समाज

दक्षता की जरूरत

कुशलता सफलता की कुंजी है। जो कुशल है, वही सफल भी हो सकता है। पर कुशलता किसी को रातों-रात हासिल नहीं हो जाती। इसके पीछे वर्षों की मेहनत जुड़ी होती है। हरेक व्यक्ति में प्रतिभा होती है। यह प्रतिभा ईश्वर का वरदान है। पर कुशलता तो हम खुद से ही हासिल करते हैं। कुशलता प्रतिभा की तरह नैसर्गिक नहीं होती, यह अर्जित की जाती है। कुशल बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना होता है। दिन-रात एक कर देना होता है। तभी कोई कुशल बन पाता है, भले ही वह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन हो, या फिर दुनिया का सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर सचिन।

कुशल बनकर आपको काम तो मिल सकता है, पर सिर्फ कुशल बनने से ही काम नहीं चल पाता। इसके लिए निपुण बनना पड़ता है। बल्लेबाजी में कुशल तो बहुतेरे हैं, पर सचिन इस काम में निपुण है और इसीलिए वह औरों से अलग है। आप कुशल हैं तो आपको काम मिल सकता है, पर अगर आप निपुण हैं तो आपको नाम और शोहरत भी मिलते हैं। देखा जाए तो कुशलता के कई स्तर हैं। अपने काम में निपुण होने से भी बढ़कर अपने काम में प्रवीण होना होता है। लेकिन सबसे बढ़कर होता है अपने काम में दक्ष होना। अगर हम वाकई सफल होना चाहते हैं तो हमें खुद को दक्ष बनाने की जरूरत होती है।

कुशलता से दक्षता तक

जो दक्ष है, मंजिल उसके कदम चूमती है। अर्जुन महज कुशल नहीं हैं, वह धनुर्विद्या में दक्ष हैं। इसी तरह सचिन भी बल्लेबाजी में दक्ष हैं। ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा में अभ्यास का मेल हो जाए तो दक्षता प्राप्त हो पाती है। बाणों से किसी कुत्ते का मुंह इस तरह भर देना कि उसकी जीभ तक पर कोई खरोंच न आए, यही है दक्षता। एकलव्य को यह सिखाया किसने? किसी ने भी तो नहीं? अपने कठोर अभ्यास के बल पर ही तो उसने यह दक्षता प्राप्त की थी। प्रत्यंचा पर बाण चढ़ाकर उसे सफलतापूर्वक छोड़ देनेवाला कोई भी व्यक्ति स्वयं को कुशल बता सकता है, पर जिसके तीर हर बार निशाने पर जा पड़ते हैं, निपुण वही कहलाता है।

जिसे काम आता है, उसकी ही पूछ होती है। दुनिया उससे पूछती है, भाई तुम्ही बताओं तुम कितना लोगे यह काम करने का। नहीं तो उसे साफ-साफ कह दिया जाता है कि इस दाम में काम करना हो तो करो, नहीं तो बहुतेरे हैं इस काम को करने के लिए। काम सीख लेने से ही कोई कुशल नहीं बन जाता। सामने बढ़ई मिस्त्री काम कर रहा होता है तो लगता है कितना आसान है यह सब करना। लकड़ी ही तो चीरनी है। जोड़ ही तो लगाना है। औजार हो तो क्या हम यह नहीं कर सकते? यूट्यूब पर तो ढेरों कार्यक्रम हैं जो हमें बताते हैं कि कोई काम कैसे किया जाता है। काम कर भी लिया तो फिनिशिंग नहीं आ पाती। यह फिनिशिंग ही तो है जो कुशलता और निपुणता के बीच का भेद खोल देती है।

कोई काम सीखकर आप उसे करने का तरीका ही जान पाते हैं। पर इतने भर से काम नहीं चलता। उस काम में फिनिशिंग न हो तो आपको न तो उसकी मनमाफिक कीमत मिलती है और ना ही आपकी कोई पहचान ही बन पाती है। हम सबों का उद्देश्य यही होना चाहिए। अपनी पहचान बनाना। कोई हमारा काम बाद में भी देखे तो खुद ही समझ ले कि यह अमुक व्यक्ति ने किया होगा। कोई हमें काम करता देखे तो उसे आप से आप आनन्द की अनुभूति हो उठे। मजा आ जाए उसे हमें काम करता देखकर। खुशी से भर उठे वह हमारा काम देखकर। वैसे ही जैसे सचिन को ड्राईव लगाते देखकर हमारा मन आनन्दविभोर हो उठता है।

जिनका काम बोलता है, उन्हें कुछ और बोलने की जरूरत नहीं होती। हमारी यह पहचान ही हमारी ब्रांड आइडेंटीटी बनकर उभरती है। और जिसने अपनी ब्रांड आइडेंटीटी कायम कर ली, वह आम नहीं रह जाता। वह आम से खास हो जाता है। सड़क किनारे ईंटो पर बिठाकर भी हजामत होती है, पर ऊंचे दाम तो जावेद हबीब या वंदना लूथरा के सैलून में ही वसूले जा सकते हैं। संजीव कपूर या विकास खन्ना को कीई बावर्ची नहीं कहता क्योंकि वे अपने काम में सिर्फ कुशल ही नहीं हैं, बल्कि दक्ष हैं।

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