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जीएसटी नहीं आसान, समझ लीजिए

मधुरेन्द्र सिन्हा

जिस उत्साह से वित्त मंत्रालय जीएसटी (गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स) को लागू करने का प्रयास कर रहा है, उसे देखकर लगता है कि वह यह मान बैठा है कि यह उन्हें आर्थिक संकटों से मुक्त कर देगा। देश भर में एक समान टैक्स और उसके दोहरीकरण की दिशा में यह सचमुच बहुत बड़ा कदम होगा। इसने दो दशकों से भी ज्यादा समय में मसौदों से निकल कर संसद तक का सफर तय कर लिया। अब इसे अगले अप्रैल से लागू कराने की तैयारी चल रही है। इस दिशा में बड़ा प्रयास हो रहा है। एनडीए सरकार ने इसके लिए अथक प्रयास किया। हैरानी की बात तो यह रही कि जिस कांग्रेस के दिमाग की यह उपज थी उसी ने इसका मूर्खतापूर्ण विरोध किया। सरकार ने ऐलान कर दिया है कि यह अगले साल अप्रैल में लागू हो जाएगा। जीएसटी लागू करने का कुल असर क्या होगा यह विशेषज्ञ भी सही तौर पर नहीं बता पा रहे हैं। इसे लेकर सरकारी महकमों में भी भारी उहापोह है। इसलिए इस सवाल का उत्तर ढूंढ़ना जरूरी हो गया है।

इस बारे में साफ तौर से कहा जा सकता है कि सबसे बडी बात यह है कि जीएसटी किसी तरह की आर्थिक बीमारी का इलाज नहीं है और इससे किसी तरह के आर्थिक चमत्कार की उम्मीद करना मूर्खता होगी। अगर ऐसा ही होता तो जीएसटी लागू करने के बाद ग्रीस की अर्थव्यवस्था ढहती नहीं और न ही स्पेन, पुर्तगाल, आयरलैंड तथा इटली की हालत बिगड़ती। इन देशों में आर्थिक अराजकता पैदा हुई। ग्रीस को तो कई मामलों में टैक्स की दरें भी काफी घटानी पड़ीं। मलेशिया में भी जीएसटी पर काफी गहमागहमी रही और सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ी। यानी यह सुनने में जितना आकर्षक लगता है उतना दरअसल है नहीं। जीएसटी सरकार के राजस्व में कई गुना बढ़ोतरी तो कर सकता है लेकिन उस धन के सही और न्यायोचित खर्च की गारंटी नहीं दे सकता। भारत में इस बात की पूरी संभावना है कि जीएसटी से प्राप्त अरबों-खरबों रुपए का उपयोग कैसे होगा। यहां सरकारी खर्च पर कोई अंकुश नहीं है। राज्य सरकारें जीएसटी में मिले अपने हिस्से को कैसे खर्च करेंगी यह देखना होगा।

सरकारी अधिकारी भी मानते हैं कि देश में कई टैक्स कानून हैं और उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्हें लागू हुए वर्षों बीत गए फिर भी उनके बारे में कई मुद्दों पर स्पष्टता नहीं है। मसलन केन्द्रीय उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी को ही लीजिए। यह कानून तो 1944 का है लेकिन इसके कुछ प्रावधानों पर काफी विवाद छिड़ा रहा और अदालतों को भी सामने आना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के 1989 में दिए गए एक विस्तृत फैसले के बाद यह पूरी तरह से स्पष्ट हो पाया है। यानी इसे पूरी तरह से स्पष्ट होने के लिए 40 वर्ष का समय लगा। अब एनडीए सरकार ने जीएसटी की तैयारी तो कर ली है लेकिन पहले से लागू सर्विस टैक्स के कई प्रावधानों में स्पष्टता नहीं है और उन्हें लेकर संशय बना हुआ है। ऐसे में इतने बड़े और महत्वाकांक्षी बिल को पास कराने के बाद जो समस्याएं खड़ी हो जाएंगी उनका कोई आकलन करने की कोशिश नहीं की गई है। बाद में इसे जुड़े कई प्रावधान समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इस दिशा में अभी कोई काम नहीं हो पाया है।

