Priyanka and rahul
देश राजनीति

गाँधी की जगह गाँधी

रंजन कुमार सिंह

कांग्रेस की तरफ से दो खबरें लगभग एक समय में ही आई हैं। पहली यह कि प्रियंका गांधी वाड्रा आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में पार्टी की और से प्रचार कार्य नहीं करेंगी और दूसरी यह कि राहुल गांधी जल्दी ही कांग्रेस के अध्यक्ष बना दिए जाएंगे। सच कहें तो इनमें से कोई भी खबर पार्टी के निर्णय से अधिक नेहरू-गांधी परिवार का (गांधी-वाड्रा परिवार का नहीं) ही निर्णय है। वैसे भी पार्टी में चलती इस परिवार की ही है।

कांग्रेस जन हमेशा से प्रियंका को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी के पद पर देखना चाहते रहे हैं। परन्तु उन्होंने खुद को अपनी मां तथा भाई के संसदीय क्षेत्र तक ही सीमित रखा है। न तो वह कभी पार्टी में किसी पद पर रहीं, और ना ही कहीं से पार्टी की उम्मीदवार हुईं, जबकि लोग उनमें इंदिरा गांधी का चेहरा और हाव-भाव देखते रहे और उनकी लोकप्रियता अपने भाई राहुल से अधिक रही। लोगों को उनमें संभावनाएं भी अपने बड़े भाई की बनिस्पत ज्यादा दिखीं। पिछले विधान सभा चुनाव में उन्होंने अमेठी तथा रायबरेली की कमान संभाली थी और वहां की कुल दस सीटों में से सात पर अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को जिताने में सफल भी रही थीं। इस बार समझा जा रहा था कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में उन्हें पूरी तरह से उतारा जाएगा। कांग्रेस के चुनाव प्रबंधक प्रशान्त किशोर ने तो उनके ही नेतृत्व में यह चुनाव लड़ने का पैंतरा भी तैयार किया था, पर उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस का मुख्यमंत्री चेहरा होना तो दूर, वह वहां अब पार्टी का प्रचार तक नहीं कर रही हैं।

उनके स्वयं के या नेहरू-गांधी परिवार के इस निर्णय के तत्काल बाद ही कांग्रेस पार्टी की कार्य समिति ने निर्णय लिया है कि पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को उनकी मां और कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी की जगह पर पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाए। अपनी अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी वैसे भी पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी नहीं निभा पा रही है। कार्य समिति की बैठक में भी वह अपने खराब स्वास्थ के कारण उपस्थित नहीं थीं। इस तरह एक तरह से उनकी अनुपस्थिति में ही उनके स्थान पर राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बैठाना तय हुआ। पर यह निर्णय उनकी रजामंदी के बिना हुआ होगा, ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं है।

इसमें कतई संदेह नहीं कि पिछले पाँच-छह वर्षों से राहुल ही कांग्रेस का चेहरा बने रहे हैं। यहां तक कि प्रियंका की मनाही के बाद शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश में पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने के बावजूद वहां चुनाव प्रचार में राहुल को ही आगे रखा गया है। राहुल गाँधी को देश की सबसे पुरानी पार्टी की कमान थमाने का यह फैसला आशाओं के अनुरूप है तो प्रियंका गांधी वाड्रा  का उत्तर प्रदेश के चुनाव से भी बाहर रहना आशाओं पर तूषारपात। हालांकि इस निर्णय के साथ ही नेहरू-गाँधी-वाड्रा परिवार के राजनैतिक विरासत का सवाल भी सुलझ गया दीखता है।

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