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उनकी भी सोचिए जिनके पास है पैसा, पासबुक में नहीं

रंजन कुमार सिंह

परेशानियां तो हो रही हैं। सरकार चाहे जितना ही कह ले और सत्ता पक्ष चाहे जितना ही झुठला दे, सच तो यही है कि लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हां, कुछ इसे हंसकर सह रहे हैं तो कुछ कुढ़कर, पर सहना तो दोनों को ही पड़ रहा है। दो दिनों से लाखों-लाख लोगों के पास पैसा रहते हुए भी उनके पास सब्जी और दूध खरीदने का पैसा नहीं है। बैंकों के आगे जितनी बड़ी लाईनें लगी हैं, उतनी तो भारत-पाक क्रिकेट फाइनल का टिकट खरीदने के लिए कोलकाता में भी नहीं लगतीं। सरकार ने चार हजार रुपये तक के पुराने नोट बदलने की छूट दे रखी है, पर बैंक की लाईन में खड़े लोगों को ध्यान से देखिए तो पाएंगे कि उनमें से कइयों के हाथ में हजार-दो हजार रुपए के ही मूल्यहीन नोट हैं। यही उनकी कुल जमा-पूंजी है और उसे बचाने की चिन्ता उनके चेहरों पर साफ देखी जा सकती है।

जिनके पास डेबिट और क्रेडिट कार्ड है, वे अपने इन मूल्यहीन नोटों को बदलने के लिए थोड़ा इंतजार कर सकते हैं, पर इस देश में लाखों-लाख लोग अब भी ऐसे हैं पैसा जिनके पासबुक में नहीं होता, पास में होता है। नून और हल्दी भी उन्हें उधार पर देने के लिए कोई तैयार नहीं है। ये वे लोग हैं जो रोज कुआँ खोदते हैं तब ही पानी पीते हैं। राष्ट्भक्ति की दुहाई देकर आप उनके पेटों को गमछों से बांधकर नहीं छोड़ सकते। निर्माण कार्य लगभग रुक गया है क्योंकि मजदूरों को दिहाड़ी देने के लिए पैसे नहीं हैं। बैंको की लाईन में घंटों खड़े होकर भी आप हद से हद दस हजार ही निकाल सकते हैं। वह भी सप्ताह में दो दिन ही यानी हफ्ते में सिर्फ बीस हजार रुपए। इनसे कितनों को दिहाड़ी दी जा सकती है?

फल-सब्जी का कारोबार भी जहां का तहां रुक गया है। मंडियों का सारा कारोबार रोकड़ों पर चलता है, रोकड़े हैं नहीं। करोड़ों रुपये मूल्य की सब्जियां सड़ रही है, गल रही हैं, फेकी जा रही हैं। पहले दिन तो नुकसान आढ़तियों का हुआ, पर दूसरे दिन खेतों से सब्जियां उठाने वाले ही नहीं थे। किसान बेचारा हरी सब्जियों को अपने खेतों में ही पीली पड़ते देखने को मजबूर है। हजार के दो-एक नोट होने पर भी लोग सौ-दो सौ की दवा के लिए घिघिया रहे हैं। उन जैसों की आवाजें सरकार तो क्या ज़ी-टीवी के सुमित अवस्थी तक भी नहीं पहुंचती। कड़वी दवा के नाम पर इसे निगल जाने की सलाह देने वाले भूल जाते हैं कि कुछ दवाएं खाली पेट नहीं ली जा सकतीं। हम जिन्हें देशभक्ति की सीख दे रहे हैं, उन्हें हमने देश का मतलब भी नहीं समझाया है। वे तो अगड़ा-पिछड़ा, हिन्दू-मुसलमान, सवर्ण-दलित ही जानते-समझते हैं।

ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि कुछ लोग अपनी चोरी पकड़े जाने के डर से नोटों के बोरे आग में झोंक दे रहे हैं। इससे भला देश की अर्थव्यवस्था कैसे सुधरेगी? सच कहा जाए तो इतने कठोर फैसले के बावजूद इन चोरों की गिरेबान तक सरकार का हाथ नहीं पहुंच सका है। किसी सरकार का काम दोषियों को नुकसान पहुंचाने का है या उन्हें दंडित करने का? सरकार यह सोचकर संतुष्ट नहीं रह सकती कि उसने दोषियों का भारी नुकसान कर दिया। समाज में जब तक उन चोरों की जगह बनी हुई है, तब तक उनका कोई नुकसान नहीं होने वाला।

11 नवम्बर तक कुछ जगहों पर पाँच सौ-हजार के नोट चल रहे थे। वे अब वहां भी नहीं चलेंगे। इन दो दिनों में बैंक और एटीएम सभी को नए नोट नहीं दे पाए हैं। जिन्हें दिया भी है तो काम भर नहीं दिया है। कुछ बैंकों को तो नोट बदलने के लिए दो हजार की सीमा लगानी पड़ी थी क्योंकि उनके पास पर्याप्त मात्रा में नोट ही नहीं थे। बहुत सारे एटीएम यूं ही खुले पड़े हैं। पैसा उनमें एक नहीं है। अब शायद वे भरे जाएं। जिस गरीब ने पाई-पाई कर के लाख-दो लाख जोड़े थे कि अपनी बेटी को शादी के जोड़े दिलाएगा, वह परेशान है कि अब उसकी बेटी की शादी का क्या होगा? वह समझ ही नहीं पा रहा कि कहां जाए, किसे गुगार लगाए। सत्ता पक्ष का दावा है कि परेशान वही है जो देशद्रोही है। परेशान वही है जो आईएसआई का एजेंट है। ऐसे में भला कोई अपनी परेशानी क्यों और कैसे जाहिर करे?

एक कहानी पढ़ी थी कि किसी ने राजा को यह कहकर नंगा घुमाया कि जो कपड़े उन्हें पहनाए गए हैं, उन्हें सिर्फ नेक बंदे ही देख सकते है। नेक बनने के चक्कर में सभी राजा के कपड़ों की बड़ाई करते रहे। हर कोई यही समझता रहा कि शायद उसे छोड़कर सभी उस अदुभुत कपड़े को देख पा रहे हैं। देश फिलहाल उसी दौर से गुजर रहा है। हर कोई परेशान है। हर कोई जान रहा है कि दूसरा भी उसी तरह से परेशान है। परेशानी सभी को हो रही है। पर खुद को देशद्रोही कहलाने का खतरा लेने के लिए कोई तैयार नहीं है। कहानी में एक मासूम लड़का भी था, जिसने चिल्लाकर कहा -देखो-देखो, राजा तो नंगा है। इस कहानी में भी कोई न कोई मासूम बच्चा जरूर आएगा, जो चिल्ला कर कहेगा, आज फिर मेरे घर में दूध नहीं आया। हां, मैं परेशान हूं, बेहद परेशान।

One thought on “उनकी भी सोचिए जिनके पास है पैसा, पासबुक में नहीं”

  1. Him bharat k log v ajib hote hai aaj note pe log kayi tarah k comment likh rahe hai garibo ko a age karke apna maksad sadh rage hai sach to yah hai ji garib log k pas 500 ya 1000 k note na k barabar hote hai aur ager hai v to 4000 rupaye se jyada nhi hai Jo bank ek din me exchange kar de rahi hai magar wahi garibo ka adhikar note k jariye Jo China ka raha tha to koi garibo ki bat v nhi kar raha that kahi n kahi badlaw lane k liye mushkilo ka samna karna pasta hai so BHAI log prayas ko saphal baneye aur rahi bat kamiyo ki to nothing is perfect in the world

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