देश राजनीति

घरों में घमासान

रंजन कुमार सिंह

उत्तर प्रदेश में अब जब चुनाव सिर पर है, वहां का सत्तारूढ़ यादव परिवार गृह कलह का शिकार बना हुआ है। बाप-बेटे में नहीं बन रही, चाचा-भतीजा एक-दूसरे को फूटी आँखों नहीं सुहा रहे, इसमें किसी बाहरी के षडयंत्र का ऐंगल है तो साथ ही सौतेली माँ का छौंक भी लगा हुआ है। समाजवादी पार्टी साफ तौर पर दो फाड़ों में नजर आ रही है, एक का झंडा खुद मुलायम सिंह यादव के हाथों में है तो दूसरे का परचम उनके बेटे और प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने थाम रखा है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पार्टी पर मुलायम का वर्चस्व है तो सरकार पर अखिलेश का आधिपत्य। यह भी कहा जा सकता है कि जो प्रदेश कुछ ही महीनों में चुनाव में जाने वाला है, वहां तख्ता पलट की कोशिशें नाकाम करते हुए अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को  राजनीति का एक बड़ा सबक दे दिया है।

यह भी एक विचित्र संयोग है कि देश के सबसे बड़े प्रदेश के सत्तारूढ़ परिवार में जब घमासान छिड़ा हुआ है, ठीक उसी समय देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने टाटा समूह में भी उसके संचालक परिवार के बीच कुहराम मचा था। युवा साइरस मिस्त्री को टाटा सन्स के अध्यक्ष पद से हटाकर 78 वर्षीय रतन टाटा को फिर से इसका अध्यक्ष बना दिया गया, जिन्होंने टाटा समूह में नई ऊर्जा भरने के लिए तकरीबन चार साल पहले खुद अपनी मर्जी से साइरस मिस्त्री को टाटा सन्स का अध्यक्ष पद थमाया था। हालांकि चार साल अभी पूरे भी नहीं हुए थे कि रतन टाटा को अपना यह निर्णय गलत लगने लगा और चार घंटे से भी कम चली बैठक में साइरस मिस्त्री को बाहर का रास्ता दिखाते हुए रतन टाटा को कंपनी की लगाम थमा दी गई। इस तरह देश ने एक दिन में ही तख्ता पलट की दो कोशिशें होती देखीं, एक सफल और दूसरी असफल।

यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश के सत्तारूढ़ यादव परिवार की तनातनी के पीछे तख्ता पलट की कोशिशें ही हैं। अपने गवंई संस्कारो के कारण मुलायम सिंह यादव के लिए अपने सगे भाई की कीमत पर अपने खुद के बेटे को आगे करना मुश्किल होता रहा है। शिवपाल यादव को इसी का लाभ मिलता रहा है। वह बखूबी जानते हैं कि पार्टी तथा सरकार में उनका वर्चस्व तभी बना रह सकता है, जबकि बागडोर पूरी तरह भाई मुलायम के हाथ में हो। इसीलिए वह मुलायम को मुख्यमंत्री के पद पर भी देखना चाहते हैं। दूसरी तरफ चचेरे भाई रामगोपाल यादव भी यह जानते रहे हैं कि उनकी तभी चल सकती है, जबकि शिवपाल की न चले। ऐसे में वह किसी भी तरह से मुलायम को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहते। अपने अस्तित्व एवं वर्चस्व के लिए उन्हें अखिलेश का ही आसरा है और इसलिए वह बाप-बेटे में दूरी बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि मुलायम अपने बेटे की लोकप्रियता से जलते हैं।

अभी कुछ ही दिन पहले शिवपाल यादव ने पार्टी में अमर सिंह को फिर से शामिल कराया था। वह जानते हैं कि अमर सिंह ही योजनाबद्ध रूप से तख्ता पलट को अंजाम दे सकते हैं। पार्टी में खुद को मजबूत करने के लिए वह मुख्तार अंसारी को भी समाजवादी पार्टी में लेकर आए। अखिलेश न तो अमर सिंह को चाहते थे और ना ही मुख्तार अंसारी को। पर पार्टी पर उनकी पकड़ नहीं थी, इसलिए वह इसे रोक नहीं सके। इसका बदला उन्होंने अपने चाचा शिवपाल यादव को मंत्री पद से हटाकर लिया। भाई के दुःख को हरने के लिए मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर भाई शिवपाल को यह पद थमा दिया। और प्रदेश अध्यक्ष बनते ही शिवपाल ने अखिलेश के चहेतों को हटाना शुरु कर दिया। अब हालत यह थी कि अखिलेश जहां चुन-चुनकर शिवपाल यादव के लोगों को सत्ता के गलियारे से हटा रहे थे, वहीं शिवपाल भी चुन-चुनकर अखिलेश के लोगों को पार्टी के पदों से या पार्टी से ही निकालते जा रहे थे।

