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कोरोना – दो दुनी चालिस

कोरोना के विषाणु जिस तेजी से दुनिया भर में पसर गए हैं, उसे देखकर सिर्फ दांतों तले उंगली ही दबाई जा सकती है। यह विषाणु पहले-पहल तो पकड़ में आया था चीन के वुहान में, पर देखते ही देखते मरनेवालों की संख्या चीन से अधिक इटली एवं स्पेन में हो गई और फिर संक्रमित लोगों की संख्या में अमेरिका इन दोनों यूरोपीय देशों से भी आगे बढ़ गया। ऐसा लगता है मानो दुनियो के सभी देशों में एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ लगी हुई है। अब तक दुनिया में सबसे अधिक 9.134 लोग इटली में मरे हैं, जबकि सबसे ज्यादा संक्रमित 1,04,205 लोग अमेरिका में हैं। स्पेन में भले ही चीन से कम लोग संक्रमित हुए हो, पर वहां मृतकों की संख्या उससे कहीं अधिक है। महामारी की आग मे पूरी दुनिया को झोंकनेवाला  चीन संक्रमण तथा मौत दोनों ही मामलों में तीसरे स्थान पर है। जैसा कि समझा जा सकता है, ये सारे आँकड़ें आलेख के लिखे जाते वक्त के हैं और आपके पढ़ते-पढ़ते इसमें फिर से उलट-फेर हो सकता है क्योंकि आँकड़ों की रफ्तार दिन दूनी रात चौगुनी है।

दुनिया जब 31 दिसंबर 2019 की शाम में नए साल का स्वागत करने के लिए अधीर थी, ठीक उसी समय चीन के हुबई प्रांत के वुहान नामक शहर में अनाम विषाणु का पता चला था। यहां के एक मछली बाजार में लगभग 40 लोगों को साँस की बीमारी से ग्रस्त पाया गया और फिर नए साल के पहले दिन ही इस बाजार को बंद करा देना पड़ा। इससे पहले 2002 में चीन में ही सीवियर अक्यूट रेस्पीरेटरी सिंड्रम (एसएआरएस) का मामला सामने आया था और वह एक साल के भीतर दुनिया भर में 770 लोगों की जान लेकर अलविदा  हो चुका था। वर्तमान बीमारी के लक्षणों को देखकर चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को इसकी जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि यह एसएआरएस का प्रादुर्भाव नहीं है। इस जानकारी के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे नया नाम दिया – 2019nCoV पर माना कि यह उसी कोरोना वंश का विषाणु है, जिस वंश का एसएआरएस था। इस तरह 7 जनवरी 2020 को इस महामारी का नामकरण हो चुका था।

इसके चार दिन बाद ही चीन ने दुनिया को बताया कि वुहान के मछली बाजार से खरीददारी करने वाले एक 61 वर्षीय वृद्ध की मौत हो गई है। वास्तव में उसकी मौत हृदयगति रुक जान की वजह से दो दिन पहले 9 जनवरी को ही हो चुकी थी। चीन के बाहर इस बीमारी के पहले लक्षण 13 जनवरी 2020 को थाईलैंड में प्रकट हुए और उसके तुरंत बाद ही जापान में भी ऐसा मामला सामने आया। इन दोनों ही मामलों में पाया गया कि संक्रमित व्यक्ति वुहान से आए थे। 17 जनवरी को वुहान में दूसरी मौत हो गई, पर कुछ ही दोनों में इससे संक्रमित लोग सुदूर अमेरिका के अलावा नेपाल, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, मलयेशिया, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, वियतनाम तथा ताइवान में भी सामने आ गए। 20 जनवरी को चीन द्वारा वुहान में तीसरी मौत के ऐलान के साथ ही अमेरिका तथा एशिया के अनेक देशों ने चीन से आने-जाने वाले लोगों की जाँच-पड़ताल हवाईअड्डे पर करनी शुरु कर दी।

मौत का यह सिलसिला थमा नहीं और 22 जनवरी तक पाँच सौ से अधिक लोग इस बीमारी के घेरे में आ गए, जसमें से 17 लोग गहरी नींद सो गए। इसके साथ ही वुहान सहित हुबई प्रांत के दो अन्य शहरों चियानताओ तथा चीबी में रेल तथा हवाई जहाज की आवाजाही रोक दी गई। इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन यही कहता रहा कि इसे लेकर विश्व में इमरजेंसी जैसे हालात नहीं हुए हैं क्योंकि चीन के बाहर इसके फैलने का कोई ठोस सबूत नहीं है। उसका यह आकलन कितना गलत था, खुद उसे ही यह जल्दी ही समझ आ गया और 30 जनवरी को उसे कोरोनावाइरस को वैश्विक इमरजेंसी घोषित कर देना पड़ा, पर इस समय तक चीन में मृतकों की संख्या सैकड़ा पार कर गई थी। ठीक इसी समय भारत तथा फीलीपींस में एक-एक मामला सामने आया।

