अन्य देश समाज

सौम्यता और ममता की मूर्ति

सौम्यता को यदि मूर्त रूप दिया जा सकता तो वह संभवतः शीला दीक्षित जैसी दीख पड़ती। ममता को कोई और नाम देने के लिए मुझे कहा जाए तो मैं उसे शीला दीक्षित का ही नाम देना चाहूंगा। वह राजनीति के पंक में गहरे तक डूबी हुई थीं, पर उनका स्‍नेहसिक्त व्यक्तित्व उन्हें राजनीति के कलुष से अलग करता था। लगातार तीन बार दिल्ली की बागडोर को उन्होंने सिर्फ संभाले ही नहीं रखा, बल्कि इस अवधि में दिल्ली को बदल ही डाला। दिल्ली आज जैसी भी है, उनकी ही बदौलत और दिल्ली आज जो कुछ भी है, वह भी उनकी ही बदौलत।

मेरा उनसे मिलना-जुलना हमेशा नहीं होता था, पर जब भी मैं मिलता उनका भरपूर अपनापन मुझे मिलता था। वह मुझे फोटोग्राफर साहेब कह कर ही पुकारती थीं। इसका एक कारण था, उन्होंने मेरी एक नहीं, बल्कि दो-दो फोटो प्रदर्शनियों का उद्घाटन किया था। तब वह दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं और मेरी दोनों फोटो प्रदर्शनियां दिल्ली के पुरावशेषों को लेकर थीं। ऐसे में उनका उद्घाटन उनके अलावा और कौन करता भला! लेखक गोर्डन रिसले हेअर्ण ने दिल्ली को सात शहरों का बताया है। जबकि मैं हमेशा कहता रहा हूं कि हेअर्ण ने न तो उसमें इंद्रप्रस्थ को जोड़ा और ना ही नई दिल्ली को। उसकी पुस्तक में कुतुब क्षेत्र पुरानी दिल्ली है और शाहजहांनाबाद यानी आज की पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली! इन दोनों को जोड़ दें तो सात की जगह पर नौ दिल्लियां तो ऐसे ही हो जाती है और फिर एक दसवीं दिल्ली भी तो है जो स्वतंत्रता के बाद आज तक निर्मित होती रही है। इस दसवीं दिल्ली को बनाने का बहुत बडा श्रेय शीला दीक्षित जी का ही रहा है।

मेरी उनसे कोई बहुत घनिष्टता हो, ऐसा भी नहीं। पर मेरे जान-पहचान के किसी भी व्यक्ति से वह मिलतीं तो उससे अवश्य ही मेरे बारे में पूछती थीं। जो घनिष्ट है वह तो आपकी सोच में होता ही है हमेशा, पर जो उतना घनिष्ट नहीं है, वह भी आपकी सोच में उतना ही हो तो इसे क्या कहेंगे आप? यही थी शीला जी के व्यक्तित्व की विशेषता। वह कान्वेंट स्कूल की पढ़ी हुई थीं और उनके बोलने-चालने के अंदाज में वह झलकता भी था, पर वे उन लोगों में नहीं थीं जिनके दरवाजे आमजन के लिए बंद रहते हों। वह जिससे भी मिलती थीं, उतने ही प्यार से मिलती थीं। उससे भी बड़ी बात कि उस मिलने-जुलने में कोई बनावटीपन नहीं होता था। होती थी सहजता और स्‍नेहिलता।

इस संबंध में मैं अनेक उदाहरण दे सकता हूं। मेरे एक मित्र ने मुझे अपने साथ घटित एक वाक्या बताया था। वह कभी अपने परिवार के साथ दिल्ली के आईएनए कालोनी स्थित दिल्ली हाट गए थे। सामने से उन्हें शीला दीक्षित जी आती दीख पड़ी तो उनके मुंह से अनायास ही निकल गया – अरे ये तो शीला दीक्षित हैं। तब वह मुख्यमंत्री थीं और इस कारण उनका अमला भी उनके साथ था। उन सब के बीच से निकलकर वह मेरे मित्र के परिवार के सम्मुख आ गईं और मुस्कुराते हुए उनसे पूछा – कैसे हैं आप? बड़ी ही प्यारी बिटिया है आपकी। यह कहते हुए उन्होंने उस दो साल की बच्ची को अपनी गोद में ले लिया और लगीं उसे दुलराने-पुचकारने। इस बात की भी उन्हें कोई चिन्ता नहीं थी कि उनकी साड़ी की क्रीज खराब हो जाएगी। ऐसा भी कोई करता है भला और वह भी प्रदेश का मुख्यमंत्री, उसपर से किसी फोटो ऑप के बिना! पर शीलाजी ऐसी ही थीं।

