साहित्य

हे द्रोण, धनुर्धर धन्य, किन्तु क्रीत दास तुम राजसदन के – रंजन कुमार सिंह

भारतीय संस्कृति में शिक्षा की अवधारणा न होकर विद्या की अवधारणा है। शिक्षा जहां सेवा उद्योग का विषय है, जिसे खरीदा और बेचा जा सकता है, वहीं हमारे यहां विद्या दान की परंपरा रही है, जो किसी खरीद-फरोख्त से कोसो दूर है। यह कहना था लेखक-पत्रकार-फिल्म निर्माता रंजन कुमार सिंह का।
वह राजधानी दिल्ली में अनामिका रोहिल्ला द्वारा संपादित समकालीन साहित्य में शिक्षा की अवधारणा के विमोचन समारोह में पुस्तक पर अपना वक्तव्य दे रहे थे।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्री सिंह ने याद दिलाया कि भारतीय संदर्भ में विद्या का व्यावसायिकरण महाभारत काल में ही हो गया था, जब गुरु द्रोण ने अपना गुरुकुल आम जनों के लिए बंद कर दिया और उसे राज परिसर में लेते चले गए। इससे पहले सभी के लिए गुरुकुल सुलभ थे, चाहे वह कृष्ण हों या सुदामा, पर द्रोण ने उन्हें हमेशा के लिए कर्ण और एकलव्य के लिए बंद कर दिया। उन्होंने अपनी कविता उद्धृत करते हुए कहा –
हे द्रोण, धनुर्धर धन्य, किन्तु
क्रीत दास तुम राजसदन के
श्री सिंह ने विद्या के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य जहां रोजगार सम्मत कागजी डिग्रियों से है, वहीं विद्या स्वयं अपने उत्थान के साथ-साथ जगत के कल्याण की दिशा में किया जानेवाला आत्म विमर्श है। सच तो यह है कि आज धड़ल्ले से बांटी जानेवीली डिग्रियों से रोजगार पाना भी संभव नहीं रह गया है। आवश्यक है कि इस विषय पर गहन विमर्श हो और ऐसे में इस पुस्तक का प्रकाशन स्वागत योग्य है।
पुस्तक का प्रकाशन संचय प्रकाशन ने किया है। पुस्तक विमोचन दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य-सचिव कंवलजीत अरोड़ा के हाथो हुआ, जिन्होंने विमोचन के बाद समानांतर संगोष्ठी में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम पर भी प्रकाश डाला। समारोह का आयोजन भागीदारी जन संहयोग समिति ने दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के साथ मिलकर किया था। इस अवसर पर प्राधिकरण के विशेष सचिव गौतम मनन, भागीदारी के महासचिव विजय गौड़, उपाध्यक्ष भारत भूषण सहित अनेक बुद्धिजीवी उपस्थित थे।

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