राज्यों-केन्द्र के अधिकारियों में तालमेल कैसे होगा

एक और जो बड़ी समस्या जो दिख रही है वह है प्रशासनिक तालमेल। कौन किसे रिपोर्ट करेगा, अभी इस पर काफी खींचतान हो रही है। जीएसटी में केन्द्र और राज्यों के अधिकारियों में जबर्दस्त तालमेल की जरूरत होगी। यहां पर 28 राज्यों और केन्द्र के अधिकारियों कों मिलकर काम करना होगा। यह बहुत ही कठिन है जब केन्द्र सरकार या राज्य के ही दो विभागों के कर्मी मिलकर काम नहीं कर सकते हैं तो यह समझना कि इन दोनों के अधिकारी मिलकर काम करेंगे, बड़ी भूल होगी। यहां पर केन्द्र सरकार के आईआरएस अधिकारियों को राज्यों के राजस्व विभाग अधिकारियों से मिलकर चलना होगा। हालांकि इसकी व्यवस्था की गई है और राज्यों के अधिकारी स्टेट जीएसटी वसूलेंगे जबकि केन्द्र के सेंट्रल जीएसटी। अब सवाल है कि फिर वर्तमान सेनवैट और स्टेट सेल्स टैक्स प्रशासन से यह अलग कैसे हुआ? इसमें परेशानी तो तब होगी जब टैक्स की मात्रा में फर्क होगा। इसके अलावा अभी हमारे पास प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है। इसके लिए वित्त मंत्रालय ने कवायद शुरू कर दी है। लेकिन स्टाफ की कमी इसमें आड़े आएगी। राज्यों में तो कुछ हुआ भी नहीं है। उन्हें नए सॉफ्टवेयर से लेकर तमाम तरह के दस्तावेज रखने और देखने होंगे जो दुष्कर कार्य है। यह बात व्यापारियों पर भी लागू होती है।

टैक्स चोरी करने वालों को कैसे काबू किया जाएगा इस बारे में अभी तक कोई चिंतन नहीं है। जीएसटी काउंसिल के बनने के बाद शायद इस पर कोई विचार हो लेकिन यह एक बड़ा मुद्दा बहुत बड़ा है। टैक्स चोरी अपने आप में बहुत बड़ा मामला है। स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से टैक्स चोरी साधारण सी बात है। जीएसटी के दौर में इस पर कैसे अंकुश लगेगा यह सोचने की बात है। इसके अलावा इस पर भी विचार नहीं हुआ है कि जीएसटी लगने के बाद जिन सामानों की कीमतें घट जाएंगी उनका लाभ ग्राहक को कैसे मिलेगा। हमारे यहां व्यापारियों की पुरानी आदत है कि टैक्स बढ़ने पर तो वह तुरंत अपने यहां दाम बढ़ा देते हैं लेकिन घटने पर कोई कमी नहीं करते हैं। इससे जनता को जीएसटी का लाभ ही नहीं मिलेगा।

इसके अलावा व्यापारियों को भी दोबारा रजिस्ट्रेशन कराने तथा रिकॉर्ड रख-रखाव पर खर्च आएगा। उन्हें दो रजिस्टर रखने होंगे और दो तरह के अधिकारियों के जूझना पड़ेगा। उसके यहां दोनों तरह के अधिकारी आ सकते हैं, नोटिस दे सकते हैं और छापा भी मार सकते हैं। इस पर भी विचार की जरूरत है क्योंकि इसका भी भार अंततः आम आदमी को ही उठाना होगा। कोई भी व्यापारी अपने पल्ले से अधिकारियों को रिश्वत नहीं देता है उसका भी भार जनता को उठाना पड़ता है।

जीएसटी आर्थिक सुधारों के लिए जरूरी है। लेकिन इसमें बहुत से पेंच हैं और मुकदमेबाजी की बहुत गुंजाइश है। इसे समझना आसान नहीं है क्योंकि इसमें कई तरह के प्रशासनिक दांवपेंच हैं। यह बात उन अधिकारियों से पता चलेगी जो इस समय जीएसटी लागू कराने का प्रशिक्षण ले रहे हैं। उऩका कहना है कि अभी काफी अस्पष्टता है और इसे साफ होने में वक्त लगेगा। समय कम है और प्रक्रियाएं बहुत।

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