एक बार मैं उनसे मिलने उनके घर जा रहा था। तब वह मुख्यमंत्री नहीं थीं। इसी बीच मेरे औरंगाबादी मित्र धीरेन्द्रजी का फोन आ गया कि दिल्ली आया हूं और आपसे मिलना है। मैंने उन्हें बताया कि मैं तो अभी शीला दीक्षित जी से मिलने जा रहा हूं और फिर उनसे पूछ लिया कि क्या आप चलना चाहेगे? उन्होंने तपाक से हां कहा और मेरे साथ हो लिए। अव्वल तो मेरा यह स्वभाव है कि जो मेरे साथ होता है उसे पूरे सम्मान के साथ अपने साथ उठाता-बैठाता हूं चाहे मैं जहां भी रहूं और दूसरे यह भी ध्यान में रहता है कि मैं जिसके यहां मिलने-जुलने जा रहा हूं वहां उन्हें बिन बुलाया सा न लगे। शीला दीक्षित जी के बारे में मैं निश्चिन्त हो सकता था कि मेरे अतिथि को भी वह उतना ही सत्कार देंगी, जितना कि मुझे। और हुआ भी ऐसा ही। उस सत्कार से अभिभूत धीरेन्द्र जी आज तक उनके मुरीद हैं। कहां गांव जिले में कांग्रेस का एक साधारण सा कार्यकर्ता और कहां तीन-तीन बार की मुख्यमंत्री, पर उन्होंने छोटे-बड़े का यह भेद कभी किसी को महसूस ही नहीं होने दिया।

एक बार मैं अपनी बिटिया रचिता के साथ उनसे मिलने चला गया। वह भी उनसे बेहद प्रभावित होकर घर लौटी। जैसे उनके लिए आम और खास जन एक जैसे थे, उसी तरह उम्र के अन्तर को भी वह अपने व्यवहार से पाट देती थीं। बिटिया आई है तो उसे बिना कुछ खिलाए-पिलाए कैसे जाने दिया जा सकता है, यह किसी भी गृहणी की स्वाभाविक चिन्ता होती है और वह उससे मुक्त नहीं थीं। बल्कि बहुतेरा तो वह अपने कर्मियों को आवाज देने की बजाय खुद ही सबों को नाश्ता परोसने लगती थीं। एक बार मैं औचक ही उनके पास पहुंच गया तो उन्होंने भीतर से ढूंढ कर मेरे लिए चाकलेट का डिब्बा निकाला और मुझे दो-दो चाकलेट खिलाने के बाद ही उनका मन माना। मेरी पत्नी रचना को उनसे मिलना-जुलना कम ही था, पर वह उनकी सिक्रेट प्रशंसिका बनकर बराबर ही रही। मेरी बहन रश्मि से उनका कामकाजी संबंध भी था। उनके मुख्यमंत्रित्व काल में रश्मि उनके महिला सशक्तिकरण का काम बखूबी संभाले हुए थी। जब भी शीलाजी उससे मिलतीं तो मेरे बारे में जरूर पूछती थीं। जब वह मुख्यमंत्री नहीं रहीं, तब भी दोनों का मिलना जहां-तहां होता रहा और मेरी चर्चा होती ही रही।

एक बार किसी कार्यक्रम में मैं उनके साथ सम्मिलित था। तब वह मुख्यमंत्री थीं। मैंने मौका पाते ही अपनी ताजा अंग्रेजी पुस्तक टू डू – व्हाट, व्हाई, हाउ उन्हें सादर भेंट की। बाद में वह रश्मि से मिली तो उन्होंने उसे बताया कि इन दिनों मैं आपके भाई की लिखी पुस्तक ही पढ़ रही हूं। उसे मैं अपने सिरहाने रखती हूं और एक ही पाठ को बार-बार पढ़ती रहती हूं। इसके बाद उन्होंने मेरी अगली पुस्तक ईशोपनिषद – कॉल फॉर इक्वलिटी एंड एक़ुइलिब्रियम का विमोचन भी किया। एक दिन यूंही मैं गाड़ी चला रहा था कि उनका फोन आ गया। मैंने उनका नाम देखा तो गाड़ी किनारे कर के रोक दी। उन्होंने हाल-चाल जानने के बाद कहा कि आपकी नई पुस्तक पर मैं चर्चा करना चाहती हूं। आपको कोई ऐतराज तो नहीं? नेकी और पूछ-पूछ। उन्होंने आगे कहा – मैं संस्कृत अकादमी की अध्यक्ष हूं। आपकी इस पुस्तक में कुछ ऐसी नई बातें हैं, जिसपर चर्चा होनी ही चाहिए। मैंने उन्हें सहर्ष अपनी सहमति दे दी। दुर्भाग्यवश तभी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जिम्मेदारी उनके कंधों पर डाल दी गई और वे कुछ समय के लिए उसमें व्यस्त हो गई। इससे पहले उन्होंने यह भी चाहा था कि मैं छठ के समय दिल्ली में अपने चित्रों की एक और प्रदर्शनी लगाऊं जो छठ से ही संबंधित हों, पर उनकी सरकार दिल्ली में नहीं रही, और यह चाहत भी पूरी नहीं हो सकी।

जब भी, जो भी जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई, उन्होंने उससे मुंह नहीं मोड़ा। दिल्ली में आप के साथ मिलकर लड़ने में कांग्रेस को एकाध सीट मिल जाने की आशा थी, पर उन्होंने एकाध सीट के मोह में पड़कर दिल्ली में कांग्रेस के भविष्य को चौपट कर देना सही नहीं समझा। वह उन लोगों में थीं जो मानते हैं कि आज कांग्रेस के दुर्दिन भले ही हों पर कांग्रेस का अपने पैरों पर खड़ा रहना देश की जरूरत है। अब भी दिल्ली बड़ी आशा भरी नजरों से उनकी तरफ देख रही थी। ऐसे में उनका चले जाना दिल्ली के लिए बड़ा झटका है।

One thought on “सौम्यता और ममता की मूर्ति

  1. आपका संस्मरणात्मक लेख पढ़ा तो स्व शीला दीक्षित जी के व्यक्तिव को बहुत गहराई से जानने का मौका मिला।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *