संस्कृति

दशावतार : मानवता के विकास की कहानी

रंजन कुमार सिंह

धर्मं का निरूपण शास्त्र द्वारा होता है। शास्त्र वस्तुतः दर्शन हैं, जो किसी भी धर्म को परिभाषित करते हैं। परन्तु, अपने स्वरुप की विशिष्टता के कारण वे कठिन होते हैं। कठिन धार्मिक सिद्धांतों को आम जन के लिए सरल बनाने के लिए आख्यानकों का सहारा लिया जाता है। यानी कथा-कहानियों के माध्यम से कठिन दर्शन और सिद्धांतों को आम जन तक पहुचाने की कोशिश की जाती है। ये कोशिशें लगभग सभी धर्मों में हुई हैं। हमारे पुराणों तथा उपनिषदों में तो यह भरी पड़ी है। इसमें कहीं आशंका नहीं कि आख्यानों या कथा-कहानियों की रचना कठिन धार्मिक सिद्धांतों को आसान बनाकर लोगो को पेश करने के लिए ही की जाती है, पर समय के साथ उनके मूल अर्थ पर धूल की परतें जमती चली गयीं और वे सिर्फ और सिर्फ कहानियाँ रह गई। यहाँ तक कि अंग्रेजों आदि ने हमारे ज्ञान को ही थोथा करार दिया। यहाँ तक कहा गया कि भारतियों का इतिहास ज्ञान ऐसा है कि उसमे २०-२० फीट के राजा होते हैं, तो उनका भूगोलशास्त्र ऐसा है कि उसमे दूध-दही की ही नदियाँ बहती है। इन आख्यानों के पीछे के तत्व से अनभिज्ञ हमारी पीदियाँ ऐसे आरोपों का उत्तर देने में खुद को असमर्थ पाती रही।

Vishnu
विष्णु और उनके अवतार

शास्त्र को सरल और बोधगम्य बनाने के लिए रचे गए आख्यान किस कदर अपना अर्थ खोते गए इसका सिर्फ एक उदाहरण मैं यहाँ पेश करना चाहता हूँ। दशावतार के बारे में हम सभी जानते हैं। विष्णु के दस अवतार। विष्णु को हम पूजते हैं, पर क्या हम वाकई उस सच को जानते-समझते हैं, जो यह कथा हमसे कहना चाहती है? चार्ल्स डार्विन नामक वैज्ञानिक ने मानव के विकास का सिद्धांत दिया और विज्ञानं के क्षेत्र में एक क्रांति का सूत्रपात्र हों गया। दशावतार की हमारी कल्पना उससे भी आगे की है, उससे भी बड़ी – मानवीयता के विकास की, पर हम उसे जानते ही नहीं, जानना चाहते ही नहीं। डार्विन के अनुसार aquarian यानी जलचर पहले जीव थे, दशावतार की रचना करनेवाले हमारे ऋषि-मनीषियों ने भी तो मत्स्य अवतार की बात कर उसी सत्य को निरुपित किया था। डार्विन ने आगे बताया amphibian यानीकि जल और थल पर समान तौर पर विचरने वाले जीव उसके बाद हुए। हमारे मनीषियों ने कच्छप अवतार बताकर उसी सत्य को तो डार्विन से सैकड़ों नहीं, हजारों साल पहले हमें बताना चाहा था। यदि हम अवतार कथा में खोकर उस तथ्य से मुँह मोड़ते रहे हैं तो गलती किसकी है?

डार्विन ने इसके बाद पक्षियों को माना, पर हमने नहीं। तीसरे अवतार के तौर पर वाराह की बात कहकर हमारे ऋषियों ने भूविज्ञान के उस सिद्धांत का निरूपण किया जिसके अनुसार आरम्भ में जल ही जल था। तब सिर्फ जलचर ही थे। फिर कुछ थल हुआ और जल-थलचर आये। इसी बीच पृथ्वी के हिलोडों ने समुद्र तल को ऊपर कर दिया। हमारा तीसरा अवतार वाराह यही तो करता है। अपने नुकीले दांत से वह पाताल से भूमि उठा लाता है। विष्णु के चौथे अवतार नृसिंह और डार्विन के बन्दर से आदमी बनने के सिद्धांत में फिर समानता देखी जा सकती है। पूर्ण मनुष्य बनने से पहले जीव आधा पशु-आधा मानव रहा होगा। डार्विन का बन्दर और हमारे ऋषियों का नृसिंह उसी एक तथ्य के अलग-अलग रूप है।