1 फरवरी तक चीन में 11,791 लोग संक्रमित हो चुके थे और 259 को मौत ने अपने आगोश में ले लिया था। 2 फरवरी को फीसीपींस में एक व्यक्ति इस बीमारी का शिकार हुआ। चीन के बाहर इस बीमारी से मरनेवाला वह पहला व्यक्ति था, पर था चीनी ही। अगले ही दिन चीन में इस बीमारी से 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जबकि 5 फरवरी तक दुनिया में इसे मरनेवालों की गिनती 492 तक पहुंच गई, जिसमें फीसीपींस के अलावा अब हांगकांग का भी एक मृतक शामिल हो गया। इस दरम्यान यूरोप में संक्रमितों की संख्या 30 पर ही रुकी हुई थी। 7 फरवरी दुर्भाग्य बनकर हमारे सामने आया क्योंकि इसी दिन उस डाक्टर का भी निधन हो गया, जिसने दुनिया को इस महामारी की जानकारी देने की कोशिश की थी। 8 फरवरी को वुहान में एक-एक अमेरिकी तथा जापानी नागरिक की मौत हुई, जबकि चीन में मरनेवाली की संख्या 722 तथा संक्रमितो की संख्या 34,546 तक जा पहुंची।

एसएआरएस से 2012-13 में जितने लोग मरे थे, उससे कहीं ज्यादा लोग मात्र 40 दिनों में इस नई बीमारी से मारे गए। तब कहीं जाकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपना विशेषज्ञ-दल चीन भेजा। इधर 11 फरवरी को चीन में मौतो की संख्या हजार से ऊपर पहुंची, उधर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस विषाणु को नया नाम दिया – COVID 19, जिसमें कोरोना का CO, वाइरस का VI तथा जिस साल यह विषाणु पाया गया, उसका (20)19 लगा हुआ था। इस बीच 10 फरवरी को चीन में एक ही दिन में सबसे अधिक 97 मौते दर्ज की गईं। अब तक चीन में संक्रमितों की संख्या 42,638 हो चुकी थी। इसी समय जापान के समुद्री तट पर डायमंड प्रिंसेस नामक यात्री जहाज ने बेड़ा डाल रखा था। जब उसके यात्रियों की जांच की गई तो उनमें से 176 संक्रमित पाए गए।

14 फरवरी को जब विश्व वेलंटाइन दिवस मना रहा था, मिस्र में पहले संक्रमित व्यक्ति के पाए जाने के साथ ही अफ्रीका महाद्वीप में भी गिनती चालू हो गई। इसी दिन फ्रांस में एक व्यक्ति के निधन के साथ यूरोप में मौत का सिलसिला चालू हो गया। इस बीच चीन में रोज दो हजार से अधिक लोग संक्रमण के शिकार तथा सौ से अधिक लोग मौत के शिकार होते रहे। उसे थोड़ी निजात 18 फरवरी को मिली, जब वहां एक दिन में दो हजार से कम लोग संक्रमित हुए। इधर चीन में स्थिति सुधरने लगी तो उधर दक्षिण कोरिया तथा ईरान में यह भयावहता की तरफ बढ़ती रही। 22 फरवरी को जहां दक्षिण कोरिया में 229 नए मामले सामने आए, वहीं ईरान ने अपने यहां पाँचवीं मौत की जानकारी दी। इसी दिन इटली में पहली दो मौतें हुई, जबकि चीन में संक्रमण के मात्र 397 नए मामले ही सामने आए।

इसके बाद कहानी ने नया मोड़ लिया। 3 मार्च तक इटली और ईरान दोनों में ही मरनेवालों की गिनती 77-77 पर पहुंच चुकी थी, जबकि कोरोना का कहर 90 देशों में फैल चुका था। 7 मार्च को जहां चीन इस बात की खुशी मना रहा था कि एक दिन में उसके सामने संक्रमण के सौ से भी कम नए मामले आए, वहीं ईरान अपने यहां अब तक 124 लोगों के मरने का मातम मना रहा था। उसका एक सांसद भी दम तोड़ चुका था। कोरोना के खतरों को देखते हुए ईरान को अपने जेलों में रखे 70 हजार बंदियों को रिहा कर देना पड़ा। 10 मार्च ईरान और इटली दोनों पर कहर बनकर टूटा, जबकि ईरान में एक ही दिन में 54 तथा इटली में उन्ही चौबीस घंटों में 168 लोग कोरोना की बलि चढ़ गए। कोरोना संकट को शुरु हुए जब सात सप्ताह बीत चुके, तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित किया। तब तक पूरी दुनिया में सवा लाख के अधिक लोग संक्रमित हो चुके थे, जिसमें 4500 से अधिक गहरी नींद में सो चुके थे।

