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भुक्तभोगी की आत्मबीती : भरोसा हो तो कोरोना क्या?

भरोसा हो तो बड़ी से बड़ी मुसीबत या मुश्किल भी आसान हो रहती है, भले ही वह मुसीबत कोरोना के कहर के तौर पर ही क्यों बरपी हो। और भरोसा टूट गया तो आदमी को टूटते देर नहीं लगती। ऐसे अनेक मित्रगण थे जो कहते थे, सकारात्मकता मत छोड़ें। पर सच कहें तो उनके कहने का आशय सिर्फ इतना ही जान पड़ता था कि सरकार की आलोचना से बाज आएं। उनकी नजरों में सरकार या प्रशासन की आलोचना भयंकर नकारात्मकता थी। पता नहीं क्यों वे यह नहीं सोच पाते थे कि जब किसी बात का भरोसा हो, तो सकारात्मकता कहां से आएगी? अव्वल तो अस्पताल में शय्या मिलने का भरोसा नहीं, वह तो तो ऑक्सीजन मिलने का भरोसा नहीं, दोनों हों तो समय पर दवा मिलने का भरोसा नहीं, यहां तक कि यह भरोसा भी नहीं जुट पा रहा था कि पैसा देने के बावजूद आपके खून की जाँच हो सकेगी। हालात जब ऐसे हों तो सकारात्मकता कहां से आए?

पर सकारात्मकता हो तो आदमी स्वस्थ कैसे हो? स्वास्थ्य की तो जरूरी शर्त है सकारात्मकता। और सकारात्मकता की जरूरी शर्त है यह भरोसा कि कोई है जो मुझे संभाले रखेगा। जाहिर है मैं ही क्यों, करोना से पीड़ित लाखों लोग सरकार या प्रशासन पर यह भरोसा नहीं जुटा पा रहे थे। अपनी उस हालत में पूरे सिस्टम का चरमराना हमें और भी जोर से सुनाई दे रहा था। हम यह देख पा रहे थे कि बीमारी से लड़ने की बजाय हमारे तमाम राजनैतिक आका एकदूसरे से लड़ने में अपनी ऊर्जा खपा रहे हैं। हम यह बखूबी समझ पा रहे थे कि बीमार की तिमारदारी से बढ़कर इन राजनीतिक पेशेवरों को खुद अपनी छवि चमकाना जरूरी लग रहा है। पर पूरा जोर लगाने पर भी यदि वे खुद अपनी छवि नहीं चमका पा रहे हैं तो सब के सब लगे हुए हैं दूसरे की छवि धूमिल और मलिन करने में।

ऐसे घोर नकारात्मक माहौल में हम बीमारों से आशा की जा रही थी कि हम सकारात्मक रहें तो सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि उन सबकी कमीज पर पड़ी दाग छिपी रह सके। बहरहाल, जहां शासन और प्रशासन फेल हो गए, वहीं समाज उठ खड़ा हुआ। परिजनों ने यह भरोसा दिलाया कि हम तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे। दोस्तों ने (और मैं उन कथित दोस्तों की बात नहीं कह रहा जो इस दौर में भी अपने राजनीतिक सरोकारों के फेर में पड़े थे) तहेदिल से शुभकामनाएं व्यक्त कीं और किसी पार्टी या व्यक्ति की छवि से ज्यादा मेरी बीमारी को लेकर चिन्तित रहे। सच कहें तो यही भरोसा मेरे काम आया। इन्ही मित्रों की शुभकामनाएं कवच बनकर साथ रहीं। भरोसा विज्ञापनों से पैदा नहीं होता और ना ही गाल बजाकर दिलाया जा सकता है। भरोसा दिलाने के लिए साफ नीयत से काम करना, या और कुछ नहीं तो प्रार्थना ही करना जरूरी होता है।