यहाँ तक तो ठीक, लेकिन इसके बाद? डार्विन महाशय को तो मात्र मानव के विकास की बात कहनी थी, सो उन्होंने कह दी, पर हमारे मनीषियों का चिंतन उससे आगे मानवीयता के विकास की बात कहने वाला है, इसलिए कुछ और अवतार सामने आये। पांचवां अवतार वामन हुआ। नृविज्ञानी भी मानते हैं कि मानव की नस्ल शुरू हुई बौनों से, जो संभवतः पूर्वी अफ्रीका में थे। बौने यानी pigmy। हमारा वामन यही pigmy तो है। उसके तीन डग की कथा में हमारा धार्मिक मन ऐसा उलझा कि नृविज्ञान का यह तथ्य ही कहीं खो गया। और फिर हुए परशुराम – विष्णु का छठा अवतार। परशुराम को लेकर हमारी भ्रान्ति सबसे बड़ी है। उस अवतार को समझने में हमारी पीढ़ियों ने शायद सबसे अधिक भूल की है। किस्सा-कहानी के अनुसार परशुराम ने एक नहीं, अनेक बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर दिया। सत्य के लिए उन्होंने अपनी माँ तक को नहीं बक्शा। फिर हम यह भूल जाते हैं कि परशुराम की कल्पना कर हमारे ऋषि समाज विज्ञानं के उस युग की बात कर रहे थे, जब राज्य या साम्राज्य की अवधारणा ही नहीं आई थी। न तब अयोध्या था, और ना ही लंका। कबीले थे जो अपने उबड़-खाबड़ अस्त्र-शस्त्रों से एक-दूसरे पर वार करते रहते थे। जो जिसे जहां तक धकेल कर भूमि पर अपना कब्ज़ा जमा ले, वहाँ तक उसका शासन मान लिया जाता था। मानव जाति पाषण युग को पार कर संभवतः लौह युग में कदम बढ़ा रही थी और ऐसे में जिन हाथों में परशु था, वह परम शक्तिशाली थे। बाजुओं के जोर पर शासन की नीव थी। या यूँ कहे कि जिसकी लाठी, उसकी भैस।

परन्तु, मानव जाति पशु से भिन्न थी, इसलिए उसे मर्यादाओं की आवश्यकता महसूस हुई। रेखाएं खींची जाने लगी। सीमायें निर्धारित हुईं। अयोध्या और लंका आदि राज्य कायम हुए। उनके अपने-अपने राजा थे। कायदा कहता था कि तुम अपने शासन क्षेत्र को देखो, और हमें अपना क्षेत्र देखने दो। पर तब भी ऐसे लोग थे बाली की तरह जो किसी और का राज्य हड़पने को अधीर थे, तब भी कुछ ऐसे लोग थे रावण की तरह, जो किसी और की पत्नी को पाने की लालसा रखते थे। कबीला युग समाप्त हों चुका था। जिसकी लाठी, उसकी भैस का युग अब नहीं रहा था, पर आदमी की वृत्ति पूरी तरह बदली नहीं थी, और सच तो यह है कि वह आज तक नहीं बदली है पूरी तरह। पर मर्यादाएं सुनिश्चित हों चुकी थी। इस काल को हमारे ऋषियों ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के माध्यम से निरुपित किया। राम ने बाली और रावण को मारकर मर्यादा तो कायम की ही, मर्यादा इतनी कठोर थी कि वे अपनी पत्नी तक को नहीं बचा सके। विधि और व्यवस्था को बचाए रखने के लिए उन्हें सीता को भी परीक्षा से गुजरना पड़ा। अब की तरह नहीं कि अपनों को बचने के लिए लोग विधि व्यवस्था से हस्तक्षेप करते रहते हैं।

लेकिन मानव जाति का विकास राज्यों के स्थिर हों जाने से, मर्यादाओं के सुनिश्चित हों जाने से थम तो नहीं गया? अब मनुष्य को पिपासा थी ज्ञान की। आठवे अवतार के रूप में योगीश्वर श्री कृष्ण की परिकल्पना उसी ज्ञान युग की ओर संकेत करता है। ज्ञान की भी पिपासा के शांत हों जाने के बाद मानव को आवशकता पड़ी शांति की – बाह्य शांति ही नहीं आतंरिक शांति की भी। शांति का यह मार्ग ज्ञान से ही होकर गुजरता है। शांति पुरुष के तौर पर हमें किसी कल्पना की आवश्कता नहीं पड़ी। बुद्ध का चरित्र हमारे सामने था। हमने उन्हें विष्णु के नौवे अवतार के तौर पर अपना लिया।

विष्णु का दसवां अवतार अब भी प्रतीक्षित है। निश्चित तौर पर विष्णु के ये अवतार भू-विज्ञानं, नृविज्ञान तथा समाजशास्त्र के तथ्यों का प्रतिपादन करने वाले हैं, पर भारतीय मनीषा धर्मं से कुछ इस तरह आच्छादित है कि उससे परे वह कुछ देख ही नहीं पाती। अतः शास्त्र अपने लोकपक्ष में कथा-किम्वंदंतियों का पुलिंदा बन कर रह गए है। ज़रूरत इस बात की है कि हम उनपर पड़े जालों को साफ़ करके उनके मर्म तक पहुंचे। जब तक यह नहीं होगा, हमारे शास्त्रों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किये जाते रहेंगे।

रंजन कुमार सिंह
लेखक-पत्रकार-फिल्मकार रंजन कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्स से सफर शुरु कर टीवी की दुनिया में कदम बढ़ाया। अनके टीवी कार्यक्रम का निर्माण-निर्देशन करने के साथ ही वह अब तक आठ पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से तीन हिन्दी की तथा शेष अंग्रेजी की हैं। देश-विदेश में वह भारतीय कला-संस्कृति तथा भारतीय हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान के लिए भी बुलाए जाते रहे हैं। वह अनेक शिक्षा संस्थानों तता अकादमियों से भी जुड़े रहे हैं।

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