संस्कृति साहित्य

विक्रम संवत के बहाने, परमार वंश का गौरव बोध

आज सुबह से ही वाट्सऐप पर हिन्दू वर्षारंभ की शुभकामनाएं मिल रही हैं। हिन्दू वर्षारंभ यानी विक्रम संवत का प्रथम दिवस। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होनेवाले इस वर्ष को विक्रम संवत भी कहते हैं और विक्रमी भी। संवत यानी भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित काल गणना। कहते हैं कि सम्राट विक्रमादित्य ने मालवा में शकों को परास्त कर उनकी काल गणना के स्थान पर इसे प्रचलित किया। 12 महीने का वर्ष और सात दिनों का सप्ताह इसी संवत से प्रचलित हुआ। वह भी ईसा से लगभग 57 वर्ष पूर्व।

यह मेरा सौभाग्य ही है कि मैं चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की प्रदीप्त वंश परंपरा का छोटा सा दीपक हूं। विक्रम-बैताल की कथाएं हममें से किसने नहीं सुनीं? सम्राट विक्रमादित्य की बुद्धि का लोहा हर कोई मानता था। माना जाता था कि ऐसा कोई सवाल नहीं, जिसका उत्तर विक्रम के पास न हो। विक्रमादित्य की प्रतिष्ठा को देखते हुए बाद के अनेक शासकों ने तो उसे उपाधि के तौर पर ही धारण कर लिया।

उनके बड़े भाई भृतहरि की कहानी भी कम रोचक नहीं। समस्त सुखों का भरपूर आस्वाद लिया और फिर उन्हें त्यक्त महसूस कर वन में चले गए संन्यासी बनकर। उन्होंने ऋंगार शतक भी लिखा और वैराग्य शतक भी। न तो ऋंगार शतक का कोई मुकाबला है और ना ही वैराग्य शतक का। इसी वंश परंपरा में राजा मुंज से लेकर राजा भोज तक हुए। सब एक से एक विद्वान। वीरता की मिसालें तो अनेकों की दी जा सकती हैं। दी भी जाती रही हैं। पर विद्वता की मिसालें परमार वंश में ही मिलती हैं। विक्रमादित्य के साथ-साथ राजा भोज की भी उपमा दी जाती रही है। भोज स्वयं क्या कम विद्वान थे? कहा जाता है कि उन्होंने धर्म, खगोल विद्या, कला, कोश रचना, भवन निर्माण, काव्य, औषधशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखीं, जो अब भी मौजूद हैं।

Atal Bihari
अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी पुस्तक भेट करते हुए लेखक

परमारों में कुछ तो ऐसा जरूर है, जो उन्हें बहुतों से अलग करता है। अपनी ही चार पीढ़ियों पर नजर डालता हूं तो गर्व का बोध होता है। बाबा से लेकर बेटी तक साहित्य और सृजन की परंपरा से बंधे हुए हैं। ऐसा संयोग विरल ही है। दादाजी स्व0 कामता प्रसाद सिंह काम जी बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे, पर जाने गए अपनी वाक् पटुता तथा लेखन की वजह से। पिताजी स्व0 शंकर दयाल सिंह लोकसभा के भी सदस्य रहे और राज्यसभा के भी। पर याद किए जाते हैं अपनी हिन्दीसेवा तथा लेखन की वजह से ही।

मैं स्वयं भी इस बात से संतुष्ट हो सकता हूं कि हिन्दी और अंग्रेजी में दसियों पुस्तकें लिख चुका हूं। और मेरी बिटिया रचिता के लिखने की रफ्तार तो अद्भुत ही है। उसकी एक पुस्तक कहानियों का संग्रह है तो दूसरी पुस्तक कविताओं का संग्रह। उसकी एक कहानी अमेरिका की किसी प्रतियोगिता में पुरस्कृत हो चुकी है तो दूसरी कहानी पेंगुइन के कथा संचयन में शामिल हुई है। हम तो उसे डॉक्टर बनाना चाहते रहे। उसने डेंटल की पढ़ाई पूरी भी की और फिर लोक स्वास्थ्य में पीएचडी भी कर रही है, पर वंश का संस्कार उसे साहित्य की तरफ खींच ही लाया। डोबरमैंन को चाहे जितनी भी ट्रेनिंग दे दी जाए, वह अल्शीसियन नहीं हो सकता। हर जाति का, हर वंश का अपना संस्कार है, वह आप से आप प्रकट हो रहता है।

परमारों में प्रतापी राजा हुए जरूर, पर आप उन्हें उनकी वीरता के लिए कभी याद नहीं करेंगे, उन्हें याद करेंगे उनकी विद्वता के कारण। संभवतः मुझे भी मेरा लेखन ही अमरत्व देगा। अभी हाल में ही मेरा जन्मदिन गुजरा और तब मैंने एक बार फिर से अपने जीवन का लेखा-जोखा देखने की कोशिश की। एक दर्जन से अधिक पुस्तकें, दो दर्जन से अधिक फिल्में, देश-विदेश में आयोजित डेढ दर्जन संगोष्ठियों में सहभागिता, साहित्य से लेकर पुरातत्व तक और इतिहास से लेकर दर्शनशास्स्त्र तक पर गंभीर काम, फोटोग्राफी से लेकर कम्प्यूटर तक में समान दखल। गिनाने को बहुत है और संतोष तथा गर्व करने के लिए भी कुछ कम नहीं। फिर भी कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली!

राजा भोज के सामने, गंगू ही तो हूं मैं। पर इस वंश का गंगू होना भी क्या कम है? विक्रकमादित्य और भोज की वंश परंपरा में जन्म लेकर उनके संस्कारों को धारण करनेवाला अपने आप पर गर्व तो कर ही सकता है।

रंजन कुमार सिंह
लेखक-पत्रकार-फिल्मकार रंजन कुमार सिंह ने नवभारत टाइम्स से सफर शुरु कर टीवी की दुनिया में कदम बढ़ाया। अनके टीवी कार्यक्रम का निर्माण-निर्देशन करने के साथ ही वह अब तक आठ पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से तीन हिन्दी की तथा शेष अंग्रेजी की हैं। देश-विदेश में वह भारतीय कला-संस्कृति तथा भारतीय हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान के लिए भी बुलाए जाते रहे हैं। वह अनेक शिक्षा संस्थानों तता अकादमियों से भी जुड़े रहे हैं।

One thought on “विक्रम संवत के बहाने, परमार वंश का गौरव बोध

  1. बधाईयां, आप अपने परिवार के तीसरी पीढ़ी हैं जो हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं। मैंने आपकी पुस्तक तो नहीं पढ़ी है परन्तु कामता प्रसाद सिंह ‘काम ‘ की पुस्तक जरूर पढ़ी है। वे ग्रामीण संवेदना के रचनाकार थे। अपने गांव -घर के लोगों तथा ग्रामीण परिवेश का बड़ा ही सुन्दर एवं मनमोहक चित्रण किया है। चाहे ‘घर,गांव और देहात’ हो या ‘ घुमक्कड़ की डायरी ‘ अपने आप में उत्कृष्ट रचना है ।

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