अभी कोरोना की रिपोर्ट भी नहीं आई थी कि बीमारी के लक्षणों को देखते हुए मित्र शुवाशीष नें मुझे डाक्टर गिरि से जोड़ दिया। मैं उन्हें फोन करने में संकोच ही कर रहा था कि रात 11 बजे खुद डाक्टर साहब का फोन मेरे पास गया कि निश्चिंत रहिए, हम हैं आपके साथ। मेरी हालत को देखते हुए डाक्टर ने सुझाया कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ सकता है तो बहन रश्मि ने दिन भर में सैकड़ों फोन कर के अस्पताल में शय्या उपलब्ध कराई हालांकि पत्नी रचना से लेकर बेटी रचिता तक को अस्पताल की व्यवस्था पर भरोसा न था और इसलिए मैं घर में ही रहा। भाई राजेश अलग परेशान। कोरोना का टेस्ट कराना कोई कम मशक्कत की बात नहीं थी। अस्पतालअस्पलात के चक्कर काटते रहने पर भी यही पता चलता था कि प्रति दिन जितने टेस्ट का कोटा है, वह तो खत्म। ऐसे में उसने यशोदा अस्पताल से संपर्क निकाल कर उसी दिन टेस्ट की व्यवस्था कराई। साथ में खून की जाँच की भी। कुणाल की कोशिश रही कि हमें अस्पताल जाकर इंतजार न करना पड़े, जबकि वह और उसका परिवार खुद भी कोविड से जूझ रहे थे। हालांकि अगली बार जब फिर से खून की जांच कराने की जरूरत पड़ी तो पता चला कि यशोदा अस्पताल की संरचना इतना भार वहन कर पाने में असफल सिद्ध हो रही है, इस वजह से अब यहां खून की जाँच संभव नहीं। पैसे देने पर भी नहीं, फिर पैसे किस काम के? शिवम ने तब न जाने कितने फोन खड़काकर घर से ही खून का नमूना ले जाने की व्यवस्था की।

रोगी आराम करे या भागता फिरे खून की जाँच कराने को। सीटी स्कैन का भी वही हाल। रश्मि यहां भी काम आई। उसने हिन्दू राव अस्पताल में व्यवस्था कराई सीटी स्कैन की। पर अपने घर कौशाम्बी से वहा तक जाएं तो जाएं कैसे। खुद गाड़ी चलाकर जाने की हिम्मत नहीं और टैक्सी लेकर जाने का मतलब किसी डाइवर के स्वास्थ्य से खिलवाड़। फिर शुवाशीष काम आया। उसने अपने लोगों को लगाया तो किसी पुलिस थाने की मदद से एक एम्बुलेंस हमें हिन्दूराव अस्पताल तक ले जाने के लिए तैयार हुआ। पर सिर्फ ले जाने के लिए, वहां रुककर हमें वापस घर लाने के लिए वह हर्गिज तैयार नहीं हुआ, पुलिस की दखलअंदाजी के बाद भी नहीं। ऐसे में क्या फायदा एम्बुलेंस का, जहां यह भरोसा तक हो कि आप यदि अस्पताल पहुंच गए तो वहां से घर भी सकेंगे वापस। जेब में पैसे पड़े हैं, पर सहूलियतें नदारद। और तब आपसे कहा जाए कि सकारात्मकता बनाए रखें। इससे बड़ा और भोंडा मजाक भी कोई हो सकता है क्या?

अपनेअपने राजनीतिक सरोकारों को छोड़कर हम यदि सामुदायिक सद्भाव बढ़ाने पर ध्यान दें तो बन सकती है बात। परिजन और मित्र ही सबसे पहले काम आते हैं, यह समझना जरूरी है। मैंने उनकी जयजय कभी की नहीं, पर जरूरत पड़ी तो संजीव ने कहीं से भी ऑक्सीजन का इंतजाम कराने में देरी नहीं की। महीनों से मैं वंदना राग से बतियाया भी नहीं होंउंगा, पर उन्हें पता चला तो उन्होंने हमारे लिए अपने घर से खाना बनवाकर प्रेम से भिजवाया। मेरी पत्नी की सहेली राखी को क्या पड़ी थी उसे उपहार स्वरूप कपड़े भिजवाने की? इसीलिए तो कि उसे यह लगे कि इस घड़ी में वह अकेली है और वह कुछ नयापन महसूस कर सके! जुगनू से लेकर नीतू तक को हमारे खाने से लेकर दवा तक की चिन्ता बनी हुई थी कि वह समय पर हम तक पहुँच सके। स्थानीय दुकानों का हाल यह था कि एक दवा मिलती थी तो दूसरी नहीं। जाने कहां-कहां से जपनू हमारे लिए दवाइयां जुटाती रही। शशि और प्रियांशी से जो बन पड़ा, करते रहे। कभी खाना लेकर हाजिर तो कभी ऑक्सीमीटर लेकर। मेरे सहकर्मी अरुण चंदेल जी को पता चला कि मेरी पत्नी का मधुमेह बढ़ा हुआ है और उन्हें सलाह की ज़रूरत है तो उन्होंने अपने संपर्क का इस्तेमाल कर देश के सबसे बड़े डायबेटिक डाक्टर अम्बरीश मिथल से हाथोहाथ समय दिलवाया। 

