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टाटा समूह – आगे क्या?

मधुरेन्द्र सिन्हा

भारत के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी समूह टाटा समूह में अप्रत्याशित घटना घटी। समूह ने अपने चेयरमैन को ही निकालने का फैसला किया। यह बेहद हैरान कर देने वाली बात थी क्योंकि चेयरमैन की चुनाव प्रक्रिया लंबी थी और उसके लिए कई पेंच थे। आखिरकार साइरस मिस्त्री का चयन हुआ। साइरस दूसरे गैर टाटा थे जिनका इस सर्वोच्च पद पर चयन हुआ। जो लोग टाटा की कार्यशैली जानते हैं उन्हें पता है कि टाटा समूह में महत्वपूर्ण पदों पर खासकर चेयरमैन पद पर किसी टाटा का ही चुनाव होता है। सर नौरोजी सकलतवाला के बाद साइरस मिस्त्री के रूप में किसी गैर टाटा का आगमन इस पद पर हुआ, लेकिन सिर्फ चार साल बाद ही उन्हें अचानक ही बाहर का रास्ता दिखाकर टाटा समूह ने एक नई परंपरा को जन्म दिया। इतना ही नहीं, अब एक और नई परंपरा का आगमन होगा और वह कि कोई गैर पारसी पहली बार इस पद पर काबिज हो सकता है। चयन समिति इस बार खुले दिमाग से चिंतन कर रही है और कई सफल प्रोफेशनल इस दौड़ में दिख रहे हैं जिनमें टाटा समूह की आईटी कंपनी टीसीएस के सीईओ और चेयरमैन एन चंद्रशेखरन का नाम सबसे आगे चल रहा है। यानी टाटा समूह एक बंद मकान से बाहर निकलने को तैयार है।

एक ज़माना था जब टाटा समूह के किसी भी बड़े संस्थान या कंपनी में महत्वपूर्ण पद पर सिर्फ पारसी ही होते थे क्योंकि यह कंपनी मूल रूप से पारसियों की ही है। जमशेद जी टाटा ने इसे जन्म दिया और उनके आगे की पीढियों ने इसे रफ्तार दी। यह पारसियों की निष्ठा और उनका बिज़नेस सेंस था कि इतना बड़ा बिज़नेस साम्राज्य खड़ा हो गया। जेआरडी टाटा को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने अपनी दूरदर्शिता और मेहनत से इस समूह को दुनिया भर में प्रतिष्ठा दिलाई। इसका ही नतीजा है कि टाटा को “साल्ट से लेकर सॉफ्टवेयर” तक में जाना जाता है। इसने समय के साथ कदम बढ़ाया और तेजी से कारोबार को बड़ा किया। इसके बाद रतन टाटा ने इस समूह को नया आयाम दिया। उन्होंने टाटा समूह का एक सपना पूरा किया और एयरलाइन्स भी शुरू की। लेकिन उन्हें नैनो कार बनाने के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यह मॉडर्न टेक्नोलॉजी का शानदार नमूना है। बेशक यह कार टाटा समूह के लिए घाटे का सौदा है लेकिन इसने टाटा का परचम लहरा दिया।

लेकिन आज हालात बदल गए हैं और यह समूह एक गलत कारण से सुर्खियों में है। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने जिस झटके से साइरस को बाहर किया उससे सभी सकते में हैं। दरअसल इसके पीछे रतन टाटा का ही दिमाग है जो रिटायरमेंट के बाद चुपचाप बैठकर तमाशा देख रहे थे। टाटा समूह के दो बड़े ट्स्ट दोराबजी ट्स्ट और रतन टाटा ट्रस्ट के प्रमुख होने के कारण बहुमत शेयरों पर उनकी पक़ड़ है। यह तय है कि अब जो भी चेयरमैन बनेगा वह रतन टाटा की मेहरबानी से बनेगा।

टाटा समूह इन दिनों कई तरह के विवाद में है। जापानी कंपनी डोकोमो के साथ मामला इतना उलझ गया है कि बात दुनिया भर में फैल गई है। इससे समूह की छवि को धक्का पहुंचा है। ऐसे कई मामले हैं जो समूह को परेशान कर रहे हैं। रतन टाटा ने अपने कार्यकाल में समूह को जबर्दस्त तरक्की दिलाई और कारोबार में 40 गुना की बढ़ोतरी हुई। यह रफ्तार बेहद धीमी पड़ गई है। साइरस के कार्यकाल में बढ़ोतरी सिर्फ दो गुने की हुई। रतन टाटा का मानना है कि साइरस का चयन ही गलत था। उनमें बिज़नेस एक्युमेन नहीं है। उनका तरीका ब्यूरोक्रेटिक था।

बहरहाल अब यह देखना है कि इस विशाल समूह की नाव खेने की जिम्मेदारी किसे मिलेगी। यह देश के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि टाटा देश के सबसे बड़े रोजगार प्रदाता हैं बल्कि एक्सपोर्ट में भी बहुत आगे हैं। डिजिटल दुनिया में टीसीएस का अभी भी जलवा है और यह रास्ता ही टाटा समूह को आगे तरक्की देगा। रक्षा क्षेत्र में उसे काफी भागीदारी मिलेगी और अगर उसके कदम ठीक पड़ेंगे तो फिर से उसकी चमक बरकरार हो जाएगी।

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