15 मार्च को स्पेन में एक ही दिन दो हजार नए मामले सामने आ गए। 24 घंटों में मरनेवालों की संख्या भी वहां सैकड़ा पार कर गई। कुछ ही दिन पहले तक जो हालात चीन में थे, वे अब स्पेन आदि देशों में दिखाई देने लगे थे। इस बीच दूसरे देश इनसे सबक लेकर अपने यहां पाबंदियां लागू करते रहे। रूस, कजाकिस्तान, फीसीपींस, हांगकांग, सउदी अरब, रिजाद, आस्ट्रेलिया आदि अनेक देशों ने अपने-अपने यहां आवाजाही पर रोक लगा दी और देश के भीतर भी घूमने-फिरने पर पाबंदियां लगाई जाती रहीं। अमेरिका के न्यू यार्क शहर ने अपने रेस्टूरेंट एवं बार बंद करा दिए तो इटली ने अपने लोम्बार्डी क्षेत्र को बाकी देश से अलग-थलग कर दिया और वहां के 1.6 करोड़ लोगों को घरों से निकलने पर भी रोक दिया गया। फिर भी मौतें होती रहीं और सवाल उठते रहे कि कहीं पाबंदियां लगाने में देर तो नहीं कर दी गईं।

इटली में 17 मार्च को एक ही दिन में 345 लोग मौत का शिकार हुए थे और उससे अगले ही दिन उसने 24 घंटों में 475 मौतो के साथ नया रिकार्ड बना डाला। मार्के की बात कि उसी दिन महामारी फैलने के बाद से पहली बार चीन में कोरोना से संक्रमण का एक भी नया मामला सामने नहीं आया। 19 मार्च को इटली ने चीन में मौतो का रिकार्ड भी तोड़ दिया। उस दिन तक चीन में 3,245 मौते हुई थीं, जबकि इटली में यह संख्या 3,405 तक पहुंच गई। 19 मार्च को ही स्पेन ने दोहरा शतक लगाया और वहां मृतकों की कुल संख्या 767 हो गई। 20 मार्च को इधर स्पेन ने हजार की गिनती पूरी की, और उधर विश्व में मृतकों की संख्या 10 हजार पार हो गई। एक तरफ जहां लगातार दूसरे दिन चीन में एक भी नया मामला सामने नहीं आया, वहीं जर्मनी में एक ही दिन में 2958 नए मामलों के सामने आने के साथ ही कोरोना का केन्द्रबिन्दु अब यूरोप बन गया। उधर सुदूर सिंगापुर में दो मौतें दर्ज की गईं।

इन सबको देखते हुए भारत को भी लगने लगा कि कहीं देर न हो जाए और देश में पहले 22 मार्च को एक दिन की और फिर 25 मार्च से 21 दिनों की पाबंदी लगा दी गई। इस समय तक दुनिया भर में मरनेवालों की संख्या 13,000 पार कर चुकी थी, जबकि संक्रमित लोगों की संख्या 3,11,000 का आँकड़ा पार कर रही थी। 23 मार्च को एक ओर इटली में 602 मौतो के साथ मृतकों की गिनती कुल 6,077 पहुंच गई, दूसरी ओर 24 मार्च को स्पेन में एक ही दिन में 6,600 नए मामले सामने आ गए। और तो और यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री खुद भी संक्रमण का शिकार हो चुके थे। उन्होंने 27 मार्च को इस बारे में इकबालिया बयान दिया था, जबकि उसी दिन स्पेन में एक दिन में 769 मौतें हुई और वहां मृतकों की कुल संख्या 4,858 पर जा पहुंची। आज के दिन में दुनिया का कोई भी हिस्सा इस संक्रमण से अछूता नहीं रहा है और एक-एक कर के सभी महादेशों, देशों और प्रदेशों में मौत की छाया पसरती जा रही  है।

यह राम कहानी कहने का मकसद सिर्फ एक ही है। जैसे पहाड़ी सड़कों पर लिखा मिलता है – सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी, वैसी ही यह स्थिति भी है। पूरी दुनिया ही मौत का एक ऐसा कुआँ बन गई है, जहां थोड़ी सी चूक भी बहुत बड़े हादसे को अंजाम दे सकती है। आँकड़ों के इस खेल में कुछ बातें गौर करने की हैं। जिस चीन में मौत का यह तांडव शुरु हुआ था, वहां वह अब विराम पर है। अमेरिका में भले ही कोरोना के मामले दुनिया में सबसे ज्यादा हैं, पर उससे हुई मौत के मामलों में वह अभी विश्व में पांचवे स्थान पर है। जर्मनी में भले ही 50 हजार से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं, पर वहां मरनेवालों की संख्या फिलहाल 400 से नीचे ही है। पर सबसे बड़ी बात यह कि दुनिया भर में 28 मार्च 2020 तक यदि 5,97,262 लोग संक्रमित हुए हैं, तो उनमें केवल 27.365 लोग ही मौत के शिकार हुए हैं जबकि1,33,363 लोग मौत के जबड़े से निकल भी आए हैं।

रंजन कुमार सिंह
लेखक-पत्रकार-फिल्मकार रंजन कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्स से सफर शुरु कर टीवी की दुनिया में कदम बढ़ाया। अनके टीवी कार्यक्रम का निर्माण-निर्देशन करने के साथ ही वह अब तक आठ पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से तीन हिन्दी की तथा शेष अंग्रेजी की हैं। देश-विदेश में वह भारतीय कला-संस्कृति तथा भारतीय हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान के लिए भी बुलाए जाते रहे हैं। वह अनेक शिक्षा संस्थानों तता अकादमियों से भी जुड़े रहे हैं।

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