मेरे ऑफिस एनएसडीसी के सभी लोग मेरे स्वास्थ को लेकर परेशान रहे, चाहे वे मनीष कुमार जी हों, प्रकाश शर्मा जी, वेदमणि तिवारी जी, या फिर वंदना भटनागर जी। दो लोगों को इसी काम के लिए लगाया गया कि सुबहशाम वे मुझे फोनकर मेरा हाल जान लें और पता कर लें कि मुझे कोई जरूरत तो नहीं। अमित और सचिन के फोन मुझे यह भरोसा दिलाते रहे कि जरूरत पड़ी तो मेरा दफ्तर मेरे साथ खड़ा है। कोविड टास्क फोर्स बनाकर उन सबों की मदद करने की कोशिश की जाती रही, जो बीमार थे। 32 वर्ष के शोभित को बचाने के लिए सब के सब लगे थे। उसके घर के पास गाजियाबाद में कोई अस्पताल न मिल सका तो उसे फरीदाबाद के अस्पताल में जगह दिलाई गई। किस तरह समय पर उसे दवाइयां मिल सकें, इसका ध्यान रखा जाता रहा। प्लाज्मा से लेकर रेमडीसिविर तक की व्यवस्था के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया जाता रहा। सुधांशु जी से लेकर मीनाक्षी जी तक सब के सब इसी चिन्ता में रहे कि कैसे उसे बचा लिया जाए। हालांकि उसे तब भी बचाया नहीं जा सका। काश उम्र की सीमा के बिना टीकाकरण किया जाता तो हमारी तरह वह भी बच जाता। व्यवस्था फेल हो गई, पर भरोसा कायम रहा।

मेरे बगलगीर लक्ष्मीकान्त जी ने संवाद दिया कि मेरे पास ऑक्सीजन सिलिंडर है, किसी को चाहिए तो हक से ले जाए। आरडब्लूएस के राकेश स्वामी जी से लेकर ज्ञानेन्द्र चतुर्वेदी जी ने ढ़ांढस दिलाया कि जरूरत पड़ने पर वे मुझे अस्पताल तक डांग कर भी ले जाएंगे। ढेरों शुभकामना संदेश मुझे मिलते रहे फैसबुक से लेकर वाट्सऐप तक पर। सच कहें तो भरोसा इन्ही बातों से बनता है। किसी की चमचमाती हुई छवि से नहीं। मेरी तरह बहुत से लोग बच सकते थे अगर हम उन्हें भरोसा दिला पाने में कामयाब रहे होते तो। जिन्हें शासन और प्रशासन की चिन्ता अधिक थी वे हमें बताने में लगे थे कि हर किसी को ऑक्सीजन की जरूरत नहीं पड़ती, ना ही हर किसी को रेमडीसिविर चाहिए होता है। इसलिए उनकी चिन्ता में खुद को मत घोलिए। उनकी बात जायज थी। फिर भी ऑक्सीजन की जरूरत पड़े, यह बड़ी अच्छी बात, पर अगर पड़ ही जाए तो वह मिलेगा या नहीं, यह चिन्ता स्वाभाविक है और इस चिन्ता से मुक्त होकर ही कोई निश्चिंत रह सकता है। पूरी की पूरी व्यवस्था यह भरोसा जगाने में असफल थी। मेरे भाईबहन मुझे इस चिन्ता से मुक्त कर पाए तो इसलिए कि उन्होंने अस्पताल से लेकर ऑक्सीजन तक की व्यवस्था में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। पचीस-पचास जगहों पर बात की तो दो-एक जगह पर बात बनी। व्यवस्था ताक-चौबंद हो तो सिर्फ एक फोन ही काफी है, पर पंगु व्यवस्था अपने पर निर्भर लोगों को भी लाचार कर देती है। मेरे मित्र मुझे यह भरोसा दिला पाए कि उनकी शुभकामनाएं मेरे लिए कवच का काम करेगी तो इसलिए कि उनकी चिन्ता किसी की छवि के बननेबिगड़ने से ज्यादा मेरे स्वास्थ्य को लेकर थी। मैं तहेदिल से शुक्रगुजार हूं आप सबका और अपने इस स्वास्थ्य लाभ में आपका यह योगदान स्वीकार करते हुए मुझे खुशी हो रही है। स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें।

रंजन कुमार सिंह
लेखक-पत्रकार-फिल्मकार रंजन कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्स से सफर शुरु कर टीवी की दुनिया में कदम बढ़ाया। अनके टीवी कार्यक्रम का निर्माण-निर्देशन करने के साथ ही वह अब तक आठ पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से तीन हिन्दी की तथा शेष अंग्रेजी की हैं। देश-विदेश में वह भारतीय कला-संस्कृति तथा भारतीय हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान के लिए भी बुलाए जाते रहे हैं। वह अनेक शिक्षा संस्थानों तता अकादमियों से भी जुड़े रहे हैं।

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