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प्रतापी पुरखों को समर्पित है यह विश्व हिन्दी सम्मेलन

द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुई में 28 से 30 अगस्त 1976 को हुआ था। नागपुर में हुए प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन के डेढ़ साल के भीतर ही। भारत में संपन्न प्रथम सम्मेलन की आयोजन समिति के अध्यक्ष तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री बी0डी0 जत्ती थे, तो पोर्ट लुई में आयोजित द्वितीय सम्मेलन की आयोजन समिति के अध्यक्ष थे मॉरिशस के तत्कालीन प्रधानमंमत्री सर शिवसागर रामगुलाम। सर रामगुलाम प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में मुख्य अतिथि के तौर पर सम्मिलित भी रहे थे।

इस वर्ष अगस्त में होने जा रहे 11 वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन स्थल जहां स्वामी विवेकानन्द अन्तरराष्ट्रीय सभा भवन (स्वामी विवेकानन्द इंटरनेशनल कन्वेंशन सेन्टर) है, वहीं द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन हुआ था पोर्ट लुई के महात्मा गाँधी संस्थान में। महात्मा गाँधी के प्रति अपनी श्रद्धा का निवेदन करते हुए आयोजन समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं तत्कालीन प्रधानममंत्री सर शिवसागर रामगुलाम ने कहा था – जब 1901 में महात्मा गाँधी यहां आए थे तो उन्होंने प्रवासियों से शिक्षा और राजनीति में विशेष रुचि लेने का आग्रह किया था। उसी आग्रह का सुफल है कि आज हम स्वाधीन हैं और अपनी भाषा से जुड़े हुए हैं। यह सम्मेलन हमारी ओर से महात्मा गाँधी और हमारे प्रतापी पुरखों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता-ज्ञापन है।

उन्हीं प्रतापी पुरखों को याद करते हुए सम्मेलन के आयोजन मंत्री श्री खेर जगत सिंह ने कहा, उपनिवेशवाद के भयानक और दारुण दबाव एवं अवरोध के बावजूद, आर्थिक और सांस्कृतिक शोषण के रहते हुए भी हमारे पुरखों की धमनियों में प्रवाहित शौर्य मंद नहीं हुआ। बढ़ती यातनाओं के साथ-साथ धार्मिक-सांस्कृतिक आस्थाएं गहन होती गईं। मॉरिशस में द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन का मकसद हमारे लिए महान हिन्दी का ढिंढोरा पीटना नहीं है। यह हमारे सांस्कृतिक गौरव व बोध का परिचायक है। पहचान और अस्मिता की लड़ाई में हमारी अपराजेय दृढता का द्योतक है। उपनिवेशवादी शासन ने इस देश के बहुसंख्यक समाज की भाषा-संस्कृति को हमेशा हीन, वाहियात और गई-बीती सिद्ध करने तथा उन्हें अपनी विरासत से काटकर अलग कर देने का षडयंत्र किया। यह सम्मेलन इन सारे षडयंत्रों से जूझने की हमारी उद्दाम आकांक्षा और प्रबल इच्छा शक्ति का प्रतिफल है।

ये कोई थोथे शब्द नहीं थे। अपने प्रतापी पुरखों के प्रति कृतज्ञता का भाव तथा अपनी भाषा-संस्कृति के खिलाफ हो रहे षडयंत्र से जूझने की उद्दाम आकांक्षा और प्रबल इच्छा शक्ति का प्रमाण है यहां स्थापित विश्व हिन्दी सचिवालय। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में संकल्प लिया गया था मॉरिशस में विश्व हिंदी केन्द्र की स्थापना करने का, जहां से सारे विश्व की हिन्दी गतिविधियों का समन्वय हो सके। तभी यह संकल्प भी लिया गया था कि यहां से एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका का प्रकाशन हो जो भाषा के माध्यम से ऐसे समुचित वातावरण का निर्माण कर सके जिसमें मानव विश्व का नागरिक बना रहे। दोनों ही संकल्प पूरे किए जा चुके हैं। एक तरफ जहां मॉरिशस में विश्व हिन्दी सचिवालय खड़ा है, वहीं दूसरी ओर यहां से विश्व हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन भी किया जा रहा है।

मॉरिशस में तीसरी बार विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन भी उसी कृतज्ञता भाव, उद्दाम आकांक्षा और प्रबल इच्छा शक्ति का द्योतक है।

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