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सांत्वना और सहानुभूति से हटकर सफलता पर नजर

सांत्वना और सहानुभूति जादू की वह छड़ी है जो असफलता के क्षणों में किसी को बल दे सकती है। लेकिन सौ में से सौ अंक पाने को ही सफलता मान लेना हमारी भारी भूल है। 99 अंक पानेवाले को सांत्वना नहीं दी जाती, बल्कि बधाई दी जाती है। और यहीं हमसे चूक हो गई। सांत्वना और सहानुभूति से हटकर चन्द्रयान -2 अभियान पर नजर डालता भीष्म भैरव का विशेष आलेख – संपादक

भीष्म भैरव

जाने क्यों किसी ने समझ लिया कि हमारा मिशन मून फेल हो गया। जाने क्यों किसी ने कह दिया कि हमारा चन्द्रयान अभियान असफल हो गया। कुछ लोग सिर्फ इतना ही जानते हैं कि ‘2 + 2 = 4’ होता है। वे सोच ही नहीं पाते कि ‘3 + 1 = 4’ भी होता है और ‘1 + 3 = 4’ भी होता है।

कुछ लोग वर्षों से मेहनत करते रहे थे देश को अन्तरिक्ष शक्ति बनाने की खातिर। जबकि कुछ अपनी नींद तोड़कर रात भर बैठे रहे थे तमाशा देखने और दिखाने को। कुछ की डायरी में नोट था कि विक्रम शान से उतरेगा चन्द्रमा की सतह पर, तभी उन्हें भारत माता की जय का घोष करना है। कुछ को बता रखा गया था कि विक्रम में से प्रज्ञान निकलेगा और चांद की सतह पर ‘इसरो’ लिख देगा, तभी उन्हें ताली बजानी है। उनकी उनीन्दी आँखें उस क्षण का इंतजार करती रह गईं लेकिन ऐसा कुछ दिखा नहीं। ऐसे में ताली कब बजाएं, यह न पटकथा लेखक ने बताया था और ना ही निर्देशक ने।

देश का अन्तरिक्ष कार्यक्रम 26 जनवरी का परेड नहीं है कि भव्य दर्शक दीर्घा में बैठकर उसे देखा जाए। किसी विशिष्ट अतिथि के आने से कितनी उलझनें पैदा हो सकती हैं, यह सोचा जा सकता है। उनकी गाड़ियों का काफिला सड़क पर आम आवाजाही किस तरह बाधित कर देता है, यह हमने देखा है। समारोह में उनकी उपस्थिति की वजह से अन्य अतिथियों को सुरक्षा के कितने दरवाजों से गुजरना पड़ता है, यह भी हमने देखा है। शादी-ब्याह में उनके पधारने पर बाराती तक किस कदर उपेक्षित हो जाते हैं, यह भी हम जानते हैं। इसरो मुख्यालय में ही बैठकर इसे देखने की राष्ट्र के अगुआ की लालसा इस अभियान के नायकों पर दबाव बनाए बिना क्या पूरी हो सकती थी?

जाने कितना दबाव रहा होगा हमारे महान विज्ञानियों पर कि कैमरे के सामने वे अपने आँसूं रोक नहीं पाए। कैमरा तो शायद उसे पकड़ने से रह भी जाता, लेकिन देश भर के सामने महामानव दिखने का यह अवसर भला कैसे छोड़ा जा सकता था! सो विश्व ने के0 सिवन का  गर्व से भरा चेहरा देखने की बजाय देश के शीर्ष विज्ञानी को प्रधानमंत्री की बाँहों में बिफरते देखा। भारतीय मीडिया को भी चाँद की सतह पर प्रज्ञान का लिखा दिखाने का मौका न मिला तो क्या हुआ, बेहतरीन फोटो उतारने की उसकी साध तो तब भी पूरी हुई।

क्या यह समझ लेना हमारी भूल नहीं कि के0 सिवन मिशन की असफलता के कारण भावुक हो उठे? सिवन खूब अच्छी तरह जानते हैं और बाद में स्वयं को संभालकर उन्होंने कहा भी कि जिस काम के लिए चन्द्रयान भेजा गया, वह पूरा हुआ है। फिर भी अगर वह फफक पड़े तो संभवतः यह असर सांत्वना के सार्वजनिकीकरण का था। जिन्हें बधाई मिलनी चाहिए थी, उन्हें सांत्वना मिले को क्या वह क्या करे? क्या करे वह जिसे उसके बाद यह भान भी कराया जाए कि देखो, तुम्हारी नाकामयाबी में भी हम तुम्हारे साथ हैं। सौ में सौ अंक पाकर दिखाने का दबाव हो तो 99 फीसदी अंक लेकर भी उम्मीदवार खुद को नाकामयाब मान बैठता है। हो सकता है कि विक्रम चन्द्रमा की सतह पर बखूबी उतर गया हो, न भी उतरा हो तो इससे कोई कमी नहीं रह जाती। हो सकता है प्रज्ञान चाँद की सतह पर चक्कर लगा रहा है, न भी लगा रहा हो तो क्या? हमारे महान विज्ञानी बधाई के पात्र हैं इसलिए नहीं कि उन्होंने बड़ा प्रयास किया, बल्कि इसलिए कि उनका यह अभियान सफल रहा।

हां, उनके लिए अवश्य ही यह असफलता है जो सर्कस के बाघ को अपने रिंग मास्टर के सामने दो टांगों पर चलता देखने पहुंचे थे। इस करतब पर टोपी उतारकर सिर झुकाते हुए दर्शकों का दिल जीतने की लालसा रखनेवाले रिंग मास्टर के लिए भी यह असफलता हो सकती है। पर उस बाघ के वास्तविक प्रशिक्षक के लिए यह क्या कम बड़ी उपलब्धि होगी कि उसका सिखाया बाघ दो टांगो पर खड़ा होकर अपनी बेचारगी दिखाने की बजाय चार टांगों पर शान से झूमता हुआ दर्शकों के सामने से निकल गया।

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