Donald Trump
राजनीति विदेश

और हिलरी हार गई

रंजन कुमार सिंह

आखिरकार ट्रम्प जीत गए और हिलरी हार गईं। इससे एक बात तो तय हो ही गई कि अमेरिका ने तमाम जद्दोजहद के बाद महिलाओं को मतदान का अधिकार भले ही दे दिया हो, पर किसी महिला को देश के सर्वोच्च पद पर देखने के लिए वह अब भी तैयार नहीं है।

डोलाल्ड ट्रम्प की जीत ने अमेरिका को 2009 के बाद कोई रिपब्लिकन राष्ट्रपति दिया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा लगातार दो बार से अमेरिका के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतते रहे थे। सबसे बड़ी बात है कि ट्र्म्प पहले व्यक्ति हैं जो राष्ट्रपति चुने जाने से पहले किसी राजनैतिक, सरकारी या सैन्य पद पर नहीं रहे। उनसे पहले वहां जो भी राष्ट्रपति चुने गए, वे उपराष्ट्रपति, गवर्नर, या सेक्रेटरी नहीं भी तो सिनेटर तो रहे ही थे। ओबामा खुद भी राष्टरपति चुने जाने से पहले सिनेटर रहे थे। कुछ आर्मी कामांडर भी अमेरिका का राष्ट्पति पद सुशोभित कर चुके हैं, जिनमें पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन तो हैं ही, ड्वाइट आइजनहोवर और उलिसिस ग्रांट भी हैं। डोनाल्ड ट्रम्प इनमें अकेले हैं, जो अपनी कारोबारी दुनिया से सीधे राष्ट्पति भवन तक जा पहुंचे हैं। अमेरिका के लगभग 250 साल के इतिहास में यह बेमिसाल है।

कुल मिलाकर ट्रम्प कारोबारी ही कहे जा सकते हैं। जमीन-जायदाद का व्यवसाय उन्होंने अपने पिता से लिया, और उन्होंने अपने पिता से। कहा जा सकता है कि अब से पहले तक डोनाल्ड ट्रम्प अपने पुश्तैनी कारोबार को ही आगे बढ़ाने में लगे रहे। यहां तक कि रिपब्लिकन पार्टी से भी उनका जुड़ाव कोई बहुत पुराना नहीं है। सन 2000 में वह रिफार्म पार्टी के उम्मीदर के तौर पर चुनाव लड़ना चाहते थे, पर ऐन मतदान से पहले उन्होंने अपना नाम चुनाव मैदान से खींच लिया था। इसके बाद भले ही राष्ट्रपति बनने की इच्छा को वह नकारते रहे थे, पर अब यह साफ है रिपब्लिकन पार्टी में शामिल होना उनकी इसी योजना का हिस्सा था। रिपब्लिकन पार्टी में एक हद तक नया होने के बावजूद उन्हें वहां उम्मीदवार होने के लिए इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ी, जितना कि हिलरी क्लिंटन को अपनी पार्टी का उम्मीदवार होने के लिए झेलना पड़ा।

देखा जाए तो रिपब्लिकन पार्टी पूरी तरह से डोनाल्ड ट्रम्प के साथ थी, जबकि हिलरी क्लिंटन को समर्थन के सवाल पर उनकी पार्टी में ही द्वंद्व था। हिलरी, सिनेटर बर्नी सैंडर्स को किनारे लगाकर डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार बनी थीं, जोकि हिलरी के मुकाबले बेहतर माने जाते थे। इस ऊहापोह का खामियाजा डेमोक्रेटिक पार्टी को भुगतना पड़ा। आम अमेरिकियों की राय में भी सैंडर्स अच्छे राष्ट्रपति सिद्ध हो सकते थे, जबकि हिलरी को वे अविश्वनीय पाते थे। हिलरी क्लिंटन ने जिस तरह पोपुलर वोट गंवाए, उससे तो यही लगता है कि उनकी जगह सैंडर्स होते तो उन्हें कही अधिक जन समर्थन मिल सकता था। पार्टी के भीतर थोड़ी सी बढ़त की वजह से उम्मीदवार बन बैठीं हिलरी ने जनमत या पोपुलर वोट में पार्टी का अधिक नुकसान कर दिया। फ्लोरिडा, ओहायो, पेनसेल्वेनिया जैसे तटस्थ राज्यों (स्विंग स्टेट्स) ने ट्रम्प के पक्ष में वोट किया, जबकि ओबामा इन राज्यों में बहुमत बना पाने में कामयाब रहे थे।

वैसे दोनो प्रतिद्वंद्वियों के बीच पोपुलर वोटो का अंतर बहुत ही महीन रहा। ट्रम्प को जहां पोपुलर वोट का 47.7 फीसदी मिला, वहीं हिलरी को 47.5 फीसदी। यदि एलेक्टोरल वोट में वह ट्रम्प का पुरजोर मुकाबला कर पाती, तो उन्हें पछाड़ भी सकती थीं। पर हिलरी को जहां मात्र 228 एलेक्टोरल वोट ही मिले, वहीं ट्रम्प 290 एलेक्टोरल वोट लेकर मैदान मार ले गए। गौरतलब है कि ओबामा दोनों ही बार 50 फीसदी से अधिक पोपुलर वोट लेकर जीते थे। साथ ही एलेक्टोरल वोट पर भी उनकी पकड़ बेहद मजबूत रही थी। हिलरी क्लिंटन वह करिश्मा दुहरा पाने में असफल रहीं। ट्रम्प के मुकाबले चुनाव में अधिक खर्च करने के बावजूद उन्हें मुंह की खानी पड़ी। वैसे अमेरिका की 54 फीसदी महिलाओं ने उनके पक्ष में वोट डाले, पर उसमें भी श्वेत महिलाओं के वोट के मामले में वह पीछे रह गई। दरअसल, ट्रम्प श्वेतों तथा अश्वेतो के बीच ध्रुवीकरण बनाने में पूरी तरह कामयाब हुए। 63 फीसदी श्वेत पुरुषों तथा 52 फीसदी श्वेत महिलाओं ने उनके पक्ष में वोट डाले। इसी तरह ट्रम्प मुस्लिमों तथा गैर-मुस्लिमों के बीच ध्रुवीकरण में भी सफल रहे। इसी का नतीजा था कि अमेरिका के हिन्दुओं ने जमकर उनका साथ दिया।

डोनाल्ड ट्रम्प की इस जीत ने एक और संकेत किया है। राजनीति में कामयाब होने के लिए राजनीति का धुरंधर खिलाड़ी होना जरूरी नहीं है। अब तक ट्र्म्प सिर्फ और सिर्फ एक सफल कारोबारी रहे थे और जब वह अपना सीना ठोंक कर राजनीति के अखाड़े में उतरे तो यहां भी उन्होंने अपना झंडा गाड़ दिया। डोनाल्ड च्रम्प की यह सफलता दूसरे पूंजीपतियों के लिए प्रेरणा बन सकती है।

One thought on “और हिलरी हार गई

अपनी बात यहां लिखें