में समय की पाबंदी खास मायने रखती है और कौशल के अलावा इसमें समय का पालन भी करना पड़ता है।

करन बखूबी जानता-समझता है कि वर्ल्ड स्किल चैम्पियनशिप सिर्फ स्पर्धा नहीं है, यह अवसर है कौशल के क्षेत्र में देश का दबदबा कायम करने का। वह यह भी जानता है कि ऐसा होने पर पूरी दुनिया में ही भारतीय कारीगरों की मांग बढ़ जाएगी और दुनिया भर के नियोक्ताओं का ध्यान भारत के कुशल कारीगरों की तरफ बरबस खिंच जाएगा। और इसीलिए आबू धाबी में वह अपने देश की शान बढ़ाने की तमन्ना रखता है।

हमें उसपर नाज़ है और हमारी शुभकामनाएं उसके साथ हैं।

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