दोनों में बीच-बचाव करने के लिए मुलायम ने 24 अक्तूबर को पार्टी के विधायकों तथा सांसदो की बैठक बुलाई तो शिवपाल और उनके समर्थकों को आशा थी कि मुलायम अपने बेटे अखिलेश को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन जाएंगे। लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी इस खेल के लिए पूरी तरह से तैयार होकर आए थे। उन्होंने अपने पिता मुलायम और चाचा शिवपाल की एक न चलने दी और तख्ता पलट की यह कोशिश नाकाम हो गई। हां, पार्टी पर अपना वर्चस्व दिखाते हुए मुलायम ने अपने चचेरे भाई तथा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव को पार्टी से जरूर बाहर कर दिया। अपने बड़े भाई के इस निर्णय का ऐलान शिवपाल यादव ने किया ताकि लोग समझ सकें कि पार्टी में अब भी उनकी क्या औकात है। गौरतलब है कि लगभग छह साल पहले रामगोपाल यादव ने अमर सिंह को पार्टी के बाहर का रास्ता दिखाया था और अब पार्टी में फिर से शामिल होकर अमर सिंह अपने इस राजनैतिक विरोधी को पार्टी से बाहर निकालने का कारण बन गए।

चूंकि कुर्सी की खींचतान का यह मामला लम्बे समय से चल रहा था, इसलिए अखिलेश को भी इससे निबटने का पूरा समय मिला। सरकार पर तो उन्होंने अपना आधिपत्य कायम रखा ही, प्रदेश की जनता को यह भी समझाते रहे कि बेइमानों से वह किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं और सूबे की बेहतरी के लिए वह अपने पिता और चाचा से बगावत करने में भी कोताही नहीं करेंगे। यादव कुनबे की परेशानी की बड़ी वजह अगर मुलायम सिंह के गंवई संस्कार हैं, जो उन्हें भाई और बेटे के बीच उलझाए रखते हैं तो टाटा घराने की परेशानी के पीछे साइरस मिस्त्री की नई कार्यशैली है. जो कंपनी के पुराने लोगों को रास नहीं आ रही। साइरस मिस्त्री इतने सौभाग्यशाली भी नहीं रहे, जितने कि अखिलेश। तख्ता पलट उनके लिए इतना अप्रत्याशित था कि वह खुद को बचाने के लिए कुछ भी नहीं कर सके और टाटा सन्स के बोर्ड ने यह बताते हुए उन्हें उनके पद से अलग कर दिया कि वह टाटा समूह को गलत दिशा में ले जा रहे हैं और कंपनी का भविष्य उनके हाथों में सुरक्षित नहीं। संभवतः साइरस मिस्त्री को इस बात की भनक भी नहीं थी कि उनके साथ ऐसा कुछ किया जाएगा। मिस्त्री को भी अखिलेश की तरह अपना दम-खम बढ़ाने के लिए चार साल मिले थे, पर न तो वह इस बीच कंपनी पर अपना आधिपत्य जमा सके और ना ही अखिलेश की तरह तख्ता पलट की कोशिश को नाकाम कर सके। टाटा सन्स के अध्यक्ष के तौर पर साइरस मिस्त्री की नियुक्ति जितनी अप्रत्याशित थी, पद से उनका हटना भी उतना ही अप्रत्याशित रहा।

2 thoughts on “घरों में घमासान

  1. अत्यंत वस्तुवादी विश्लेषण है रंजन जी! मैं आपकी पोस्ट्स पढ़ता रहता हूं और मुक्तकंठ से प्रशंसा करता हूं। लवस्कार!

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